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मंगलवार, 12 जुलाई, 2005 को 14:22 GMT तक के समाचार
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बॉडी लेंगुएज क्या होती है?

बॉडी लैंगुएज
इशारों की भाषा जानवरी भी समझते हैं
बॉडी लैंगुएज क्या है? पल्लवीप्रिया, पटना

बॉडी लैंगुएज यानी शरीर की भाषा. कई बार आप बिना शब्दों का प्रयोग किए अपनी मुद्रा या भंगिमा से बहुत कुछ कह देते हैं. अगर आप इसे पढ़ना सीख जाएँ तो ये बड़ी कारगर साबित हो सकती है. जैसे अगर कोई आपके ठीक सामने बैठा है कुछ आपकी ओर झुका हुआ, तो समझिए वह आपकी बात ध्यान से सुन रहा है और उसे मानने को भी तैयार है.

अगर वह शून्य में देख रहा है तो समझिए बोर हो रहा है. अगर इधर- उधर देख रहा है समझिए वह जाना चाहता है. अगर हाथ बांधे खड़ा है तो वह आपका सुझाव नहीं मानना चाहता और हाथ कमर पर रखे है तो वह विद्रोह के मूड में है. इस विषय में बहुत सी किताबें भी उपलब्ध हैं.

आत्महत्या को क़ानूनी मान्यता देने वाला पहला देश कौन सा है? हॉलैंड या आस्ट्रेलिया, कुणाल प्रियदर्शी, कटिहार, बिहार

नीदरलैंड. इसे हॉलैंड भी कहा जाता है. हालाँकि हॉलैंड नीदरलैंड का एक भाग है. दस अप्रैल 2001 को नीदरलैंड की संसद में 28 के मुक़ाबले 46 वोटों से इच्छा-मृत्यु या युथेनेज़िया का क़ानून पास हो गया. इस क़ानून का मतलब ये नहीं कि जो जब चाहे आत्महत्या कर सकता है. ये केवल उन रोगियों के लिए है जिसकी बीमारी लाइलाज हो या जो बहुत पीड़ा झेल रहा हो और जिसके कम होने की कोई संभावना न हो.

यूथेनेज़िया के लिए रोगी और डॉक्टर के बीच एक लंबा संबंध होना ज़रूरी है और उसके बाद भी डॉक्टर, इच्छा-मृत्यु में रोगी की तभी मदद कर सकता है जब उसने रोगी को उसकी हालत की पूरी जानकारी दे दी हो, कम से कम एक और डॉक्टर से सलाह की हो, उसे विश्वास हो गया हो कि रोगी ने अपनी मर्ज़ी से, सोच समझकर पूरे होशोहवास में अपने जीवन का अंत करने का फ़ैसला किया है.

नीदरलैंड के बाद यूथेनेज़िया को बैल्जियम की संसद ने 17 मई 2002 को मान्यता दे दी. अन्य कई देशों में इस विषय पर बहस चल रही है लेकिन अभी क़ानून नहीं बना है.

कलर ब्लाइंडनैस क्या है और क्या इसका इलाज हो सकता है? अखिलेश सिंह, जमशेदपुर झारखंड

कलर ब्लाइंडनेस एक तरह की कमी होती है. हमारी आँख के पिछले भाग रैटिना में करोड़ों कोशिकाएं हैं जो प्रकाश के प्रति संवेदनशील होती हैं. इनमें से कुछ कोन्स कहलाती हैं जो हमें रंग पहचानने में मदद करती हैं. लेकिन अगर हमारी आँख की कोन्स कोशिकाओं में ठीक रसायन न हों तो वह रंगों में भेद नहीं कर पाती.

यह कमी आमतौर पर जन्मजात होती है जिसका कोई इलाज नहीं. कभी कभी क्लोरोक्विन दवाओं के उपयोग से भी यह कमी पैदा हो जाती है और इसका प्रयोग बंद करने से आदमी ठीक हो जाता है.

कलर ब्लाइंडनैस पुरुषों में अधिक होती है. पुरुषों में इसका प्रतिशत आठ होता है जबकि महिलाओं में केवल 0.4. कलर ब्लाइंड व्यक्ति हरा और लाल या फिर नीला और पीला रंग नहीं पहचान पाता. हरा और लाल रंग पहचान पाने की अक्षमता को गंभीर माना जाता है और ऐसे व्यक्ति को वाहन चलाने का लाइसैंस नहीं मिलता.

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