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अब पुतिन से पूछे जा रहे हैं सवाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बेसलान शहर में बंधक कांड में मारे लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए रूस में दूसरे दिन भी शोक मनाया जा रहा है. वहीं राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन से देश के भीतर और दूसरे देशों से सवाल पूछे जा रहे हैं कि आख़िर बंधक कांड में हुआ क्या था और चूक कहाँ हुई. एक बड़ा सवाल यह भी पूछा जा रहा है कि क्या चेचन विद्रोहियों से निपटने की पुतिन की नीति सही है? उल्लेखनीय है कि बेसलान बंधक कांड में 335 लोग मारे गए थे जिनमें आधे बच्चे थे. बीबीसी संवाददाता यूसुफ़ अनानी का कहना है कि पुतिन के आलोचक सरकार की ओर से लगातार कठोर होती सेंशरशिप के माहौल के बावजूद सवाल उठा रहे हैं. दो दिन पहले पुर्तगाल के विदेश मंत्री बर्नार्ड बॉट ने कहा था कि यूरोपीय संघ जानना चाहता है कि यह त्रासदी आख़िर हुई कैसे. इस पर रूस ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी. अब फ़्रांसिसी प्रधानमंत्री ज्याँ पियरे रफ़ारीन ने भी इसी तरह की माँग की है. इराक़ युद्ध के मसले को लेकर रूस और फ़्रांस जिस तरह नज़दीक आए थे उसके चलते इस सवाल पर लोगों को आश्चर्य भी हो रहा है. यूरोपीय देशों के नेताओं के इस बयान का मतलब यह निकाला जा रहा है कि बंधक कांड के बारे में जो कुछ बताया गया वह एकतरफ़ा है और ग़लत भी. अख़बार भी सवाल को रूसी अख़बार भी उठा रहे हैं. यहाँ तक कि आमतौर पर पुतिन का समर्थन करने वाले अख़बार 'मॉस्कोवस्की कोम्सोमोलेट्स' ने भी सरकार पर आरोप लगाया कि उसने बंधक कांड की त्रासदी को किसी छोटे हादसे की तरह दिखाने की कोशिश कर रही है. रूस के अख़बारों को टेलीविज़न की तुलना में अभिव्यक्ति की ज़्यादा आज़ादी है लेकिन परिस्थियाँ बदल भी सकती है. देश के सबसे बड़े अख़बारों में से एक इज़वेस्तिया को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा है क्योंकि उन्होंने बंधक कांड में मरने वालों की संख्या को लेकर सवाल उठाए थे इस पूरे मामले की भावुकता पूर्ण ख़बरें छापीं थीं. लेकिन इसके बाद भी असुविधाजनक सवालों का सिलसिला रुका नहीं है. सरकार कह रही है कि बंधक बनाने वालों में दस अरब नागरिक थे लेकिन एक भी अरब की लाश सार्वजनिक तौर पर नहीं दिखाई गई है. एक अख़बार नोवाया गज़ेटा का कहना है कि चेचन्या को लेकर सरकार के रुख की निंदा करने वाले दो पत्रकारों को बेसलान पहुँचने से रोक दिया गया. आलोचकों का कहना है कि किसी भी त्रासदी के बाद तथ्यों को छिपाने की बजाय यदि सरकार सच्चाई बताना शुरु करे तो ज़्यादा फ़ायदा हो सकता है. |
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