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बुधवार, 10 मई, 2006 को 13:56 GMT तक के समाचार
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फ्रांस में 'दासप्रथा स्मरण दिवस'
सेनेगल में दासप्रथा के विरोध में बनी एक प्रतिमा
फ्रांस के कुछ पूर्व उपनिवेश देशों में भी दासप्रथा स्मरण दिवस मनाया गया
दास प्रथा से प्रभावितों की याद में राष्ट्रीय दिवस मनाने वाला फ्रांस यूरोप का पहला देश बन रहा है.

फ्रांस के राष्ट्रपति ज़्याक शिराक ने कहा है कि 'दासप्रथा नामक शैतान' को भुलाया नहीं जाना चाहिए और इसके लिए उन्होंने हर साल दस मई को दासप्रथा स्मरण दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है.

इस अवसर पर बुधवार को राजधानी पेरिस में एक विशेष समारोह हुआ जिसमें ख़ुद राष्ट्रपति शिराक भी शामिल हुए.

पेरिस के लक्ज़मबर्ग गार्डन्स में एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया और फ्रांस के कुछ अन्य शहरों में भी विशेष आयोजन हुए.

फ्रांस का उपनिवेश रह चुके सेनेगल में भी दासप्रथा स्मरण दिवस मनाया गया है. सेनेगल से बहुत से अफ्रीकी दासों को कैरीबियाई क्षेत्र में खेतों में काम करने के लिए भेजा गया था.

कैरीबियाई क्षेत्र में फ्रांस के उपनिवेश रह चुके देशों में लोगों को ज़ंजीरों में बांधकर खेती कराने के लिए भेजा जाता था हालाँकि फ्रांस के अंदर दासप्रथा पर 1848 में ही पाबंदी लगा दी गई थी.

शिराक की कोशिश

लेकिन फ्रांस के औपनिवेशिक अतीत को याद करने के कुछ उपायों के लिए शिराक की आलोचना भी की गई है.

ज़्याक शिराक
शिराक का कहना है कि दासप्रथा नामक शैतान को भुलाया नहीं जाना चाहिए

पाँच साल पहले दस मई को ही फ्रांस की सीनेट ने एक ऐसा क़ानून पारित किया था जिसमें दास प्रथा को मानवता के ख़िलाफ़ अपराध क़रार दिया गया था.

अब राष्ट्रपति ज़्याक शिराक चाहते हैं कि फ्रांस अपने "इतिहास पर लगे इस अमिट कलंक" को कभी ना भुलाए.

लेकिन शिराक सिर्फ़ अतीत की तरफ़ ही नहीं देख रहे हैं उन्होंने आधुनिक काल में भी दास प्रथा के समान प्रथाओं के ख़िलाफ़ लड़ाई का वादा किया है.

अब कहीं भी बंधुआ मज़दूरी होती है तो उसे फ्रांस की अदालतों में चुनौती दी जा सकती है.

शिराक ने एक ऐसे क़ानून की भी हिमायत की है जिसके तहत स्कूलों में यह पढ़ाने की बात है कि दास प्रथा का कैसा असर होता रहा है. हालाँकि इस क़ानून पर विवाद उठे हैं.

लेकिन कुछ इतिहासविदों को आपत्ति है कि सरकार अब यह आदेश दे रही है कि कक्षाओं में इतिहास को किस तरह पढ़ाया जाए जबकि कुछ आलोचकों का यह भी कहना है कि इससे फ्रांसीसी उपनिवेश रह चुके देशों में किए गए अच्छे कार्यों को भी महत्व देना स्कूलों के लिए ज़रूरी नहीं होगा.

विश्लेषकों का कहना है कि इसमें कम ही शक है कि अब से हर साल दस मई को मनाए जाने वाले दासप्रथा स्मरण दिवस के मौक़े पर फ्रांस और उसके औपनिवेशिक अतीत पर ज़ोरदार बहस हुआ करेगी.

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