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लेबनान संकट: मूल कारण और समाधान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बारह जुलाई को हिज़्बुल्लाह ने इसराइल के दो सैनिकों को अगवा कर लिया और इसके साथ ही लेबनान में इसराइल का 1982 के बाद का सबसे बड़ा सैन्य अभियान शुरू हुआ. इसराइल के प्रधानमंत्री एहुद ओल्मर्ट ने सोचा होगा कि हवाई हमले कर वो हिज़्बुल्ला की ताक़त हमेशा के लिए खत्म कर देंगे. पर तीन हफ़्ते बाद अब ऐसा लगने लगा है कि मामला गंभीर रूप ले चुका है. लगभग 600 नागरिक मारे जा चुके हैं हज़ारों विस्थापित हो गए है. ऐसा लगता है कि दुनिया दो हिस्सों में बट गई है. दक्षिणी लेबनान में 18 साल के कब्ज़े के बाद वर्ष 2000 में इसराइली फौज वहाँ से हटी थी. जाते-जाते ये धमकी दे गई थी कि हिज़्बुल्लाह की किसी भी भड़काऊ कार्रवाई को सहन नहीं किया जाएगा और अब ऐसा हो भी रहा है. दुनिया भर में जहाँ कोई हिज़्बुल्लाह के कदम को सही नहीं बता रहा वहीं इसराइल के हमले को ज़रूरत से कहीं ज़्यादा ज़रूर बताया जा रहा है. मध्य पूर्व के जानकार और पूर्व राज्यपाल रोमेश भंडारी कहते हैं, "यह बहुत ही दुखदायी है और ये कुछ सुलझाएगा नहीं. हिज़्बुल्ला के लिए जो भी ग़लत या सही लेकिन सारे लेबनान को बर्बाद कर दो...आतंकवादियों की बात करते हैं कि वे मासूमों को मार देते हैं - किसी भी मकसद के लिए, जो अपना उद्देश्य हो... तो यह क्या हो रहा है." कौन हैं हिज़्बुल्ला? हिज़्बुल्ला शिया लड़ाके हैं. छद्म युद्ध में ये माहिर है. लेबनान में ये ज़्यादातर स्थानीय युवा है जो वहाँ की ज़मीन को समझते है इससे जुड़े हैं. इनकी आध्यात्मिक और वित्तीय मदद ईरान करता है और इनका असला सीरिया की मदद से आता है. विश्लेषकों का मानना है कि आज हिज़्बुल्ला के 'कोर ग्रुप' में 700 सदस्य होंगे और कुल लड़ाके 8000 से 20 हज़ार तक हो सकते हैं. इनका सफ़ाया करने के लिए इसराइल बंदरगाह रोक रहा है, पुल तोड़ रहा है. बेरूत हवाई अड्डे के रनवे को नष्ट कर रहा है. उसका मानना है कि ऐसा करके वो हिज़्बुल्ला की ताक़त कम कर रहा है. लेकिन इसका खामियाज़ा पूरे देश को सहना पड़ रहा है. लेबनान ने लंबे समय के बाद वापस सामान्य जीवन जीना सीखा था. अमरीका की विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने कहा कि समस्या की जड़ को हटाए बिना ये लड़ाई नहीं रूकेगी. पर इस समस्या की जड़ क्या है - हिज़्बुल्ला या ईरान और सीरिया, जो इसकी मदद कर रहे है या फिर फलस्तीनी संघर्ष. मध्य पूर्व को आप किस नज़रिए से देखते हैं और आपकी राजनीति क्या है, इस पर निर्भर करेगा कि इस समस्या की जड़ आप क्या समझते हैं.
