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कितना कामयाब रहा मध्य पूर्व रोडमैप? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वर्ष 2003 में इराक़ पर अमरीकी हमले के दौरान ही, अमरीका ने घोषणा की थी कि वह अगले दो वर्षों में मध्य पूर्व में शांति स्थापित करना चाहता है, इसी योजना को रोडमैप कहा गया. रोडमैप के चरणबद्ध मंसूबे क्या थे? *पहला चरण(मई 2003)- फ़लस्तीनी हिंसा पर रोक. फ़लस्तीनी राजनीतिक सुधार. बस्तियाँ बसाने के इसराइली क़दम पर रोक और सैनिकों की वापसी. फ़लस्तीनी चुनाव. रोडमैप की घोषणा का राजनीतिक मक़सद क्या था? रोडमैप की घोषणा करके अमरीकी राष्ट्रपति बुश ने दुनिया को संदेश देने की कोशिश की वे मध्य पूर्व समस्या के प्रति चिंतित हैं. उन्होंने व्यापक अरब जगत को यह भरोसा दिलाना चाहा कि इराक़ पर हमले का यह अर्थ नहीं है कि वे मुसलमानों या अरबों के ख़िलाफ़ हैं, बल्कि वे फ़लस्तीनियों की समस्या को सुलझाना चाहते हैं. कितनी अहम रही है अमरीका की भूमिका? बहुत अहम. अमरीका ही एकमात्र ऐसा देश है जो मध्य पूर्व में वास्तव में कुछ कर सकता है. अन्य देशों और मध्यस्थों के ज़रिए भी कुछ प्रगति हो सकती है, लेकिन इसराइल का यूरोपीय संघ, रूस या संयुक्त राष्ट्र पर ज़्यादा भरोसा नहीं है. अधिकतर विश्लेषकों का भी मानना है अमरीका की सक्रियता से ही कोई समाधान निकल सकता है. तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्री कॉलिन पॉवेल और मौजूदा विदेश मंत्री कॉन्डोलिज़ा राइस कई बार इलाक़े का दौरा कर चुकी हैं. अन्य शांति योजनाओं की तरह रोडमैप भी नाकाम हो गया है? जहाँ तक चरणबद्ध प्रगति की बात है तो रोडमैप को नाकाम ही कहा जाएगा. इस रोडमैप का लक्ष्य तो यह था कि वर्ष 2005 तक पूरे मामले का अंतिम हल निकल जाएगा, 2003 तक ही फ़लस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की बात थी. लेकिन 2003 से लेकर 2005 के बीच स्थितियाँ बहुत बदलीं, सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि शीर्ष फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात का निधन हो गया. रोडमैप को कोई ठोस सफलता तो नहीं मिली लेकिन उसके ज़रिए शांति वार्ता की प्रक्रिया रूक-रूककर चलती रही. क्या कारण रहे रोडमैप की नाकामी के? रोडमैप समयसीमा के भीतर अपने लक्ष्यों को हासिल नहीं कर सका इसके पीछे कई वजहें हैं, और सभी पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं. लेकिन मोटे तौर पर फ़लस्तीनी चरमपंथियों की हिंसा और इसराइल की सख़्त सैनिक कार्रवाई ही इसकी नाकामी का कारण रहे. इसके अलावा, दिवंगत शीर्ष नेता अराफ़ात को इसमें शामिल करने को लेकर भी विवाद रहा, इसके अलावा इसराइली सरकार और फ़लस्तीनी प्रशासन में भी इसको लेकर गहरे आंतरिक मतभेद रहे. क्या गज़ा से यहूदी बस्तियाँ हटने के बाद शांति प्रक्रिया आगे बढ़ेगी? ज़ाहिर है, फ़लस्तीनी इस परिवर्तन से ख़ासे उत्साहित हैं और अब उन्हें लगने लगा है कि गज़ा की तरह पश्चिमी तट से भी यहूदी बस्तियाँ हटाई जा सकती हैं. इसराइल का कहना है कि उसे सुरक्षा की गारंटी चाहिए तभी वह आगे कोई रियायत देने के बारे में सोचेगा, अगर वाक़ई चरमपंथी हिंसा में स्पष्ट रूप से कमी आती है और इसराइल की तरफ़ से कोई आक्रामक कार्रवाई नहीं होती तो शांति प्रक्रिया रचनात्मक दिशा में बढ़ सकती है. व्यावहारिक तौर पर ऐसा हो पाएगा या नहीं, कोई दावे के साथ नहीं कह सकता. |
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