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शनिवार, 09 सितंबर, 2006 को 19:41 GMT तक के समाचार
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अफ़ग़ानिस्तान में नाकाम रही रणनीति

अफ़ग़ानिस्तान
अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिकों की मुश्किल क़ायम
वर्ष 2001 के सितंबर महीने में अमरीका पर हमले हुए थे. उसी साल सात नवंबर को अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया था.

अमरीका का मानना था कि ओसामा बिन लादेन और अल क़ायदा ने 11 सितंबर की घटना को अंजाम दिया है इसलिए अफ़ग़ानिस्तान पर कार्रवाई की गई क्योंकि ये माना जा रहा था कि लादेन और उनके साथी अफ़ग़ानिस्तान की तालेबान सरकार के प्रश्रय में रह रहे हैं.

अल क़ायदा को ख़त्म करने के साथ-साथ अमरीका का ये भी लक्ष्य था कि अल क़ायदा को पनाह देने वाले तालेबान सरकार का ख़ात्मा किया जाए.

दूसरे लक्ष्य, जो उतना महत्वपूर्ण नहीं था. उसे अमरीका ने सिर्फ़ दो महीने में ही हासिल कर लिया. लेकिन जो मुख्य लक्ष्य था, वो अभी भी हासिल नहीं हुआ है.

पहुँच नहीं

अल क़ायदा को नुक़सान तो बहुत हुआ लेकिन उसके बड़े नेता ओसामा बिन लादेन या ज़वाहिरी अभी भी अमरीका की पकड़ से दूर हैं.

लादेन और उनके साथी अमरीकी की पकड़ से दूर हैं

इस कारण अभी भी अमरीकी सेना अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद है. अब तो उन्होंने नैटो की सेना भी बुला ली है. क्योंकि उनसे अकेले अफ़ग़ानिस्तान नहीं संभल रहा.

क़रीब पाँच साल से चल रही कार्रवाई के बावजूद अल क़ायदा का पूरी तरह ख़ात्मा नहीं हो सका है और तालेबान विद्रोही फिर सर उठा रहे हैं.

अमरीका ने हामिद करज़ई की सरकार तो बनवा दी है लेकिन अभी वे पूरे देश पर अपना नियंत्रण तक स्थापित नहीं कर पाए हैं.

अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान में अपनी ओर से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रखी है. हामिद करज़ई की सरकार को उनका पूरा समर्थन है. उन्होंने काफ़ी पैसा भी ख़र्च किया है.

उन्होंने वहाँ चुनाव भी कराए लेकिन अमरीका को बड़ी सफलता नहीं मिल पाई. अमरीका के आने के बाद और हामिद करज़ई की सरकार के गठन के बाद यहाँ के लोगों को बड़े बदलावों की उम्मीद थी.

लेकिन उम्मीदें पूरी नहीं हो पाईं. पाँच साल लंबा समय होता है लेकिन इस दौरान उम्मीदें पूरी न होने के कारण लोग नाराज़ हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में आलम ये है कि सुरक्षा व्यवस्था कमज़ोर है. एक तबका तो ये भी कहने लगा है कि तालेबान के समय में अमन था और अब नहीं है.

नाराज़गी की एक और वजह ये है कि अमरीकी सैनिक कार्रवाई में बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिक मारे गए.

बदलाव

इन सबके बावजूद अफ़ग़ानिस्तान में कुछ तो अच्छे बदलाव हुए हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता. 1960 के दशक में यहाँ सीमित लोकतंत्र था लेकिन उसके इतने वर्षों बाद यहाँ इतने बड़े पैमाने पर चुनाव हुए.

अफ़ग़ान महिलाएँ सांसद भी बनीं हैं

मीडिया को काफ़ी आज़ादी मिली. कई समाचार पत्र निकलने लगा है टेलीविज़न भी आ गया है. रेडियो भी है. महिलाओं पर पहले काफ़ी पाबंदी थी. वे कहीं काम तो बिल्कुल नहीं कर सकती थीं.

तालेबान के समय में तो नौ साल से ज़्यादा उम्र की लड़कियों के स्कूल जाने तक पर पाबंदी थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है.

अब हज़ारों लड़कियाँ शिक्षा हासिल कर रही हैं. स्कूल, कॉलेज जा रही हैं. और तो और महिलाएँ सांसद भी हैं. पुनर्निर्माण के नाम पर अफ़ग़ानिस्तान में काफ़ी पैसा भी आया.

