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मंगलवार, 04 अप्रैल, 2006 को 13:07 GMT तक के समाचार
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फ्रांस का विवादास्पद रोज़गार क़ानून?
फ्रांस में प्रदर्शन की तैयारी
बीबीसी संवाददाता का मानना है कि श्रम संगठनों को जीत का आभास हो रहा है
फ्रांस में नए रोज़गार क़ानून के विरोध में देशव्यापी प्रदर्शन हुए हैं, आख़िर ऐसा क्या है इस क़ानून में जो इतना बड़ा विवाद खड़ा हो गया है?

सीपीई नाम के इस नए रोज़गार क़ानून में रोज़गार के समान अवसरों की बात कही गई है. ये एक तरह का ऐसा रोज़गार अनुबंध होगा जिसके तहत 26 साल से कम उम्र के लोगों को नौकरी दिए जाने के समय दो साल का अभ्यासकाल पूरा करना होगा उसके बाद ही उनकी नौकरी पक्की हो सकेगी, लेकिन इसी दौरान अगर उन्हें योग्य नहीं पाया गया, तो उन्हें आसानी से नौकरी से निकाला जा सकता है.

इसके अलावा मालिकों को ये हक़ होगा कि वे नौकरी देने के एक महीने बाद नौकरी ख़त्म करने के लिए दो हफ्ते का नोटिस दें और 6 महीने पूरे होने के बाद नोटिस का समय बढा कर एक महीने कर दिया जाएगा.

इस कानून को क्यों लाया गया?

फ्रांस में बढ़ती बेरोज़गारी के आंकड़ों को नीचे लाने के लिए और श्रम बाज़ार को और लचीला बनाने के लिए ये कानून लाया गया. पूरे यूरोप में फ्रांस ऐसा देश है, जहां युवाओं में बेरोज़गारी के आंकड़े सबसे ऊपर हैं. यानी राष्ट्रीय औसत 9.6 फीसदी से दोगुने हैं. फिलहाल देश में 18 से 25 की उम्र के लगभग 20 फीसदी युवा बेरोज़गार हैं.

इस क़ानून के पक्ष और विपक्ष में क्या तर्क दिए जा रहे हैं?

सरकार का ये कहना है कि इससे बेरोज़गारी की समस्या से निपटने में और श्रम बाज़ार में आए गतिरोध को दूर करने में मदद मिलेगी, साथ ही इस क़ानून के अंतर्गत 18 से 25 साल की उम्र के ज़्यादा से ज़्यादा बेरोज़गारों को नौकरी दी जा सकेगी, लेकिन क़ानून के आलोचकों का कहना है कि इससे युवा वर्ग को पक्की नौकरी मिलना और मुश्किल हो जाएगा क्योंकि मालिक दो साल के अभ्यास काल का फ़ायदा उठा कर उन्हें नौकरी से निकालते रहेंगे. श्रम संगठनों की चिंता है, कि नए क़ानून का इस्तेमाल कर मालिक युवाओं का शोषण करेंगे इसलिए उनकी मांग है कि इस श्रम कानून को रद्द किया जाए.

इस श्रम क़ानून के विरोध में फ्रांस में सड़कों पर जो प्रदर्शन हो रहे हैं क्या साल 2005 में हुए दंगों से उनका कोई संबंध हो सकता है?

साल 2005 में जो दंगे हुए थे वे फ्रांस के सुदूरवर्ती शहरों में ग़रीबी और बेरोज़गारी की अनदेखी कर रही सरकार के ख़िलाफ़ युवावर्ग के आक्रोश के कारण हुए थे, सरकार पर ये आरोप लगाए गए थे, कि वो जातीय भेदभाव बरत रही है लेकिन इस साल 28 मार्च से जो विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हुआ है वो लाखों छात्रों और बेरोज़गार युवकों ने इस सीपीई श्रम क़ानून के विरोध में चलाया है.

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