|
लंदन सात जुलाई के बाद... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यह केंद्रीय लंदन में एक भीड़-भाड़ वाली ट्रेन है और मैं एशियाई मूल के एक व्यक्ति के सामने बैठा हूँ जिसके पास एक बड़ा बैग है और ऐसा लगता है कि उसमें लैपटॉप कंप्यूटर है. क्या यह इत्तेफ़ाक है कि हमारे पास कोई और नहीं बैठा है? क्या इसे भी कोई इत्तेफ़ाक कहा जाए कि उसने अपना पहचान-पत्र बाहर लगा रखा है ताकि जैकेट पर साफ़-साफ़ नज़र आ सके? यह पहचान-पत्र किसी बड़ी कंपनी का है और पासपोर्ट के एक खुले पन्ने की तरह लटक रहा है. रेलगाड़ी एक ऐसी दुनिया हो सकती है जहाँ सिफ़ इशारे और हाव-भाव बोलते हैं. लेकिन क्या मेरा यह सोचना सही है कि वह आदमी कुछ सतर्क और बेचैन नज़र आ रहा है और कभी-कभी अपना चेहरा अपने हाथों में छुपा लेता है - जैसे कि उसे नींद आ रही हो... जब एक महिला रेलगाड़ी में चढ़ती है और हमारी तरफ़ आधा रुख़ करने के बाद ही दूसरी तरफ़ पलट जाती है, तो क्या यह उसका सोचा-समझा फ़ैसला होता है? या सिर्फ़ एक सामान्य सा व्यवहार? यह देखकर कैसा लगता है कि जब कोई जनबूझकर आपकी तरफ़ से मुँह फेर लेता है? मैं एक ट्रेन से उतरकर दूसरी ट्रेन में बैठता हूँ तो एक ऐसी महिला के पास बैठता हूँ जिसने 'इस्लामी परिधान' पहन रखे हैं. लेकिन इस बार उस महिला के आसपास सभी सीटें भरी हुई हैं और माहौल भी हल्का-फुल्का नज़र आता है. इन यात्रियों के दिमाग़ों में भला क्या चल रहा है? वे आख़िर किन नतीजों और फ़ैसलों पर विचार कर रहे हैं? यह एक ऐसा दिमाग़ी खेल है जो सभी भूमिगत रेलगाड़ियों और दरअसल पूरे देश में बसों और तमाम रेलगाड़ियों में चल रहा है. ख़ामोश ज़ुबान इसकी ज़ुबान ख़ामोशी होती है और खेलने वालों के दिमाग़ों में अपने पड़ोसियों के इरादों के बारे में संदेह होता है, इतना ही नहीं, वे इस संदेह की भावना के लिए ख़ुद अपराध बोध से भी ग्रसित होते हैं. लंदन में हुए बम धमाकों के बाद ऐसी बहुत सी कहानियाँ सुनने को मिली हैं कि लोगों ने 'संदेहास्पद' यात्रियों की वजह से अपनी सीटें बदली हैं और इस बर्ताव का निशाना बनने वाले लोगों ने भी अपनी हताशा और निराशा की भी बातें की हैं. ऐसा भी होता है कि यात्रियों के दिमाग़ों में बहुत कुछ चल रहा होता है लेकिन वे इसके बारे में बात नहीं करते हैं. इस डर के तहत लोग अपनी यात्रा का रास्ता बदलते हैं.
बीबीसी को सैकड़ों ऐसे ई-मेल मिले हैं जिनसे लोगों में अनकही बेचैनी का पता चलता है और लोगों के दिमाग़ों में क्या-क्या ख़याल आ रहे हैं और इससे लोगों के बर्ताव में कैसे-कैसे बदलाव हो रहा है. बहुत से लोगों ने पीठ पर रखकर चलने वाले बैग ले जाने बंद कर दिए हैं, बहुत से लोगों ने भूमिगत रेलों से चलना बंद कर दिया है और कुछ ने तो अपने कपड़ों में ही परिवर्तन कर लिया है. ग्रीस मूल के एक व्यक्ति मार्कस का कहना है कि उनके परिवार ने भूमिगत रेल में सफ़र के दौरान लोगों की संदेहभरी निगाहों से बचने के लिए एक नई रणनीति बनाई है. इस रणनीति के तहत वह अपनी कलाई पर एक ऐसी पट्टी बांधते हैं जिस पर जी-8 देशों का नारा-'मेक पॉवर्टी हिस्ट्री' लिखा है और साथ ही वह इकॉनोमिस्ट पत्रिका पढ़ते हैं. मार्कस कहते हैं, "हालाँकि यह वाहियात सा नज़र आता है लेकिन इससे मेरे आसपास बैठने वाले लोग कुछ आश्वस्त और बेफ़िक्र नज़र आते हैं. यह वाक़ई वाहियात है लेकिन क्या करें, यह कुछ ऐसा ही समय है जिससे हम गुज़र रहे हैं." एक एशियाई व्यक्ति का कहना है कि उसने इस डर से कि लोग क्या सोचेंगे, अपना पीठ पर टांग कर ले जाने वाला बैग (रकसैक) ही लेकर चलना बंद कर दिया है. इस व्यक्ति का कहना है, "मैं अपने काम पर जाने के लिए अपना रकसैक लेकर नहीं चलता हूँ. इसमें मैं आमतौर पर अपना लंच और काम के दौरान पहनी जाने वाली क़मीज़ रखता था. मैं लोगों की नज़रों में संदेहास्पद दिखने के बजाय काम पर पहनी जाने वाली अपनी गंदी क़मीज़ पहनना पसंद करुंगा." इस व्यक्ति का यहाँ तक कहना है कि वह काम के वक़्त सिर्फ़ टी-शर्ट पहनते हैं और ज़्यादा कपड़े पहनने से घबराते हैं क्योंकि लंदन में पुलिस की गोलियों से हुई एक व्यक्ति की मौत के बाद वह घबराए हुए हैं. कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने इस डर से अपने एमपी-3 प्लेयर और आईपोड ले जाने बंद कर दिए हैं कि कहीं पुलिस को तार नज़र आ जाएँ या फिर जब वे गाने सुन रहे हों और पुलिस की चेतावनी सुनने से रह जाए. ख़ाली सीटें इस तरह के बर्ताव से घबराकर लैला नाम की एक महिला ने तो भूमिगत रेल यानी ट्यूब में सफ़र करना ही बंद कर दिया है. लैला एक अंग्रेज़ महिला हैं जिन्होंने इस्लाम क़बूल कर रखा है.
लैला का कहना है, "मैं अपने मुस्लिम परिधान की वजह से लोगों का डर महसूस करती हूँ. कभी-कभी तो लोग मेरे पास की सीट पर बैठने के बजाय खड़े रहना पसंद करते हैं." हिंदू और सिख लोगों ने भी पत्रों में लिखा है कि उन्होंने भी इस तरह के बर्ताव का सामना किया है. देव नाम के एक व्यक्ति लिखते हैं, "मैं जैसे ही अपना रकसैक लेकर ट्रेन में चढ़ा तो वहाँ बैठे एक यात्री ने मुझे देखा और तुरंत ट्रेन से उतर गया, दूसरी ट्रेन का इंतज़ार करने के लिए." इस तरह के बर्ताव से लंदन के माहौल को ख़तरा पैदा हो गया है और जैसा कि एक बीबीसी वेबसाइट पाठक ने कहा है कि इससे राजधानी लंदन की 'बहुसांस्कृतिक दुनिया' की छवि को ख़तरा पैदा हो सकता है. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||