मूल कारण जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मध्यपूर्व के जानकार कमाल पाशा कहते हैं, "मूल कारण यही है कि वो हिज़्बुल्ला को खत्म करना चाहते हैं. जैसे कि वर्ष 1982 में इसराइल को हरी झंडी दिखाकर पीएलओ का खात्मा लेबनान में करने की कोशिश थी. इसराइल के पास टैंक हैं, आर्टिलरी है, विमान और हेलीकॉप्टर भी है. इसीलिए वे मानते हैं कि हिज़्बुल्ला को कुचलना चाहिए, उससे सीरिया पर भी असर होगा और आगे चलकर ईरान पर भी." पर इस सबके बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद कहाँ है? आख़िर वहाँ विवाद को सुलझाने के लिए संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव 1559 पारित हुआ था. इसमें लेबनान में सभी छापामारों को अस्त्र त्यागने, पूरे लेबनान पर वहाँ की सरकार का अधिकार स्थापित करने और हिज़्बुल्ला को दक्षिणी लेबनान से दूर करना शामिल था. तब तक के लिए वहाँ पर संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना यूनिफिल की तैनाती की गई थी. उसका कार्यकाल भी इस महीने के अंत में समाप्त हो रहा है और इस लड़ाई में ये दल भी निशाना बना है. संयुक्त राष्ट्र में भारत के दूत रहे चुके हामिद अंसारी कहते हैं, "ये इनके चार्टर में बहुत साफ़ लिखा हुआ है कि सुरक्षा परिषद की पहली जवाबदेही दुनिया में अमन रखना है. इस वक्त हम देख रहे हैं कि सुरक्षा परिषद में कोई कदम नहीं उठाया गया. इसकी वजह ये है कि अमरीका की सरकार अभी वहाँ कुछ करने के लिए तैयार नहीं है." हामिद अंसारी का ये भी मानना है, "अमरीकी सरकार के बयान और वहाँ के अख़बारों से जो ख़बरें आ रही हैं उससे यह बात साफ़ हो गया है कि अमरीका चाहता है कि ये लड़ाई कुछ दिन और चले ताकि इसराइल अपनी सैन्य योजना के तहत जो करना चाहता है उसके लिए उसे पूरा वक्त मिले." इसराइली कदम कितना जायज़? इसराइल का कहना है कि उसने संयम बनाए रखा लेकिन जब पानी सिर से ऊपर निकल गया तब उसे अपने नागरिकों के हित में अपने जायज़ हक़ का इस्तेमाल करना पड़ा. पर क्या दुनिया में विवादों को निपटाने का ये तरीका सही है? क्या हिज़्बुल्ला के ख़िलाफ़ और इराक़ में सैन्य कार्रवाई के नतीजे कुछ संकेत नहीं देते? जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कमाल पाशा कहते हैं, "अमरीका जो चाहता था इसराइल के ज़रिए, वह हो नहीं पाया और चूंकि ईरान का इराक़ में प्रभाव बढ़ता जा रहा है, तो संदेशा ये है कि ईरान और सीरिया मिलकर एक 'एक्सेस' बना रहे हैं, हिज़्बुल्ला के साथ, अमरीका और इसराइल को चुनौती देने के लिए. दोनों ओर से कार्रवाई हो रही है. इसराइल और अमरीका सीरिया और ईरान पर दबाव डालना चाहते हैं और ईरान और सीरिया, हिज़्बुल्ला और हमास को लेकर अमरीका पर दबाव डालना चाहते हैं." इस प्रकरण का अंत कैसे हो? इस पर अकटले ही लगाई जा सकती है. क्या इसराइल का पीछे हटना और बमबारी का रुकना ही हल है? पर ये भी स्थाई हल नहीं होगा. रोमेश भंडारी का कहना है, "कितने साल हो गए 'रोड मैप ऑफ पीस' पर सब मान गए थे. अमरीका भी, सब यूरोपीय ताकतें भी. सुरक्षा परिषद में भी मामला गया तो सुरक्षा परिषद में पीएलओ ने यासर आराफात के वक्त अपनी स्वीकृति दे दी. तो 'रोड मैप ऑफ पीस' जिसकी एक समयसीमा थी, उसकी कोई बात ही नहीं कर रहा." ज़रूरत इस समय शायद एक निर्धारित समयसीमा में मध्य पूर्व के लंबे समय से चले आ रहे विवादों का कोई स्थाई समाधान ढूंढना होगा. | इससे जुड़ी ख़बरें चेतावनियाँ नज़रअंदाज़ की गईं26 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना लेबनान में संघर्षविराम पर सहमति नहीं26 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना अन्नान का तुरंत युद्धविराम का आग्रह26 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना इसराइली हमलों में पर्यवेक्षकों की मौत25 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना इसराइल शांतिबलों की तैनाती पर सहमत24 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना इसराइली हमले जारी, सीमा पर जमावड़ा22 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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