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बुधवार, 16 मार्च, 2005 को 17:10 GMT तक के समाचार
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अमरीकी मुसलमान: एक नई पहचान?

सलमान अहमद
सलमान अहमद मुस्लमि समाज की समस्याओं का जायज़ा ले रहे हैं
अमरीका में इस्लाम एक ऐसा मज़हब है जो वहाँ सबसे तेज़ी से पैर फैला रहा है. फिर भी, चार में से एक अमरीकी अपने बीच रह रहे मुसलमानों को शक की नज़र से देखता है.

अपने संगीत बैंड 'जुनून' के साथ अमरीका का दौरा कर रहे रॉक स्टार और एक मुस्लिम अमरीकी नागरिक सलमान अहमद यही जानना चाहते थे कि ग्यारह सितंबर के बाद से अब तक वहाँ के मुसलमानों के जीवन में क्या बदलाव आए हैं.

उनका कहना है, "हमले के बाद मुसलमानों के ख़िलाफ़ मानवाधिकार उल्लंघन के कई मामले हुए और उनमें आप्रवास के मुद्दे को हथियार बनाया गया. हज़ारों लोगों को हिरासत में लिया गया और कुछ अन्य को वहाँ से बेदख़ल कर दिया गया".

'जासूसी का अधिकार'

न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन पर हमले के एक महीने बाद अमरीकी संसद ने आतंकवादियों की धरपकड़ के लिए पैट्रियॉट क़ानून लागू किया.

 हमले के बाद मुसलमानों के ख़िलाफ़ मानवाधिकार उल्लंघन के कई मामले हुए और उनमें आप्रवास के मुद्दे को हथियार बनाया गया. हज़ारों लोगों को हिरासत में लिया गया और कुछ अन्य को वहाँ से बेदख़ल कर दिया गया
सलमान अहमद

सलमान का कहना है, "इस क़ानून ने एफ़बीआई को अधिकार दे दिए कि वह अमरीकी नागरिकों की जासूसी कर सके, उनकी ईमेल पढ़ सके और उनके लाइब्रेरी रिकॉर्ड तक की जाँच कर सके".

सितंबर में हमला करने वाले चरमपंथी हालाँकि एक ख़ास तबक़े का ही प्रतिनिधित्व करते थे लेकिन कुछ अमरीकियों ने इसके लिए पूरे मुस्लिम समाज को ही ज़िम्मेदार ठहरा डाला.

और कुछ आतंकवादियों के इस दावे ने भी कई मुसलमानों का ग़ुस्सा भड़काया है कि यह सब कुछ इस्लाम के नाम पर हुआ है.

अमरीकी मुसलमान
अमरीकी मुसलमानों पर अलग-थलग रहने का भी आरोप लगता आ रहा है

सलमान एक वकील शरीफ़ अक़ील से मिले 'जिनके जीवन में ग्यारह सितंबर के बाद उथलपुथल आ गई है'.

सिर्फ़ नाम पर ही...

शरीफ़ कहते हैं कि वे ऐसे छात्रों और अन्य लोगों की पैरवी कर रहे हैं जिन पर केवल इस लिए आफ़त आ गई कि उनके नाम मोहम्मद थे या वे पाकिस्तानी थे या सिर्फ़ मुसलमान ही थे.

तो अमरीकी मुस्लिम समुदाय आख़िर किस तरह शक का यह कीड़ा दूर करे?

वकील रह चुके अज़हर उस्मान का कहना है कि अधिकतर अमरीकी ऐसी आवाज़ें सुनना चाहते हैं जो मध्यममार्गी हों.

वह अपने समुदाय की कमी भी बताते हैं, हमारी समस्या यह है कि हम अलग-थलग रहना चाहते हैं. लोगों से संपर्क नहीं बढ़ाते. एक पुल बनाने का काम नहीं करते जो हमें अन्य लोगों से जोड़े.

अमरीका के मुस्लिम समाज में एक नई हलचल पैदा हो रही है.

 अमरीकी मुसलमान यह नहीं चाहते कि उन्हें उनके ही देश में बस बर्दाश्त किया जाए. वे अपनाया जाना चाहते हैं. उसी रूप में जो वे हैं-यानी ऐसे अमरीकी जो संयोग से मुसलमान भी हैं".
सलमान अहमद

कुछ ऐसे लोग सक्रिय हो रहे हैं जो देश और विदेशों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हो रहे अन्याय का प्रतिरोध कर रहे हैं.

आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई, इराक़ पर हमला और अबू ग़रैब की घटना ऐसे ही कुछ मुद्दे हैं जो उन्हें सक्रिय किए हुए हैं.

सितंबर के हमलों के बाद बड़ी तादाद में मुसलमान स्थानीय और राज्य की राजनीति से अलग हो गए. यहाँ तक कि 2002 तक 90 प्रतिशत मुस्लिम राजनीतिज्ञ अपने पदों से हट चुके थे.

हालाँकि पिछले साल के अमरीकी चुनाव ने फिर उन्हें इस ओर आकर्षित किया और वे राजनीति में वापस आने लगे.

सलमान का इस सारे घटनाक्रम पर कहना है, "अमरीकी मुसलमान यह नहीं चाहते कि उन्हें उनके ही देश में बस बर्दाश्त किया जाए. वे अपनाया जाना चाहते हैं. उसी रूप में जो वे हैं-यानी ऐसे अमरीकी जो संयोग से मुसलमान भी हैं".

एक मुस्लिम महिलानाराज़ अमरीकी मुसलमान
दुनिया भर के मुसलमान अमरीका से बुरी तरह नाराज़
बदला है चुनावी गणित
ग्यारह सितंबर के बाद न्यूयॉर्क का चुनावी गणित एकदम बदल गया है.
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