सड़कें बनीं हैं, अस्पताल बने हैं. स्कूल और विश्वविद्यालय भी बने हैं. इस कारण वहाँ रोज़गार के अवसर भी पैदा हुए. पुनर्निर्माण कार्यों में अफ़ग़ान लोग तो लगे ही हैं, वहाँ 50 हज़ार पाकिस्तानी भी काम कर रहे हैं.

लेकिन इन सबके बावजूद सरकार सीमित दायरा में काम कर रही है. क़बायली सरदारों पर ज़्यादा निर्भरता के कारण भी करज़ई सरकार बदनाम हो रही है.

ये सरदार काफ़ी शक्तिशाली हैं, इनके पास बड़ी संख्या में हथियार भी हैं. मादक द्रव्यों की तस्करी पर भी उनका ही नियंत्रण है.

अफ़ग़ानिस्तान में भ्रष्टाचार इतना ज़्यादा है कि पहले ऐसा कभी नहीं रहा. जो पैसा बाहर से आ रहा है, उसका सही इस्तेमाल भी नहीं हो रहा.

इन सब कारणों से करज़ई सरकार का समर्थन कम हुआ है और तालेबान फिर सिर उठाने में सफल हो रहे हैं.

तालेबान

अमरीकी कार्रवाई में तालेबान को पूरी तरह से हराया नहीं जा सका था. ये ज़रूर था कि उनकी सरकार ख़त्म हो गई थी.

तालेबान विद्रोही सिर उठा रहे हैं

शायद उन्हें इसका एहसास हो गया था कि वे अमरीकी फ़ौज का सामना नहीं कर पाएँगे इसलिए उन्होंने पीछे हटने में ही भलाई समझी.

दरअसल तालेबान ने अपने आप को बचाया. उनके लड़ाके बच गए. उन्होंने अपने हथियार भी छुपा लिए. उन्होंने मौक़े का इंतज़ार किया और 2002 से ही अपना प्रतिरोध दोबारा शुरू कर दिया.

देखा जाए तो तालेबान कभी ख़त्म हुए ही नहीं थे. उन्होंने सिर्फ़ अपने को पीछे हटाया था. जब उन्हें मौक़ा मिला तो फिर सामने आए.

तालेबान को शुरू से ही अफ़ग़ान व्यापारियों का समर्थन मिलता रहा है. क्योंकि अपने शासनकाल में तालेबान ने व्यापार के सारे रास्ते खोल दिए थे.

इस कारण व्यापारियों ने तालेबान को काफ़ी चंदे दिए और अभी भी वे उनकी मदद कर रहे हैं. तालेबान को पाकिस्तान से भी मदद मिलती है. कई धार्मिक पार्टियाँ उनके लिए पैसा इकट्ठी करती हैं. अरब देशों से भी उन्हें काफ़ी पैसा मिल रहा है.

रणनीति

अमरीका की दीर्घकालिक रणनीति अफ़ग़ानिस्तान में लंबे समय तक रहने की है. अब तो अमरीका कहता है कि उसने पहले ग़लती की थी जब वे अफ़ग़ानिस्तान से निकल गए थे.

अमरीकी सैनिक लंबे समय तक टिके रह सकते हैं

क्योंकि अमरीका का कहना है कि उसके बाद ही अल क़ायदा ने अपना प्रभाव बना लिया. अमरीका के साथ-साथ नैटो की सेना भी अफ़ग़ानिस्तान में रहेगी.

क्योंकि अगर अमरीका और नैटो को शिकस्त मिली, तो काफ़ी बदनामी होगी. शायद तालेबान फिर से सरकार नहीं बना सके लेकिन उनकी मौजूदगी रहेगी.

दक्षिणी और पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के इलाक़े को वे अस्थिर करते रहेंगे. इसके हामिद करज़ई की सरकार और अमरीका की बदनामी होगी और तालेबान यही चाहता भी है.

अगर अफ़ग़ानिस्तान अस्थिर हुआ तो पूरा क्षेत्र अस्थिर हो सकता है. ना सिर्फ़ पाकिस्तान बल्कि ईरान और सेंट्रल एशियाई देशों पर भी इसका असर पड़ सकता है.

अमरीका की मुश्किल ये है कि अल क़ायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन, ज़वाहिरी और तालेबान के मुल्ला उमर सभी ज़िंदा हैं और अभी तक पकड़े नहीं जा सके हैं.

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