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भारत मानवाधिकार परिषद का सदस्य | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त राष्ट्र के एक अहम चुनाव में भारत ने एक बड़ी जीत हासिल की है. भारत को भारी बहुमत के साथ संयुक्त राष्ट्र की नई मानवाधिकार परिषद का सदस्य चुना गया है. इस नई परिषद ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की जगह ली है. इस परिषद में एशिया और अफ़्रीका के 13-13 देशों की सदस्यता होना ज़रूरी है. भारत को कुल 191 देशों में से 173 देशों का समर्थन प्राप्त हुआ. इस परिषद में कुल 47 सदस्यों को चुना जाना था और 63 देश चुनाव मैदान में उतरे थे जिनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और सऊदी अरब भी शामिल थे. भारत को एशिया के समूह में सबसे ज़्यादा वोट मिले. कुल 13 सदस्यों वाले इस समूह में 18 देश सदस्यता की दौड़ में थे. पाकिस्तान, बांग्लादेश और सऊदी अरब को भी इस परिषद में सदस्यता मिल गई है.पाकिस्तान को 149 वोट मिले जबकि बांग्लादेश ने 160 वोट हासिल किए. पाकिस्तान का विरोध कुछ मानवाधिकार संगठनों ने पाकिस्तान समेत रूस, चीन, क्यूबा और सऊदी अरब को इस परिषद में सदस्यता दिए जाने का विरोध किया है. उनका कहना था कि इन देशों का मानवाधिकार का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है. न्यूयॉर्क स्थित एक मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वाच के संयुक्त राष्ट्र मामलों के विशेष वकील लॉरेंस मॉस का कहना है कि इन देशों को मानवाधिकार परिषद की सदस्यता नहीं मिलनी चाहिए थी. उनका कहना था, “ हमने पाकिस्तान के चुने जाने का विरोध किया था. हमे लगता है कि इसका मानवाधिकार परिषद में सदस्य के तौर पर शामिल किया जाना ठीक नहीं है. हमने और भी देशों का विरोध किया था जैसे सऊदी अरब, क्यूबा और ईरान.” लेकिन हताशा जताते हुए उन्होने कहा कि अब जबकि ये देश सदस्य बन गए हैं तो हमें मिलकर काम करना पड़ेगा. ईरान को सदस्यता नहीं मिल सकी. ईरान को सिर्फ़ 56 वोट ही मिले जबकि परिषद का सदस्य बनने के लिए कम से कम 96 वोट मिलना ज़रूरी हैं. इस परिषद के चुनाव में गुप्त वोटिंग प्रणाली का प्रयोग किया गया था जिससे यह नहीं पता चलता कि किसने किस देश को वोट दिया या नहीं दिया. चुने गए देश तीन साल तक इस परिषद के सदस्य रहेंगे और इन सदस्य देशों को अपने अपने देश के अंदर मानवाधिकार से जुड़े मामलों पर कड़ी नज़र रखनी होगी क्योंकि परिषद के नियमों के तहत इन देशों का मानवाधिकार के हवाले से ज़्यादा आकलन किया जाएगा. नई परिषद 15 मार्च को संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार मामलों की इस नई परिषद का गठन किया गया था. इस नई परिषद ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग का स्थान लिया है. संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संगठन को लेकर काफ़ी आलोचना हुई थी. कई देशों के मानवाधिकार संबंधी रिकॉर्ड ख़राब होने के बावजूद संगठन में उनकी सदस्यता बरक़रार थी. इस नई परिषद के गठन पर भी अमरीका को कुछ एतराज़ था. लेकिन संयुक्त राष्ट्र महासभा ने नई मानवाधिकार परिषद के गठन का प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित कर दिया था. अमरीका ने यह कहते हुए प्रस्ताव का विरोध किया था कि सूडान और क्यूबा जैसे देशों को प्रस्तावित परिषद में शामिल नहीं होने देना चाहिए था. अमरीका के अनुसार वे मानवाधिकारों का उल्लंघन करते रहे हैं. अमरीका ने इस नई परिषद में शामिल होने से इनकार कर दिया था. हालाँकि अमरीका का कहना था कि वह इस परिषद को मज़बूत बनाने में सदस्य देशों के साथ सहयोग करेगा. यह उम्मीद की जा रही थी कि इस परिषद में वे देश सदस्य नहीं बन पाएंगे जिनका मानवाधिकार संबंधी रिकॉर्ड अच्छा नहीं है. लेकिन सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे कुछ देश इसकी सदस्यता लेने में कामयाब रहे इसलिए इस नई परिषद से भी लोगों को कुछ हद तक निराशा ही हुई है. साथ ही इस परिषद पर भी पिछले आयोग की तरह ही सवालिया निशान लगता नज़र आ रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें नई सुरक्षा परिषद: कुछ सवाल-जवाब 14 सितंबर, 2005 | पहला पन्ना चुनौतियों भरा है संयुक्त राष्ट्र का कल14 सितंबर, 2005 | पहला पन्ना संयुक्त राष्ट्र के 60 साल: कुछ उपलब्धियाँ, कई विफलताएँ14 सितंबर, 2005 | पहला पन्ना ग्वांतनामो की वैधानिकता पर चिंता19 नवंबर, 2005 | पहला पन्ना नाकाम राष्ट्रों की सूची में पाकिस्तान ऊपर02 मई, 2006 | भारत और पड़ोस शांति वार्ता में मदद को तैयार: संयुक्त राष्ट्र08 मई, 2006 | भारत और पड़ोस प्रताड़ना पर अमरीका से सवाल-जवाब05 मई, 2006 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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