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बुधवार, 07 जून, 2006 को 03:41 GMT तक के समाचार
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ईरान के ताज़ा रुख़ का विश्लेषण

हाविए सोलाना
हाविए सोलाना छह देशों के प्रस्ताव लेकर ईरान गए थे
अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और यूरोपीय संघ की विदेश नीति के प्रमुख हाविए सोलाना ईरान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में पेश अंतरराष्ट्रीय प्रस्तावों पर ईरान की प्रतिक्रिया को सकारात्मक मानते हैं.

लेकिन ईरान के ताज़ा रुख़ का क्या मतलब है?

यूरोपीय देश ईरान की प्रतिक्रिया से उत्साहित तो होंगे लेकिन पिछले साल गर्मियों में ही ईरान ने यूरोपिय देशों के प्रस्ताव का ऐसा ही एक पैकेज एकदम ठुकराकर, अपना यूरेनियम संवर्द्धन कार्यक्रम फिर शुरू कर दिया था.

ईरान की पूर्व सरकार में रह चुके राजनीतिक विश्लेषक सईद लीलाज का कहना है ईरानी कह रहे हैं, "हम समझौता तो करेंगे लेकिन ये मसले की आखिरी अवस्था भी नहीं है. अभी तो कई दौर के बदलाव के बाद इस पैकेज में ईरान के लक्ष्यों से संबंधित कई प्रावधान जोड़े जाऐंगे."

 हम समझौता तो करेंगे लेकिन ये मसले की आखिरी अवस्था भी नहीं है. अभी तो कई दौर के बदलाव के बाद इस पैकेज में ईरान के लक्ष्यों से संबंधित कई प्रावधान जोड़े जाऐंगे
राजनीतिक विश्लेषक सईद लीलाज

इस पैकेज में क्या है - इस बारे में कोई विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है. हाल ही में अमरीका का ईरान को सीधे बातचीत का प्रस्ताव देना भी ईरान के लिए बड़ा प्रलोभन हो सकता है.

लेकिन इस प्रस्ताव के साथ ये शर्त भी जुड़ी हुई है कि पहले ईरान अपना यूरेनियम संवर्द्धन कार्यक्रम बंद करे – और इसके लिए ईरान तैयार नहीं है.

विश्लेषक जमहुरी-ए-इस्लामी का कहना है कि इस प्रस्ताव के आने से पहले ही कुछ रूढ़िवादी अख़बारों ने इसे पूरी तरह अस्वीकार कर दिया था.

उनका कहा था, "पश्चिमी सूत्रों से जो जानकारी बाहर आई है उसके मुताबिक पश्चिम के पैकेज में से 90 फीसदी सुझाव पिछले प्रस्तावों से मिलते-जुलते हैं – यहाँ तक कि शर्त भी एक बार फिर वही है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम रोक दे. इसलिए ये पैकेज भी बातचीत को आगे बढ़ाने की जगह उसके रास्ते में रूकावट ही डालेगा."

 पश्चिमी सूत्रों से जो जानकारी बाहर आई है उसके मुताबिक पश्चिम के पैकेज में से 90 फीसदी सुझाव पिछले प्रस्तावों से मिलते-जुलते हैं – यहाँ तक कि शर्त भी एक बार फिर वही है
विश्लेषक जमहुरी-ए-इस्लामी

तो फिर सवाल ये उठता है कि ईरान आखिर चाहता क्या है?

जिनीवा के सुरक्षा नीति केंद्र के शाहराम शुबिन कहते हैं, "रूढ़िवादियों को तो नहीं लगता कि उन्हें किसी भी बात के लिए समझौता करना चाहिए. उन्हें ये भी नहीं लगता कि सैन्य विकल्प कोई विकल्प है."

शाहराम शुबिन कहते हैं कि ईरान के रूढ़िवादी सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों के बीच व्याप्त मतभेदों के ज़रिए उनमें फूट डालना चाहते हैं और इसलिए वो इन प्रस्तावों से पूरी तरह इनकार भी नहीं करेंगे.

उनके अनुसार रूढ़िवादियों की कोशिश रहेगी कि सदस्य देशों की कमज़ोरियां जानकर वो या तो फैसला टालते रहें या फिर कुछ ऐसा लेकर आएँ जिससे यूरेनियम संवर्द्धन कार्यक्रम को बचाया जा सके.

ईरान के यूरेनियम संवर्द्धन के अधिकार को लेकर काफी समय से पश्चिमी देशों के साथ उसकी तनातनी चल रही है. ऐसे में ईरान को ये उम्मीद ज़रूर होगी कि प्रस्तावों पर बातचीत कुछ समझौते की तरफ बढ़े या फिर उसे कम से कम नाक बचाकर इस स्थिति से बाहर निकालने का मौका तो दिया जाए.

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