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सोमवार, 17 जनवरी, 2005 को 21:59 GMT तक के समाचार
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पाकिस्तान ने हर्श के दावों का खंडन किया
अमरीकी स्पेशल फ़ोर्स के कमांडो
दावा किया गया है कि स्पेशल फ़ोर्स के जवान गुप्त अभियान पर हैं
पाकिस्तान ने अमरीकी मीडिया में छपी इन ख़बरों का खंडन किया है कि वह ईरान में परमाणु ठिकानों की शिनाख़्त करने में अमरीका की मदद कर रहा है.

अमरीका की एक खोजी पत्रिका न्यूयॉर्कर में खोजी पत्रकार सेमॉर हर्श के एक लेख में दावा किया गया है कि अमरीकी कमांडो ईरान में गुप्त अभियान चला रहे हैं और उन्हें पाकिस्तान से सूचना के रूप में मदद मिल रही है.

इस्लामाबाद में बीबीसी संवाददाता पॉल एंडर्सन ने ख़बर दी है कि पाकिस्तानी अधिकारियों ने सेमॉर हर्श का दावे को ख़ारिज करने में ज़रा भी देर नहीं की.

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मसूद ख़ान ने सोमवार को पत्रकारों से कहा कि अमरीका के साथ ऐसा कोई सहयोग नहीं हो रहा है, हर्श की रिपोर्ट में बढ़ाचढ़ाकर बातें पेश की गई हैं और इनमें कोई सच्चाई नहीं है.

दूसरी तरफ़ पाकिस्तान में सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि हर्श के दावों में कुछ दम नज़र आता है और वे इस मामले में दलील देते हैं कि हर्श जिस सूचना सहयोग की बात कहते हैं वह पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर अब्दुल क़दीर ख़ान से हासिल की गई होगी.

क़दीर प्रकरण

ग़ौरतलब है कि क़दीर ख़ान पर क़रीब एक साल पहले ये आरोप लगे थे कि उन्होंने ईरान को परमाणु तकनीक की जानकारी दी थी जिसके बाद वे विवादों के घेरे में आ गए थे और इस मामले ने काफ़ी तूल पकड़ा था.

जानकारों का कहना है कि अमरीकी यह जानने के इच्छुक रहे होंगे कि क़दीर ख़ान ने ईरान को किस तरह के उपकरण या तकनीक दी थी.

पाकिस्तान ने क़दीर ख़ान को पूछताछ के लिए किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था को सौंपने से इनकार कर दिया था और ऐसा करने के लिए पाकिस्तान पर कोई ख़ास दबाव भी नहीं पड़ा था.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि आज के दौर में यह एक चौंकाने वाली बात है जब सारी दुनिया परमाणु अप्रसार को प्राथमिकता पर रखती है.

सेमॉर हर्श का कहना है कि अमरीका ने पाकिस्तान के साथ सौदा यह किया था कि वह क़दीर ख़ान और उनके सहयोगियों से पूछताछ में जो जानकारी मिली थी उसे अमरीका को देगा.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि पाकिस्तान जैसे देश में यह मामला काफ़ी संवेदनशील है जहाँ अमरीका की गतिविधियों को इस्लाम और मुस्लिम विरोधी माना जाता है और वहाँ यह बहुत प्रबल विचारधारा है.

'आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध' में अमरीका का साथ देने के मामले में राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ पहले ही आलोचना का शिकार बन चुके हैं.

लेकिन ऐसा आरोप कि पाकिस्तान अमरीका को ऐसी कोई सूचना दे रहा होगा जिसे किसी मुस्लिम देश के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा सकता है, ख़ुद अपने आप में ही बहुत बड़ा नुक़सान करने वाली साबित हो सकती है.

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