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ख़त्म नहीं हुआ है तालेबान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका और सहयोगी देशों के सैनिक कई महीनों से उत्तरी अफ़गानिस्तान के कठिन इलाकों से तालेबान समर्थक कट्टरपंथियों को खदेड़ने में लगे हैं. इनमें तालेबान समर्थकों के अलावा एक दूसरे गुट हिज़्ब-ए-इस्लामी-गुलबुद्दिन के सदस्य भी हैं. इस गुट के नेताओं ने भी तालेबान की तरह अमरीकियों के ख़िलाफ़ जेहाद या धर्म युद्ध छेड़ रखा है और राष्ट्रपति हामिद करज़ई की सरकार तो सत्ता से हटाने की मुहिम में लगे हैं. बहुत कम लोगों को विश्वास है कि इस गुट के लोग अपने मक़सद में क़ामयाब हो पाएँगे, हालाँकि इन लोगों ने काफ़ी नुकसान पहुँचाया है. संघर्ष का दौर बसंत ऋतु के आते ही लड़ाई की घटनाओं में बढ़ोतरी हो जाती हैं क्योंकि इस दौरान पहाड़ियों पर बर्फ़ पिघलने लगती है और दर्रों व तंग घाटियों के रास्ते तालेबान विद्रोहियों के लिए खुल जाते हैं. ऐसे समय में अफ़गानिस्तान की सीमा से सटे पाकिस्तान के क़बीलाई इलाकों से भी विद्रोहियों को आने-जाने में आसानी होती है.
80 के दशक में सोवियत सेनाओं के कब्ज़े के दौरान भी यही कहानी थी. अमरीकी सेना के कमांडरों का कहना है कि इस बार अधिक लड़ाई नहीं होगी. उनका मानना है कि उन्होंने तालेबान विद्रोहियों को भागने पर मजबूर कर दिया है. लेकिन पिछले तीन वर्षों की बात करें तो इस वर्ष सबसे अधिक ख़ून-ख़राबा हुआ है. कुछ इलाक़ों में तो रोज़ाना लड़ाई हो रही है. अनुमान है कि पिछले तीन महीनों के दौरान लगभग 450 लोग मारे गए है जिनमें 30 अमरीकी सैनिक भी शामिल हैं. लेकिन अमरीकी सेना का कहना है कि तालेबान विद्रोहियों को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ रहा है. अफ़गानिस्तान में अमरीकी कार्रवाई के सह कमांडर ब्रिगेडियर जेम्स चैंपियन का कहना हैं,"लड़ाई में बढ़ोत्तरी हमारी वजह से हो रही है. बसंत की यह लड़ाई उनकी नहीं हमारी है." हालाँकि इराक की तुलना में अफ़गानिस्तान में कम संख्या में अमरीकी सैनिक मारे गए हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों में मारे गए अमरीकी सैनिकों की संख्या पिछले वर्ष में इसी दौरान मारे गए सैनिकों से काफ़ी अधिक है. मौजूदगी तालेबान बहुल इलाकों में काम कर रहे सैनिकों और कमांडरों का मानना है कि अभी विद्रोही पूरी तरह से पीछे नहीं हटे हैं. उत्तरी अफ़गानिस्तान में अमरीकी सेना की कमान संभाल रहे कर्नल गैरी चीक का कहना है,"मैं नहीं मानता कि तलिबान के पीछे हटने की बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता, लेकिन यह एक धीमी प्रक्रिया है." वे बताते हैं कि अब कुछ उच्च स्तर के तलिबान नेता बचे हैं जो सिद्घांतों की बजाए अपनी व्यक्तिगत सत्ता के प्रति अधिक वफादार है और उन्हें संदेह है कि ऐसे नेता तालेबानी विचारधारा को छोड़ेगें. उनका आगे कहना था,"ऐसे लोग भविष्य में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए चरमपंथी गतिविधियाँ जारी रखेंगें. लेकिन ऐसे लोगों से अफ़गानिस्तान की प्रभुसत्ता को ख़तरा धीरे-धीरे कम होता चला जाएगा." कर्नल चीक का मानना है कि यह महत्वपूर्ण है कि हम सिर्फ़ दुश्मन का पीछा करते रहने में ही अपने आप को न बहलाए. उनका कहना है,"हमें लोगों का दोस्त बन कर रहने, पुलिस को प्रशिक्षित करने और सरकार के साथ काम करते हुए आधारभूत ढ़ांचे के पुर्ननिर्माण का काम करना चाहिए ताकि लोगों का सरकार में विश्वास पैदा हो." अभियान
