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रोज़ी रोटी तो अच्छी चल जाती है मगर... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
न्यूयॉर्क की सड़कों पर अगर आप किसी टैक्सी को आवाज़ दें तो ज़्यादा उम्मीद यही है कि आप को जो टैक्सी मिलेगी उसे कोई भारतीय, पाकिस्तानी या फिर बांग्लादेशी मूल का व्यक्ति चला रहा होगा. और आपको देसी भाषा में बोलते हुए टैक्सी चालक आपकी मंज़िल तक पहुँचा देगा. न्यूयॉर्क में दक्षिण एशियाई देशों से ताल्लुक़ रखने वाले टैक्सी चालकों की एक बड़ी संख्या इस रोज़गार में लगी है. न्यूयॉर्क में क़रीब पचास हज़ार टैक्सियाँ चलती हैं टैक्सी चालन का यह रोज़गार भी करोड़ों डॉलर का उद्योग बन चुका है. अब एक नए सर्वेक्षण के मुताबिक़ न्यूयॉर्क में कुल टैक्सी चालकों में से 38 प्रतिशत लोग दक्षिण एशिया से संबंध रखते हैं जिनमें से 14 प्रतिशत पाकिस्तान से, 14 प्रतिशत बांग्लादेश से और 10 प्रतिशत का संबंध भारत से है. पिछले चंद वर्षों में ये संख्या तेज़ी से बढ़ी है. इन टैक्सी चालकों में ज़्यादातर लोग ऐसे होते हैं जो ज़्यादा पढ़े लिखे नहीं होते और उन्हें कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल पाती लेकिन इस काम के सहारे वो अपने घरबार का पेट बालने के साथ-साथ अपने रिश्तेदारों की भी मदद करने के क़ाबिल हो जाते हैं. लेकिन टैक्सी चालक बनना भी कोई आसान रास्ता नहीं है. शुरू में टैक्सी चलाने का लाइसेंस हासिल करने के लिए एक लिखित परीक्षा देनी पड़ती है जिसमें अंग्रेजी भी शामिल होती है.
लिखित परीक्षा के बाद टैक्सी चलाने की व्यावहारिक परीक्षा यानी रोड टेस्ट भी होता है जिसमें टैक्सी को सुरक्षित चलाने की क़ाबलियत और क्षमता का इम्तेहान होता है. अमरीका में नए ड्राइवर शुरू में डॉलर को रुपए में बदल कर एक बड़ी रक़म की ही कल्पना करते हैं लेकिन सच्चाई उन्हें बाद में पता चलती है. नदीम ख़्वाजा पाकिस्तान के स्यालकोट से अमरीका आकर बीस साल से न्यूयॉर्क में टैक्सी चला रहे हैं. नदीम ख़्वाजा नए टैक्सी चालकों की मुश्किलो के बारे में कहते हैं, "नई टैक्सी चालक की तो आँखें खुल जाती हैं. वो आँकड़ों में बात करता है कि 25 हज़ार रुपए रोज़ाना की कमाई लेकिन उसे ख़र्चों का अंदाज़ा नहीं होता है." "जब रक़म ख़र्च के लिए निकलती है तो उसे असलियत का पता चलता है कि सारे ख़र्च निकालकर उसके पास ज़्यादा कुछ नहीं बचता." जो ख़ुद टैक्सी ख़रीद नहीं पाते तो वे भाड़े पर लेकर चलाते हैं. ऐसे में भाड़ा, टैक्सी की लीज़ भरना, तेल का ख़र्च और रखरखाव के बाद दिन भर की कमाई यानी क़रीब 200 डॉलर का आधा ही बच पाता है. इसलिए आमदनी बढ़ाने के लिए ख़ूब काम करना पड़ता है और टैक्सी चालक छुट्टियाँ भी कम ही कर पाते हैं. क़ुर्बानियाँ टैक्सी चालक सुबह ही घर से निकल जाते हैं और देर रात घर लौटते हैं, आमतौर पर रोज़ाना दस से बारह घंटे तक टैक्सी चलाई जाती है. पाकिस्तान के शहर रावलपिंडी से आए ड्राइवर रज़ा कहते हैं, "इसमें तो आपको बस भागना ही भागना है. रुक गए तो नुक़सान होगा, कोई और चारा ही नहीं है, आपको कम से कम बारह घंटे तो काम करना ही है."
कुछ टैक्सी चालक न्यूयॉर्क में अपने परिवार के साथ रहते हैं तो कुछ स्वदेश में ही छोड़कर आए हैं. लेकिन बारह घंटे काम करने की वजह से उनके पास अपने परिवार के लिए समय नहीं बच पाता. नदीम ख़्वाजा कहते हैं, "मेरा सात साल के एक बेटा है. मुझे आज तक उससे ढंग से मिलने का वक़्त नहीं मिला है. जब मैं घर पहुँचता हूँ तो वो या तो स्कूल गया होता है या रात को सो चुका होता है, बड़ी क़ुरबानी देनी पड़ती है रोज़ी-रोटी कमाने के लिए." भारत के हरजीत सिंह मूल रूप से जालंधर शहर के रहने वाले हैं और अमरीका आकर 15 साल से न्यूयॉर्क में टैक्सी चला रहे हैं. हरजीत सिंह कहते हैं, "एक बड़ी समस्या ये है कि आपको रास्तों का पता होना चाहिए, अगर रास्तों की जानकारी नहीं है तो ग्राहकों की शिकायतें सुननी पड़ती है." इस पर नदीम ख़्वाजा का कहना है, "मैं जब यहाँ आया था तो मुझे न्यूयॉर्क की क़तई जानकारी नहीं थी. मैंने इधर ही आकर सब कुछ सीखा, धीरे-धीरे सब सीख जाते हैं." लेकिन बात यहीं नहीं रुकती, 11 सितंबर 2000 को हुए चरमपंथी हमलों का असर टैक्सी चालकों की ज़िंदगी पर भी पड़ा है.
अर्थव्यवस्था में मंदी की वजह से टैक्सी से चलने वाले ग्राहकों में कमी आई है, इसके अलावा अमरीकी लोग डर की वजह से दक्षिण एशियाई चालकों की टैक्सियों में बैठने से कतराते हैं. सुरक्षा इंतज़ाम पुख़्ता किए गए हैं, टैक्सियों में कैमरे फिट कर दिए हैं जो यात्री के बैठते ही उसकी पाँच अलग-अलग तस्वीरें ले लेते हैं. इतना ही नहीं, टैक्सी चालक और यात्री बीच एक ऐसे शीशे की दीवार लगी होती है जिस पर गोली का भी असर नहीं होता. कई यात्री तो किराया देने से मना कर देते हैं और सुरक्षा इंतज़ाम कड़े करने के बावजूद कई टैक्सी चालकों की हत्या तक हो जाती है. इसलिए टैक्सी चालक ऐसी घटनाओं के लिए बदनाम इलाक़ों में जाने से घबराते हैं. लेकिन चूँकि टैक्सी चलाना अपनी मर्ज़ी पर ही होता है इसलिए जब मन किया, टैक्सी चलाई और जब आराम करने का मन किया तो स्टीयरिंग घुमाया और घर का रुख़ कर लिया. |
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