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सोमवार, 19 सितंबर, 2005 को 09:26 GMT तक के समाचार
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क्या है उत्तर कोरिया का मामला?
कोरिया पर बातचीत
छह राष्ट्र शामिल हुए इस बातचीत में
उत्तर कोरिया अंततः इस बात पर राज़ी हो गया कि वह अपना परमाणु कार्यक्रम रोक दे, हथियार निरीक्षकों को निरीक्षण की अनुमति दे और परमाणु अप्रसार संधि में फिर शामिल हो जाए.

आइए, इस मसले से जुड़े कुछ पहलुओं पर नज़र डालें.

क्या इस समझौते का कोई महत्व है?

हाँ. उत्तर कोरिया और अमरीका के बीच जो टकराव की स्थिति बनी हुई थी वह पूर्व एशिया की लघुकालीन और दीर्घकालीन सुरक्षा के लिए शायद सबसे गंभीर ख़तरा थी और इस तनाव को कम करने का कोई भी क़दम स्वागत योग्य है.

लेकिन हालाँकि समझौता सिद्धांत रूप में उत्साहजनक लगता है, सबसे ज़्यादा मुश्किल मामलों को सुलझाने के कोई प्रयास नज़र नहीं आ रहे हैं.

हम उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार कार्यक्रम के बारे में क्या जानते हैं?

उत्तर कोरिया का दावा है कि उसके पास परमाणु हथियार हैं और वह अपना असलहा बढ़ाने पर काम कर रहा था.

लेकिन बाक़ी दुनिया के सामने समस्या यह है कि इन दावों की पुष्टि कर पाना बहुत मुश्किल है.

अधिकतर विशेषज्ञों को संदेह है कि उत्तर कोरिया ने 1994 तक एक सक्रिय परमाणु हथियार कार्यक्रम पर काम किया. यह वह वर्ष था जब उसने सभी परमाणु संबद्ध गतिविधियों पर रोक लगाने के एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

लेकिन दिसंबर, 2002 में उसने यॉंगब्यॉन में एक बार फिर अपने परमाणु रियैक्टर की शुरुआत कर दी और संयुक्त राष्ट्र के दो परमाणु निरीक्षकों को देश से जाने पर मजबूर कर दिया.

यह स्पष्ट नहीं है कि उसके बाद से यॉंगब्यॉन में कितना काम हुआ है या कितनी प्रगति हुई है.

उत्तर कोरिया के पास इस समय कितने हथियार हैं?

यह तब तक पता कर पाना मुश्किल है जब तक अंतरराष्ट्रीय अणु ऊर्जा एजेंसी की जाँच पूरी नहीं हो जाती. विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर कोरिया ने इतना प्लूटोनियम ज़रूर निकाल लिया होगा जिससे कुछ बम बनाए जा सकें.

अमरीकी अधिकारियों का मानना है कि इन बमों की संख्या एक या दो हो सकती है.

क्या 19 सितंबर को हुए समझौते से इसका निदान हो पाएगा?

शायद. लेकिन तुरंत नहीं.

कुछ बहुत अहम विषयों का इस समझौते में उल्लेख नहीं है. जैसे कि उत्तर कोरिया का अब तक अज्ञात यूरेनियम कार्यक्रम, या फिर उत्तर कोरिया के वर्तमान परमाणु संयंत्रों का क्या होगा.

इन मामलों पर भावी वार्ताओं में विचार-विमर्श होना ज़रूरी है और अमरीका और उत्तर कोरिया के बीच जो आपसी विश्वास का अभाव है उसे देखते हुए इस बात के पूरे आसार हैं कि कभी भी मामला खटाई में पड़ सकता है.

यह सारा झगड़ा आख़िर है क्या?

अमरीका और उत्तर कोरिया के बीच संबंध तब से बिगड़े हैं जब से राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने जनवरी 2002 में उत्तर कोरिया को दुष्टता की धुरी का एक हिस्सा बताया.

उसके बाद के अक्तूबर में तनाव और बढ़ गया जब अमरीका ने उत्तर कोरिया पर एक गोपनीय, यूरेनियम से जुड़ा परमाणु हथियार कार्यक्रम चलाने का आरोप लगाया.

इसके बाद उत्तर कोरिया ने अपना एक परमाणु संयंत्र शुरु किया, हथियार निरीक्षकों को देश से बाहर निकाला और वह परमाणु अप्रसार संधि से बाहर हो गया.

इसके बाद ही उसने परमाणु युद्ध के ख़तरे की धमकी भी दे डाली.

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