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रविवार, 16 जुलाई, 2006 को 09:28 GMT तक के समाचार
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क्या है हिज़्बुल्ला संगठन?
हिज़्बुल्ला
हिज़्बुल्ला मानता है कि वो पूरे क्षेत्र में इसराइल के ख़िलाफ़ संघर्ष का जरिया है
लेबनान और इसराइल के बीच जारी संघर्ष के बाद से हिज़्बुल्ला संगठन एक बार फिर चर्चा में है.

हिज़्बुल्ला लेबनान में शिया मुसलमानों का एक शक्तिशाली राजनीतिक और सैनिक संगठन है.

हिज़्बुल्ला का अर्थ है अल्लाह का दल. ये 1980 के दशक में ईरान की वित्तीय मदद से अस्तित्व में आया था और इसने लेबनान से इसराइली सेनाओं को हटाने की मुहिम शुरु की थी.

मई 2000 में हिज़्बुल्ला को अपने उद्देश्य में सफलता मिली जिसके लिए पार्टी की सशस्त्र शाखा इस्लामिक रेसिस्टेंस को श्रेय दिया जाता है.

इसके एवज़ में हिज़बुल्ला को लेबनान की बहुसंख्यक शिया आबादी का पुरज़ोर समर्थन मिला. लेबनान की संसद में हिज़्बुल्ला की महत्वपूर्ण उपस्थिति है और अब इस दल ने सामाजिक और स्वास्थ्य क्षेत्र में काम किया है.

इस दल का एक टेलीविज़न चैनल अल मनार भी है. हिज़्बुल्ला की सशस्त्र शाखा अभी भी अस्तित्व में है जिसे संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 1559 के बाद भी बंद नहीं किया गया.

दो साल पहले 2004 में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव 1559 के तहत इस्लामिक रेसिस्टेंस को निशस्त्र करने और लेबनान से सीरिया के 14000 सैनिकों को वापस भेजने की बात कही गई थी.

इसराइली सेनाओं के वर्ष 2000 में लेबनान से हटने के बाद से ही हिज़्बुल्ला पर अपने सैनिकों को लेबनान की सेना के साथ मिलाने का दबाव बना हुआ है.

सीरिया

नसरूल्ला
हिज़्बुल्ला की विचरधारा तैयार करने में शेख हसन नसरूल्ला की अहम भूमिका रही है

इस्लामिक रेसिस्टेंस अभी भी इसराइल-लेबनान सीमा पर सक्रिय है. दोनों पक्षों के बीच शेबा फॉर्म्स पर अक्सर झड़प होती रहती है.

हिज़्बुल्ला का कहना है कि शेबा फॉर्म्स पर इसराइल ने कब्ज़ा किया हुआ है जो लेबनान की ज़मीन है जबकि इसराइल संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का हवाला देता है कि यह इलाक़ा सीरिया के गोलान पहाड़ियों में आता है जिस पर इसराइल ने 1967 से कब्ज़ा बना रखा है.

हिज़्बुल्ला को ईरान के अलावा सीरिया का पूरा समर्थन मिला हुआ है और सीरिया हिज़्बुल्ला के ज़रिए लेबनान में अपने हित साधता रहा है.

हालांकि पिछले साल लेबनान में भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद सीरिया की सेनाएँ लेबनान से वापस चली गई थीं जिसके बाद से हिज़्बुल्ला की शक्ति में थोड़ी कमी आई है.

विशेषज्ञों का कहना है कि 14 फरवरी 2005 को लेबनान के तत्कालीन राष्ट्रपति रफ़ीक हरीरी की हत्या के बाद हिज़्बुल्ला ने अपनी नीति में काफ़ी सावधानी बरती है.

हिज़्बुल्ला की शुरुआत हुई थी 1982 में और संगठन में सबसे पहले शामिल हुए थे ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड के 2000 सिपाही और इसका मुख्यालय बना बेका घाटी.

हिज़्बुल्ला का सपना है लेबनान को ईरान की तर्ज पर एक शिया राष्ट्र में बदलना लेकिन फ़िलहाल वो इसराइल के ख़िलाफ़ अपनी कार्रवाई पर ही नज़रें गड़ाए हुए हैं.

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