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शुक्रवार, 09 सितंबर, 2005 को 11:23 GMT तक के समाचार
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बस एक वोट से जीत जाएँगी महिलाएँ
अफ़ग़ान महिलाएँ
संसद और प्रांतीय परिषदों में एक चौथाई सीटें महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित रखी गई हैं
अफ़गानिस्तान में 30 वर्षों में पहली बार होने वाले संसदीय चुनावों को लेकर ज़ाबुल की रज़बिया रंजबार ख़ासी उत्साहित हैं.

उनके उत्साहित होने की वजह 18 सितंबर के संसदीय चुनावों में होने वाली उनकी जीत है.

48 वर्षीय अध्यापिका को पता है कि उन्हें ज़्यादा वोट नहीं मिल पाएँगे, लेकिन इसके बावजूद वे जीत जाएँगी क्योंकि जीत के लिए उन्हें सिर्फ़ एक ही वोट चाहिए.

अफ़गानिस्तान के संविधान के मसौदे में संसद के निचले सदन ‘वोलेसी जिरगा’ में महिलाओं के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित रखी गईं हैं.

 स्थिति इतनी ख़राब है कि हम चुनाव प्रचार भी नहीं कर सकतीं
रज़बिया रंजबार, महिला उम्मीदवार

इतना ही आरक्षण सभी 34 प्रांतीय परिषदों के लिए भी तय है, जिसके लिए भी चुनाव होने हैं.

ज़ाबुल में इतनी कम महिलाएं चुनावों में खड़ी हो रही हैं कि प्रांतीय परिषद की तीन आरक्षित सीटों के लिए भी महिला उम्मीदवार उपलब्ध नहीं हैं.

ज़ाबुल में संसद और परिषद के चुनावों के लिए केवल पाँच महिला उम्मीदवार ही मैदान में है.

ग़ौरतलब है कि इसी प्रांत में अमरीका का सबसे अधिक विरोध हुआ है.

इसी तरह की समस्याएं अन्य दो प्रांतों में भी हैं.

धमकी और ख़तरे

दक्षिण के इस कट्टरवादी प्रांत में महिला उम्मीदवारों के लिए वोटों की समस्या बेशक न हो लेकिन दूसरी और कई समस्याएँ हैं जो उनके रास्ते का रोड़ा बनी हुई हैं.

तालिबान विद्रोहियों ने उम्मीदवारों और चुनाव में लगे लोगों के ख़िलाफ़ धमकियाँ जारी की हैं.

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तालिबान का ख़तरा बना हुआ है

अपने बुर्क़े में लिपटी रज़बिया रंजबार, ज़रमीना पठान और तूर पेकई को पता है कि उनके सामने कई तरह के ख़तरे हैं.

रज़बिया का कहना है,"स्थिति इतनी ख़राब है कि हम चुनाव प्रचार भी नहीं कर सकतीं."

कालात के आसपास एक या दो किलोमीटर तक ही सरकारी नियंत्रण है.

ज़रमीना का कहना है कि हाल ही में शहर की सीमा के पास स्थानीय अस्पताल की दवाईयाँ बाँटते समय उन पर तालिबान विद्रोहियों ने हमला कर दिया था और वो क़िस्मत वाली रहीं कि बच गईं.

उनका कहना है,"यह तो तब की बात है जब वो चुनावों में खड़ी भी नहीं हुई थीं. अब क्या होगा उसका अंदाज़ा आप लगा सकते हैं."

इस बीच मार्च के बाद से लड़ाई में तेज़ी आ गई है जिसमें 800 से अधिक लोग मारे जा चुके है.

पख़्तून बहुल इस दक्षिणी प्रांत में महिलाओं के लिए घरबार संभालने की ही परंपरा है.

अधिकाँश महिलाएँ बुर्क़ा पहन कर, मर्दों के साथ ही घर से बाहर निकलती हैं.

यहाँ साक्षरता का प्रतिशत अफ़गानिस्तान के औसत प्रतिशत से भी कम है.

असंतोष

 महिलाओं के आरक्षण के कारण मर्दों के अधिकार छिन रहे हैं. हम प्रजातंत्र के पश्चिमी ढ़ंग को अपने इस्लामी गणराज्य में कभी स्वीकार नहीं करेंगें
अहमदशाह अहमदज़ेई

महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण को लेकर कुछ रुढ़िवादी पार्टियों में काफी रोष है.

