| फ़ैशन के साथ बदलता काँजीवरम | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
काँजीपुरम का ज़िक्र आते ही सिल्क की भारी और बारीक काम वाली साड़ी पहने, एक सजी-धजी दुल्हन की तस्वीर आँखों के सामने आ जाती है. पर अब बात केवल साड़ी तक नहीं रही, फ़ैशन और पहननेवालों के बदलते मिजाज़ के साथ इस हैंडलूम उद्योग ने भी अपने आपको बदलना शुरू कर दिया है. काँजीवरम उद्योग अब महज साड़ियाँ ही नहीं, स्कार्फ़, कुशन-कवर, टेबल क्लाथ, बेडशीट, कमीजें, चूड़ीदार पजामे और कुर्ते और साथ ही सिल्क से तैयार कई तरह के सजावटी सामान बनाने का काम भी कर रहा है. वजह साफ़ है, बदलते समय में साड़ी केवल शादी के मंडप या फिर पर्व-त्योहारों का परिधान बनती जा रही है. ज़ाहिर है इससे साड़ी की खपत में भी कमी आ रही है. इसका नतीजा यह हुआ है कि काँजीपुरम की 40 प्रतिशत आबादी, जो हथकरघे के काम पर ही जिंदा है, को अब अपने हुनर और परिवार को बचाए रखने के लिए वक्त और बाज़ार की माँग के मुताबिक बदलाव लाने पड़ रहे हैं. समय से कदमताल इस हथकरघा उद्योग से जुड़े, काँजीपुरम के एक बड़े व्यापारी सीएस शेषाद्रि कहते हैं, "इसमें ग़लत ही क्या है. शहर की आधी आबादी इसी कारोबार पर गुज़ारा करती है और अगर उसे बाज़ार में जगह बनाए रखने के लिए नई चीज़ें तैयार करनी पड़ रही है तो यह बिल्कुल ठीक है." उन्होंने कहा, "इससे निर्यात को भी फ़ायदा होगा और साथ ही लोगों के पास हमारे द्वारा तैयार चीज़ों को ख़रीदने के विकल्प भी बढ़ेंगे." कारखाने में हथकरघा संभाले, कुमार बचपन से ही इसी काम में हैं. उनके घर में तीन पीढियों से यही काम हो रहा है. कुमार बताते हैं, "हमें एक साड़ी तैयार करने में 15 दिन लग जाते हैं. ऐसे में साड़ी के साथ-साथ और चीज़ों की बिक्री से हमारी आमदनी ठीक-ठाक हो जाती है. हम साड़ी बनाना बंद नहीं करेंगे पर लोगों की ज़रूरत के हिसाब से और चीज़ें भी तैयार करेंगे." पर ख़ास हैं साड़ियाँ वैसे यहाँ की साड़ी की ख़ास पहचान आज भी पूरी दुनिया भर में है. कर्नाटक के रेशम और सूरत की ज़री से तैयार, काँजीवरम साड़ी की सबसे ख़ास बात यह है कि एक ही डिज़ाइन की केवल तीन साड़ियाँ बनाई जाती हैं और वो भी देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भेज दी जाती हैं.
इस तरह साड़ी पहननेवाली हर महिला के दिल में यह अहसास बना रहता है कि उसकी साड़ी भीड़ में सबसे अलग और ख़ास है. यही वजह है कि आज बिक्री भले ही कम हो गई हो पर पहचान अभी भी वही है. साड़ी के एक अन्य व्यापारी श्रीनिवासन बताते हैं, "हम चेन्नई, बैंगलोर, मैसूर, दिल्ली, मुंबई के साथ ही मलेशिया, सिंगापुर, जर्मनी, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया में भी अपना सामान भेजते हैं और वहाँ लोग इसे पसंद भी करते हैं." काँजीवरम की साड़ियाँ ख़ासतौर पर भारतीयों के लिए ही तैयार की जाती हैं. साड़ी जिस रेशम के धागे से तैयार होती है वो ख़ासकर भारतीयों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है. असली रेशम का धागा काफ़ी गर्म होता है जो भारत के वातावरण के हिसाब से ठीक नहीं रहता इसलिए रंगने से पहले इसे बाकायदा ब्लीच किया जाता है. और तो और, साड़ियों की उम्र बढ़ाने के लिए, इसमें इस्तेमाल होने वाले धागे को तीन रेशों से तैयार किया जाता है. साथ ही साड़ी ख़ासतौर पर इस बात को ध्यान में रखते हुए बनाई जाती है कि उसे घर पर ही धोया जा सके. फिर हथकरघे पर होने वाला काम, लाखों के लिए दो वक्त की रोटी भी है, सो पावरलूम पर रोक है, सारा काम हुनरमंदों के हाथ से ही होता है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||