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सोमवार, 26 सितंबर, 2005 को 11:04 GMT तक के समाचार
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भारत ने कहा: फ़ैसला ईरान के हित में

ईरान का परमाणु संयंत्र
ईरान के परमाणु कार्यक्रम का यूरोपीय संघ और अमरीका विरोध करते रहे हैं
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के ईरान प्रस्ताव के पक्ष में मत डालने पर भारत सरकार ने एक बार फिर अपनी सफ़ाई देने की कोशिश की है.

अबकी बार भारत ने कहा है कि वह तो मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है और उसने प्रस्ताव के पक्ष में मत इसलिए दिया है क्योंकि यह ईरान के हित में है.

इससे पहले भारत ने अपनी सफ़ाई में कहा था कि उसने मतदान को लेकर जो फ़ैसला किया है उसका अमरीका के साथ हुए परमाणु समझौते से कोई लेना देना नहीं है.

उल्लेखनीय है कि सरकार को समर्थन दे रहे वामपंथी दलों ने भारत सरकार के इस फ़ैसले की निंदा की है.

इसके बाद विदेश सचिव श्याम सरन ने एक पत्रकारवार्ता बुलवाई थी जिसमें उन्होंने कहा कि तीन यूरोपीय देशों, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस या ईयू-3 और ईरान सहित कुछ अन्य देशों से इस सिलसिले में उसने बीच-बचाव की बहुत कोशिश की और एक प्रकार मध्यस्थ तक की भूमिका निभाई.

जब पूछा गया कि क्या उन 12 देशों की तरह मत न डालना भारत की विदेश नीति और ईरान से गहरे संबंधों को देखते हुए ज़्यादा उचित न होता, तो विदेश सचिव ने कहा कि वार्ताओं के समय भारत ने ईयू-3 देशों से प्रस्ताव में कई संशोधनों पर बातचीत की थी.

उनका कहना है कि इससे ये हुआ कि ईयू-3 देश ईरान को फ़ौरन सुरक्षा परिषद के सामने न ले जाने और उसे बातचीत के लिए और समय देने के लिए राज़ी हो गए और प्रस्ताव बदल दिया गया.

श्याम सरन की राय थी कि “ऐसी पस्थिति में मतदान में भाग न लेना या मत न डालना ठीक नहीं होता.”

भारत का अब यह कहना है कि यह प्रस्ताव इसलिए ज़रूरी था क्योंकि यह ईरान को परमाणु अप्रसार संधि के तहत और फिर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के भी तहत रखने में मददगार साबित हुआ.

भारत के विदेश सचिव ने इस बात का सीधे जवाब नहीं दिया कि ईरान परमाणु हथियार तैयार कर रहा है या नहीं और इस बारे में भारत की क्या राय है.

श्याम सरन ने कई बार कहा कि यह फ़ैसला भारत ने अपने हितों के बारे में समझकर और ईरान के हित में लिया है.

लेकिन अभी हाल ही में अमरीकी संसद में चर्चा के दौरान कई अमरीकी सांसदों और फिर प्रशासन के कई प्रतिनिधियों द्वारा दो टूक यह कहे जाने पर कि भारत की ईरान से नज़दीकी से वह बहुत चिंतित है. और इसका असर अमरीकी कांग्रेस द्वारा भारत-अमरीकी परमाणु संधि या रवैये पर पड़ेगा, यह स्वीकार करना मुश्किल है कि भारत के इस फ़ैसले में किसी भी प्रकार के अमरीकी दबाव नहीं है.

अभी नवम्बर में आईएईए की एक बार फिर बैठक होगी और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर विस्तृत चर्चा होगी.

भाजपा ने उठाए सवाल

भारत के प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने इस मामले पर आज सरकार से कई सवाल पूछे हैं.

लेकिन यह दिलचस्प है कि भाजपा ने सिर्फ़ निर्णय लेने की शैली आदि पर सवाल पूछे हैं लेकिन इस फ़ैसले के बारे में अपनी कोई राय नहीं दी है.

पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि सरकार को बताना चाहिए कि यह फ़ैसला कहाँ हुआ और किसने लिया है.

उन्होंने पूछा कि ऐसा करने से पहले विपक्ष को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया.

उन्होंने पूछा कि इस राजनीतिक प्रक्रिया के मामले में कोई राजनीतिक सामने क्यों नहीं आ रहा है और सिर्फ़ अधिकारियों को सामने क्यों लाया जा रहा है.

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