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साइनागॉग न तोड़ने पर विवाद छिड़ा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इसराइल ने फ़ैसला किया है कि ग़ज़ा पट्टी से उसके सैनिकों के पूरी तरह बाहर निकलने से पहले यहूदी साइनागॉग नहीं तोड़े जाएँगे. इससे पहले यहूदी धार्मिक नेताओं ने कहा था कि साइनागॉग को नष्ट करना धर्म के ख़िलाफ़ होगा. इसके बाद कैबिनेट मंत्रियों की एक बैठक में तय किया गया कि इन इमारतों को उसी हालत में छोड़ दिया जाए और एक प्रवक्ता ने उम्मीद ज़ाहिर की कि फ़लस्तीनी उन इमारतों का सम्मान करेंगे. हालाँकि फ़लस्तीनी उप प्रधानमंत्री नबील शाथ ने बीबीसी से एक बातचीत में इस निर्णय पर क्षोभ प्रकट किया और कहा कि इससे भविष्य में और समस्याएँ पैदा होंगी. कब्ज़े का अंत इसराइल ने ग़ज़ा पट्टी में सैन्य शासन के अंत का औपचारिक तौर पर ऐलान कर दिया है और अब 38 साल के क़ब्ज़े के बाद वहाँ से अंतिम सैनिक टुकड़ियों के बाहर निकलने का रास्ता साफ़ हो गया है. कैबिनेट मंत्रियों के मतदान के कुछ घंटे बाद ही ग़ज़ा को फ़लस्तीनी प्रशासन के सुपुर्द करने की कार्रवाई शुरू हो जाएगी. मंत्रिमंडल ने ग़ज़ा-मिस्र सीमा भी मिस्र के नियंत्रण मे दिए जाने का अनुमोदन कर दिया. इसराइल ने पहले ही ग़ज़ा से यहूदी निवासी बाहर निकाल लिए हैं और उनके मकानों को गिरा दिया है. इसके अलावा वहाँ स्थित इसराइली सैनिक अड्डे भी ध्वस्त कर दिए गए हैं.
लेकिन जैसाकि यरुशलम में बीबीसी संवाददाता लूसी विलियमसन का कहना है, इसराइली मंत्रिमंडल के लिए साइनागॉग का मामला एक टेढ़ी खीर बना हुआ था. प्रमुख यहूदी धार्मिक नेताओं ने अपील की थी कि इन साइनागॉग को वैसे का वैसा ही छोड़ दिया जाए क्योंकि उनका तर्क है कि उन्हें ध्वस्त करने से इमारत को नुक़सान पहुँचेगा. लेकिन इन्हें ध्वस्त करने की हिमायत करने वालों का कहना है कि फ़लस्तीनियों का साइनागॉग को नष्ट करना और ज़्यादा ख़राब बात होगी. फ़लस्तीनी अधिकारियों ने कहा था कि वे पिछले शासन के प्रतीक किसी भी चिन्ह की सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकते हैं और उन्होंने इसराइल से कहा है कि वे स्वंय इन्हें नष्ट कर दें. यदि मंत्री इन्हें गिराने की मंज़ूरी दे देते हैं तो उसके बाद यानी सोमवार से ही अंतिम सैन्य टुकड़ियों की वापसी शुरू हो पाएगी. समझा जा रहा है कि इसराइलियों के पूरी तरह बाहर निकलने के बाद ग़ज़ा के लोग सड़कों पर निकल कर जश्न मनाएँगे. |
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