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जाँच के लिए बढ़ता अंतरराष्ट्रीय दबाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त राष्ट्र के बाद अब अमरीका सरकार ने भी उज़्बेकिस्तान में पिछले सप्ताह प्रदर्शन कर रहे लोगों के मारे जाने की घटना की स्वतंत्र जाँच की माँग की है. अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता रिचर्ड बाउचर ने कहा है कि इस संबंध मे मिल रही ख़बरों से एक हृदयविदारक तस्वीर उभर रही है. उन्होंने कहा कि तथ्यों का सही पता चल सके इसके लिए ये आवश्यक है कि इस बारे में विश्वसनीय और पारदर्शी जाँच करवाई जाए. इससे पहले संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार मामलों की संस्था की प्रमुख ने इस संबंध में स्वतंत्र जाँच की माँग की थी. संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त लुईस आर्बूर ने कहा है कि वे उज़्बेकिस्तान की हिंसा की घटना से काफ़ी चिंतित हैं. उज़्बेक सरकार का कहना है कि हिंसा की घटना में 169 लोग मारे गए हैं लेकिन बीबीसी से बातचीत में उज़्बेक सेना के एक अधिकारी ने मरने वालों की संख्या 500 बताई थी. लुईस आर्बूर के दफ़्तर की ओर से जारी किए गए बयान में कहा गया है कि "संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त चाहती हैं कि अंदिजान में लोगों के मारे जाने की घटना की निष्पक्ष जाँच हो." उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रपति इस्लाम कारीमोफ़ ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र समेत दूसरे अंतरराष्ट्रीय संगठन अंदिजान में हुई घटनाओं की जांच कर सकते हैं. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के अधिकारी मीरोस्लेव जेंका ने कहा, "मुझे लगता है कि ये बहुत ज़रुरी है इसलिए हम छानबीन की प्रकिया में शामिल होने पर विचार कर रहे हैं लेकिन हमें इस बारे में कोई ठोस न्योता नहीं मिला है." इससे पहले अंदिजान पहुंचे राजनयिकों को एक बस में बिठाकर शहर भर में ले जाया गया. बस का इंतज़ाम उज़्बेक विदेश मंत्रालय ने किया था लेकिन राजनयिकों को स्थानीय लोगों से बात करने की इजाज़त नहीं दी गई और न आज़ादी से घूमने की. उन्होंने अस्पतालों और मुर्दाघरों का दौरा भी नहीं किया, तस्वीरें खींचने की भी पूरी तरह से छूट नहीं थी. एक राजनयिक ने कहा कि सैनिकों और टैंकों के अलावा सड़कों पर कोई नहीं था. बस को ऐसी चुनिंदा जगहों पर रोका गया जो हिंसा को लेकर सरकारी पक्ष दर्शाती हों, जैसे वो जेल जहाँ से सरकार के मुताबिक लोगों ने क़ैदियों को रिहा करवाया. आंतरिक मंत्री ज़कीर अलमातोव ने एक बार कहा कि अंदिजान में कोई प्रदर्शन नहीं हुआ था और पत्रकार तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश कर रहें है. उधर करासु शहर में विद्रोह की अगुवाई करने वाले बख्तियार रहीमोफ़ ने कहा है कि लोग क़ुरान पर आधारित इस्लामी प्रशासन की स्थापना करना चाहते हैं. रहीमोव एक प्रमुख स्थानीय समुदाय से ताल्लुक रखने वाले किसान हैं, उन्होंने कहा कि लोगों ने राष्ट्रपति करीमोव को सोलह सालों तक सहन किया है लेकिन अब वो और सहने के लिए तैयार नहीं हैं. बख्तियार रहीमोफ़ के पास कोई आधिकारिक पद नहीं है लेकिन लोग उनका काफी सम्मान करते हैं, ये अभी साफ नहीं हैं कि करासु में विद्रोह करने वालों का इस्लामी गुटों से कोई रिश्ता है या नहीं. अंदिजान में प्रदर्शन करने वालों के साथ उनके रिश्ते के बारे में कोई जानकारी नहीं है. |
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