कर्नल चीक पिछले छह महीनों से तालेबान विद्रोहियों को लड़ाई छोड़ देने को लिए मनाने के काम में भी लगे है. इस अभियान को 'एलीजिएंस' यानी को 'निष्टा' नाम दिया गया है. लगभग 50 से 100 कट्टर विद्रोहियों को छोड़ कर सभी को इसमें शामिल किया जा सकता है. इस कार्यक्रम के तहत राष्ट्रपति करज़ई की सरकार का समर्थन करने के बदले में उन्हें घर लौटने की इजाज़त होगी और उन्हें गिरफ्तार भी नहीं किया जाएगा. लेकिन यह एक अस्थाई कार्यक्रम है जिसे सरकार की पहल के पूर्व चलाया गया. उधऱ सरकारी पहल से साथ ही भ्रम की स्थिति पैदा हो गई. अफ़गान सरकार की ओर से नए गठित किए गए समन्वय आयोग के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर सिबगाहतुल्लाह मोजाद्देदी ने तालेबान नेता मुल्ला मोहम्मद उमर और हिज़्बे-ए-इस्लामी के नेता गुलब्बुद्दीन हिकमतयार को क्षमादान देने जैसी बात कही. लेकिन राष्ट्रपति करज़ई ने कुछ समय में ही साफ कर दिया कि ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है. उधर मुल्ला उमर ने कहा कि वो ऐसे किसी प्रस्ताव में दिलचस्पी भी नहीं रखते. फिर भी पूर्व कमांडर मालिम जान जैसे कुछ विद्रोही पाला बदल भी रहे है लेकिन बड़े पैमाने पर ऐसा कुछ देखने में नहीं आ रहा है. अनिश्चय
अफ़ग़ानिस्तान में गर्मियाँ शुरू हो चुकी हैं लेकिन अभी स्थिति को लेकर अनिश्चय बना हुआ है. सितंबर में होने वाले संसदीय चुनावों में कुछ नरमपंथी तालेबान कमांडरों की हिस्सेदारी के निर्णय से लगता है कि स्थिति में कुछ सुधार है. लेकिन दूसरी ओर कुछ ऐसी घटनाएँ भी है जिनसे स्थिति के बिगड़ने का आभास होता है. हाल ही में एक तालेबान विरोधी इस्लामी विद्वान की अंतयेष्टी के समय कंधार की एक मस्जिद में हुए बम विस्फोट में बीस लोग मारे गए थे. पिछले तीन वर्षों में होने वाला यह सबसे बड़ा बम हमला था. तालेबान ने पहले तो इस हमले की ज़िम्मेदारी ली, लेकिन फिर उसे नकार दिया. लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि इसमें किसी न किसी रुप में तालेबान का हाथ ज़रुर था. इस तरह दूसरे अन्य हमलों के चलते इस बात की आशा बहुत कम है कि अमरीकी सेना वापस बुला ली जाएगी. कुछ लोगों का मानना है कि तालेबान समर्थकों को दबा दिया गया है. लेकिन चरमपंथ का इतिहास गवाह है कि बड़ी बड़ी सेनाओं को थोड़े से ही लोग चरमपंथी गतिविधियों से पीछे धकेल सकते हैं. ऐसा समझा जा रहा है कि सक्रिय तालेबान विद्रोहियों की संख्या लगभग दो हज़ार होगी और कुछ हज़ार लोग गुलब्बुद्दीन हिकमतयार के समर्थक हो सकते है. लेकिन तालेबान को छोड़ने वाले लोगों की संख्या मे बढोतरी भी होती है, तो भी तालेबानी विद्रोह और उसके साथ-साथ बढ़ने वाली असुरक्षा की भावना लंबे समय तक जारी रह सकती है. |
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