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रंग और ढंग बदलता डोसा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आप क्या खाना पसंद करेंगे, पनीर डोसा या एग-डोसा और या फिर बटर-डोसा या कीमा-डोसा. चौंकिए मत, आज तमाम बड़े शहरों में डोसा कई नए प्रयोगों के साथ खाने की मेज़ पर आ रहा है और लोग बदले हुए स्वाद का मज़ा ले रहे हैं. फिर चाहे वो कोई इंटरकॉन्टिनेंटल फ़ूड रेस्तरां हो और या फिर कोई मद्रासी ढाबा, डोसा के बदले अंदाज़ की महक और दस्तक हर जगह है. और तो और, इनके रंग और परोसने के ढंग में भी काफ़ी बदलाव आया है. अब दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित मद्रास कैफ़े को ही ले लीजिए, टमाटर के तरतीबवार कटे टुकड़ों से सजाए गए दही बड़े के साथ पनीर डोसा का मज़ा आप यहाँ बख़ूबी ले सकते हैं. डोसा ऐसा तो नहीं था, पर जब पूरी दुनिया ही एक गाँव बन रही हो तो भला डोसा कैसे बिना बदले रह जाए. असली बात तो खाने और उसके ज़ायके की है और खाने वालों को बस खाने का बहाना चाहिए. बाजार की कसौटी पर ख़रा उतरने के लिए अब डोसा बनाने वाले खानसामे भी अपना मन बदलने को मजबूर हैं और नए स्वाद का डोसा उनके लिए भी उतनी ही जिज्ञासा का विषय है जितना कि खानेवालों के लिए. दक्षिण तक असर
ऐसा नहीं है कि दक्षिण भारत के इस व्यंजन के साथ उत्तरी भारत और दुनिया के दूसरे हिस्सों में प्रयोग हुए हैं दक्षिण भारत भी ऐसे प्रयोगों से बचा नहीं रह पाया है. तंजौर में पेपर डोसा और मसाला डोसा के साथ स्पेशल पनीर डोसा और बटर डोसा भी उपलब्ध था. खानसामा वेंकटराजन ने बताया, "हमने अपने समय में कभी ऐसा डोसा नहीं खाया था पर अब लोग चाहते हैं कि नए तरीके से डोसा बने इसीलिए हम बना रहे हैं. हाँ, माँसाहारी डोसा हम अभी नहीं बना रहे हैं." पर दक्षिण भारत के कई लोगों को यह रास नहीं आ रहा है. मदुरै के श्रीनिवासन कहते हैं, "डोसा के ज़ायके के साथ खिलवाड़ करना बिल्कुल ग़लत है. हम लोगों ने कभी सोचा भी नहीं था कि डोसा इन नए रूपों में भी होगा." वहीं के भास्कर कहते हैं, "हमने कभी माँसाहारी डोसा नहीं खाया और न ही खाने का मन है. हम तो अपना वही पुराना डोसा पसंद करते हैं जो हम बचपन से खाते आ रहे हैं." वे चिंता जताते हुए करते हुए कहते हैं, "अगर ऐसे प्रयोगों को समय रहते नहीं रोका गया तो आने वाले समय में लोग असली डोसा खाने को तरस जाएँगे." उधर दूसरी तरफ़ दिल्ली के सुनील कहते हैं, "इसमें ग़लत क्या है. अगर कोई नई वैराइटी विकसित कर रहा है तो हम उसका स्वाद क्यों न लें." हालांकि सुनील इस बात से सहमत थे कि डोसा का मूल स्वाद भी सुरक्षित रहना चाहिए. अब खाने पर किसका बस है. बाज़ार गर्म है और प्रतिस्पर्द्धा के समय में जब सब कुछ रंग बदल रहा है तो डोसा भर कैसे बचे. सो प्रयोग जारी है और लोग बदले रंग-ढंग का डोसा खा रहे हैं. |
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