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परमाणु ऊर्जा सहयोग पर बुश का वादा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भारत के साथ परमाणु सहयोग को लेकर प्रतिबद्धता जताई है. न्यूयॉर्क में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ हुई बातचीत में अमरीकी राष्ट्रपति बुश ने ये विचार व्यक्त किए. दोनों नेताओं के बीच क़रीब आधे घंटे तक बातचीत चली. बातचीत के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में भारत के विदेश सचिव श्याम सरन ने बताया कि दोनों नेताओं के बीच ईरान के मुद्दे पर भी बातचीत हुई. बाद में प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार संजय बारू ने पत्रकारों को बताया कि पाकिस्तान के बारे में भी चर्चा हुई और प्रधानमंत्री ने कहा कि पाकिस्तान अभी भी 'आतंक के प्रवाह' को नियंत्रित करता है. पिछले दिनों कुछ अमरीकी सांसदों ने भारत और ईरान के बीच संबंधों पर सवाल उठाए थे. श्याम सरन ने पत्रकारों के सवालों के जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि भारत की ईरान नीति में कोई बदलाव नहीं आया है. उन्होंने कहा कि भारत का ये रुख़ रहा है कि अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर ईरान ने जो वादे किए हैं, वो उसे पूरा करे. भारत अपनी बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों के लिए गैस पाइपलाइन की एक बड़ी परियोजना पर काम करना चाहता है जिसमें ईरान और पाकिस्तान की भी साझेदारी होगी. ईरान से पाइपलाइन के ज़रिए गैस लाने की भारत की योजना से भी अमरीका ख़ुश नहीं है, इस योजना को लेकर अमरीका सार्वजनिक रूप से अपनी चिंताएँ प्रकट कर चुका है. सवाल ईरान के साथ संबंधों पर अमरीका की नाराज़गी के कारण ये सवाल उठने लगे थे कि पिछले दिनों दोनों देशों के बीच हुए परमाणु समझौता लागू हो पाएगा या नहीं. दरअसल इस परमाणु समझौते को लागू करने के लिए अमरीकी क़ानून में बदलाव की ज़रूरत है. लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ बातचीत में राष्ट्रपति बुश ने इस समझौते को लेकर अपनी प्रतिबद्धता ज़ाहिर की. इस साल जुलाई में ही भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के बीच बातचीत हुई थी. जिसके बाद जारी एक संयुक्त बयान में कहा गया था कि अमरीका परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत को हरसंभव सहायता देने के लिए तैयार है. 1998 में भारत ने परमाणु परीक्षण किया था, जिसके बाद अमरीका ने भारत को परमाणु तकनीक देने पर रोक लगा दी थी. |
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