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11 सितंबर से बदल गया चुनावी गणित | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कहते हैं कि अमरीका के शहर न्यूयॉर्क जैसा कोई दूसरा शहर दुनिया में नहीं है. उँची इमारतें, पीली टैक्सियों की भरमार, लोगों की भाग-दौड़– ये तस्वीर है न्यूयॉर्क की. अमरीका की आर्थिक राजधानी होने के नाते दुनिया भर से आए अलग-अलग लोगों, तहज़ीबों, भाषाओं का संगम हैं यह शहर. जहाँ खाने और सोने के लिए वक़्त कम है वहाँ चुनाव के लिए समय कितना होगा. यहाँ झंडे-होर्डिंग तो नहीं हैं लेकिन अक्सर लोग चुनावी बहस में शामिल नज़र आ ही जाते हैं. अख़बारों में भी राजनीति के साथ साथ अमरीकी फ़ुटबॉल के फ़ाइनल को प्रमुखता मिलती है. यहाँ जॉन कैरी की डेमोक्रेटिक पार्टी को ज़्यादा पंसद किया जाता है. माना जाता है कि इस शहर में बसने वाले बहुत से कलाकार, लेखक और बुद्धिजीवी उदारवादी हैं और वे डेमोक्रेट विचारधारा का समर्थन करते हैं. पसंद बदली लेकिन तेज़ी से भागती हुई न्यूयॉर्क की ज़िंदगी थम गई थी ग्यारह सितंबर 2001 को और उस दिन का ख़ौफ़ आज भी लोगों के दिल में हैं. जिम मोरिस उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, "जॉर्ज बुश ने तब हमें ऐसा सँभाला था कि मैं उन्हीं को सही नेता मानता हूँ." कट्टर डेमोक्रेट समर्थक इस शहर में बुश के समर्थन में यह विचार सुनना अटपटा ज़रूर था लेकिन अप्रत्याशित नहीं. पूरे देश में लोग बुश को सुरक्षा के लिए ज़्यादा बेहतर समझते हैं. लेकिन फिर बात आती है अन्य घरेलू मामलों, इराक़ युद्ध और अर्थव्यवस्था की- जिसे लेकर लोग अब डेमोक्रेट की ही वापसी चाहते हैं. न्यूयॉर्क के आस-पास के इलाक़ों में दक्षिण एशियाई लोगों की भी आबादी ज़्यादा है. ख़ास मैनहेटन में काम करने वाले कई मुसलमान बुश की वापसी तो क़तई नहीं चाहते. "हम तो सभी लोग कैरी के लिए वोट डालेंगे क्योंकि बुश की वजह से यहाँ बहुत सी परेशानियाँ बढ़ी हैं हमारे लिए." यह कहना था हाजी मुनीर हुसैन क़ुरैशी का जो न्यूयॉर्क में टैक्सी चलाते हैं और पूरे परिवार के साथ डेमोक्रेट पार्टी के लिए वोट डालने की तैयारी में हैं. परेशानी और चिंता लेक्सिंग्टन ऐवेन्यू की 23वीं सड़क पर हाँडी रेस्त्रा में इफ़्तार की तैयारी कर रहे अनवर का कहना था कि 11 सिंतबर के बाद मुसलमानों के साथ बुरा बर्ताव हुआ है और उन्हें बिना बात परेशान किया गया.
25 सालों से न्यूयॉर्क में रह रहीं शबनम को लगता है कि अमरीका अब बहुत बदल गया है. “जब हम आए थे तो सब कुछ सस्ता था, आसान था, लेकिन अब ख़तरा है और लोग संदेह भी बहुत करने लगे हैं.” यह सच है कि अमरीका में अब कहीं भी जाइए हर जगह पूछताछ जाँच-पड़ताल की जाती है, कोई होटल बिना फ़ोटो लगे पहचान पत्र को देखे कमरा नहीं देते. विदेशी पासपोर्ट वालों को अक्सर कड़ी सुरक्षा से गुजरना पड़ता है. जूते उतरवा कर, सामान खोल कर- हर तरह से तलाशी ली जा सकती है छोटे छोटे हवाई अड्डों पर भी. शायद इसीलिए राशिद जैसे कुछ लोग अमरीका छोड़ने की भी सोचने लगे हैं. वे कहते हैं, “हमारी तैयारी तो है, हालात बेहतर न हुए तो बच्चों को लेकर कहीं और जाने के बारे में सोच सकता हूँ.” सचमुच 11 सितंबर के बाद न्यूयॉर्क में बहुत कुछ बदल गया है ख़ासकर मुसलमानों के लिए. |
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