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सोमवार, 25 अप्रैल, 2005 को 01:12 GMT तक के समाचार
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'संघर्ष में लड़कियों का शोषण'
तमिल महिला विद्रोही
रिपोर्ट के अनुसार श्रीलंका में 21 हज़ार से भी अधिक लड़कियाँ सशस्त्र संघर्ष में शामिल हैं
सेव द चिल्ड्रेन नामक एक चैरिटी संस्था ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया भर में
विभिन्न हथियारबंद गुट लड़कियों को जबरन अपने साथ रख रहे हैं.

संस्था का कहना है कि पूरी दुनिया में लगभग एक लाख 20 हज़ार लड़कियाँ हथियारबंद गुटों के लिए काम कर रही हैं.

रिपोर्ट के अनुसार इनमें कई लड़कियाँ अपनी इच्छा के विरूद्ध ऐसा कर रही हैं.

संस्था ने अंतरराष्ट्रीय नेताओं से ये कहते हुए हज़ारों युवतियों की रक्षा की अपील की है कि लड़ाईयों के कारण ऐसी लड़कियों को अमानवीय परिस्थितियों में रहना पड़ रहा है.

संस्था ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इनमें से कई लड़कियों की उम्र आठ वर्ष तक है जिन्हें हथियारबंद गुटों ने अगवा कर रखा है.

रिपोर्ट कहती है कि कुछ लड़कियों को लड़ाई में लगाया गया है जबकि कुछ को सामान उठाने या खाना पकाने जैसे काम में लगाया जा रहा है.

रिपोर्ट के अनुसार लगभग सभी लड़कियों का यौन शोषण हो रहा है या उन्हें हथियार उठानेवाले पुरूषों के साथ जबरन 'पत्नी' के रूप में रहना पड़ रहा है.

स्थिति

 प्रायः संघर्ष का नाम लेते ही लोग पुरूषों के लड़ने की बात सोचते हैं मगर लड़कियाँ इस युद्ध का ऐसा चेहरा हैं जो छिपा हुआ है
सेव द चिल्ड्रेन

सेव द चिल्ड्रेन के निदेशक माइक ऐरोन्सन कहते हैं,"प्रायः संघर्ष का नाम लेते ही लोग पुरूषों के लड़ने की बात सोचते हैं मगर लड़कियाँ इस युद्ध का ऐसा चेहरा हैं जो छिपा हुआ है".

रिपोर्ट कहती है कि समस्या किसी एक देश या महादेश तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे विश्व में व्याप्त है.

संस्था के अनुसार यूगांडा में लगभग 6,500 लड़कियों के विद्रोहियों की सेना में होने का अनुमान है जो कुल सेना का एक तिहाई है.

कांगो गणराज्य में सशस्त्र गुटों के साथ लगभग 12,000 लड़कियाँ जुड़ी हैं.

वहीं श्रीलंका में 21,500 लड़कियाँ संघर्ष में शामिल हैं.

संस्था के अनुसार कई लड़कियाँ इतनी बुरी तरह डरी हुई हैं कि वह चाहकर भी नहीं भाग सकतीं.

उनके सामने ना केवल अपने अपहर्ताओं से सज़ा का भय है बल्कि वे इस बात से भी डरी हुई हैं कि अगर वे लौटीं तो उनको उनके समाज में स्वीकार नहीं किया जाएगा.

अपील

संस्था ने अंतरराष्ट्रीय नेताओं की आलोचना करते हुए कहा है कि वे चंगुल से छुटकर निकली लड़कियों की सहायता कर पाने में नाकाम रहे हैं.

उसका कहना है कि ऐसी लड़कियों के पुनर्वास के लिए जो भी कार्यक्रम हैं उनमें पर्याप्त राशि नहीं है और वे लड़कियों की ज़रूरत के अनुरूप नहीं हैं.

संस्था ने अंतरराष्ट्रीय नेताओं से इस दिशा में कारगर क़दम उठाने की अपील करते हुए धन देने की माँग की है जिससे कि शोषित लड़कियों के आत्मसम्मान की रक्षा की जा सके.

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