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बाज़ार भारत का माल चीन का | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
“मेड इन चाइना, गणेश" क़ीमत और क्वालिटी, दोनों ही में मेड इन इंडिया गणेश पर भारी पड़ते है”, ये कहना है शब्बीर का जो कोलकाता में चीन में बने सामान की दुकान चलाते हैं. हिंदू देवता गणेश की मूर्ति और कोलकाता - दोनों केवल उदाहरण मात्र ही है. आज भारत के ज़्यादातर शहरों के बाज़ारों में चीन में बना माल धड़ल्ले से बिक रहा है. इसकी प्रमुख वजह ये है कि उपभोक्ता की नज़र में ये सस्ते और टिकाऊ जान पड़ते हैं. ज़ाहिर है ऐसे में जहां एक तरफ चीनी सामान को ख़रीदने की होड़ लगी है वंही चीन जाकर उत्पादन करने की इच्छा रखने वाले भारतीयों की भी कोई कमी नहीं. अनिल कोहली, एक ऐसे व्यापारी हैं जिन्होंने बंगलोर से चीन के शहर नेन तोंग जाने का फैसला किया. उनका कपड़े का कारोबार है और वे कहते हैं कि चीन में उत्पादन इसलिए बेहतर है क्योंकि वँहा सरकारी हस्तक्षेप बिलकुल नही है और हाँ, चीनी श्रमिकों पर ज़्यादा नजर भी नहीं रखनी पड़ती. अगर भारत और चीन की तुलना करें तो दोनों में ख़ासा अंतर है. आज चीन ने उत्पादन क्षेत्र में अपनी धाक जमा ली है. आंकड़ों पर नज़र डाले तो क़रीब-क़रीब दुनिया के आधे फ्रिज और वाशिंग मशीन चीन में बनाए जाते हैं. मुक़ाबले में भारत की हिस्सेदारी महज़ तीन प्रतिशत भर ही है. तो क्या भारत चीन से लोहा ले सकता है ? “कम से कम अभी तो नहीं”, ये कहना है भारत के वरिष्ठ नेता और लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी का जो पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास निगम से जुड़े रहे हैं. उनका कहना है कि चीन ने किसी भी काम को जल्दी पूरा कर पाने में मानो महारत हासिल कर ली है और इसमें प्रमुख भूमिका अफसरशाही ने निभाई है.
बिना किसी झिझक के वे स्वीकार करते हैं कि अपनी लाल फीताशाही की वजह से भारत थोड़ा पीछे रह गया है. लेकिन भारत के हाथ वो जादूई छड़ी लग गई है जिसका नाम है IT यानि सूचना प्रौद्योगिकी. शायद यही भारत के विकास का मूल मंत्र भी बन रहा है. हाँलाकि कम्पयूटर हार्डवेयर के क्षेत्र में चीन का दबदबा है लेकिन जहां तक बात अहम् साफ्टवेयर की है तो इस मामले में भारत कोसों आगे निकल गया है. आंकड़ों पर नज़र डाले तो वर्ष 2004-05 में भारत से साढे सत्रह अरब डॉलर के साफ्टवेयर का कुल निर्यात हुआ. इसके मुक़ाबले में चीन से कुल निर्यात दो अरब डॉलर का रहा. पश्चिम बंगाल के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में प्रधान सचिव डॉक्टर जीडी गौतम को उम्मीद है कि भारत की ये बढत बनी रहेगी क्योंकि भारत में अंग्रेज़ी जानने वाले ग्रेजुएट (स्नातक) की कमी नही. हर वर्ष भारत मे क़रीब चालीस लाख ग्रेजुएट निकलते हैं और इनमें से कई सूचना प्रौद्योगिकी का कोर्स कर इस उद्योग से जुड़ जाते हैं. आज भारत के कई शहरों में सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियाँ पनप रही है. कम लागत और खर्च की वजह से ये दुनिया की बड़ी बड़ी कंपनियों को काफी आकर्षित करती है. जिस तरह कम लागत की वजह से चीन ने उत्पादन क्षेत्र में दुनिया भर के बाज़ारों में अपना सिक्का जमाया है, क्या उसी तरह भारत भी सूचना प्रौद्योगिकी के आधार पर दुनियाभर में नही छा सकता ? शायद सूचना प्रौद्योगिकी ही चीन की आर्थिक चूनौती का मुक़ाबला करने में भारत का जवाब हो. |
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