हिज़्ब-ए-इक्तेदार-ए-इस्लाम पार्टी के अहमदशाह अहमदज़ई का कहना है,"महिलाओं के आरक्षण के कारण मर्दों के अधिकार छिन रहे हैं. हम प्रजातंत्र के पश्चिमी ढ़ंग को अपने इस्लामी गणराज्य में कभी स्वीकार नहीं करेंगें, जो कि पश्चिमी देश हम पर थोपना चाहते है."

चुनावों में हिस्सा ले रहे एक पूर्व तालिबानी कंमाडर ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया,"पश्चिमी देश जिन अधिकारों की बात कर रहे हैं वो हमें मज़ूंर नहीं हैं. कुरान में महिलाओं को जो अधिकार दिए गए है वो ही काफी हैं."

साहसी महिलाएँ

 हम अल्लाह को शुक्र अदा करते हैं कि संविधान के नए मसौदे में महिलाओं को कुछ अधिकार दिए गए हैं, हालाँकि ये काफ़ी नहीं हैं
ज़रमीना पठान

चुनाव में खड़ी हो रही तीनों महिलाएँ निर्दलीय उम्मीदवार हैं.

ज़रमीना पठान का कहना है,"अगर हम किसी पार्टी से जुड़ी हुई होतीं तो महिलाओं के अधिकारों के लिए कभी भी खुल कर सामने नहीं आ पातीं."

उनका आगे कहना था,"इस देश में पिछले 30 सालों से महिलाओं की आवाज़ दबी हुई थी. हम अल्लाह को शुक्र अदा करते हैं कि संविधान के नए मसौदे में महिलाओं को कुछ अधिकार दिए गए हैं, हालाँकि ये काफ़ी नहीं हैं."

इसी तरह के विचार दूसरी महिलाओं के भी है.

तूर पकई का कहना है,"पाकिस्तान और इंडोनेशिया में महिलाएं ऊँचे ओहदों पर पहुँची हैं जबकि वो भी मुस्लिम देश हैं.”

कई और महिलाओं की तरह तूर पकई भी विधवा हैं. 22 साल पहले शादी के तीन महीनों बाद ही उनके पति मारे गए थे. उस समय वे गर्भवती थीं.

अपने सिद्धांतो पर अडिग रहने वाली तूर ने अपने ससुर की अनुमति मिलने के बावजूद दोबारा शादी करने से इंकार कर दिया था.

चुनावों में जीत जाने पर तीनों महिलाएं ससुर से अनुमति लेने की इस परंपरा को ख़त्म करना चाहतीं है.

पकई का कहना है “विधवा महिला को यह अधिकार होना चाहिए कि वो जिससे चाहे शादी कर सके”.

सहायता एज़ेसियों के अनुसार केवल काबुल में ही लगभग 50,000 विधवाएँ हैं और उनमें से कई बिना घरबार के हैं.

अधिकार और सीमा

महिलाओं के अधिकारों की बात करते हुए तूर पकई इस बात पर ज़ोर देती हैं कि अधिकार एक सीमा के अंदर ही होने चाहिए.

उनका कहना है कि हम इस्लामी समाज में रहते हैं, हमें अपने अधिकार तो चाहिए लेकिन यह शरिया क़ानून के अनुसार ही होने चाहिएं.

उनका कहना है,"मैं इस बात की हिमायती हूँ कि महिलाओं को किसी मर्द रिश्तेदार के साथ ही घर से बाहर निकलना चाहिए."

उन्होंने बताया कि किस तरह से जर्मनी की एक सहायता एजेंसी ने उन्हें चुनाव संबधी प्रशिक्षण के लिए जर्मनी भेजने की बात कही थी, और उन्होंने बिना क़ानूनी संरक्षक के वहाँ जाने से इंकार कर दिया था.

दक्षिणी प्रांतों की कई महिलाओं की तरह ही इन तीनों महिलाओं ने भी अपनी तस्वीर खिंचवाने से मना कर दिया.

66मैदान में बहादुर महिला
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