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इराक़ी शहरों में पुलिस थानों पर हमले | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इराक़ के मध्य और उत्तरी इलाक़ों में चरमपंथियों ने सुनियोजित तरीक़े से कई शहरों में पुलिस थानों पर हमले किए हैं. इन हमलों में लगभग सौ लोग मारे गए हैं और कई घायल हुए हैं. मूसुल में चार विस्फोट हुए हैं. बाक़ुबा और रमादी में चरमपंथियों ने पुलिस थानों पर ग्रेनेड फ़ेंके. फ़लूजा में संघर्ष में एक अमरीकी हेलिकॉप्टर गिरा दिया गया है. ये सभी हमले तड़के हुए और तीन अलग-अलग जगहों पर पुलिस थानों को निशाना बनाया गया. उत्तरी शहर मूसल में अधिकारियों ने कहा कि कम से कम एक विस्फोट तो आत्मघाती कार बम हमला था मगर सड़कों पर गोलियाँ चलने की भी ख़बर है. मध्य इराक़ में सुन्नी मुसलमानों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी पुलिस थानों को निशाना बनाया गया. बाक़ुबा, रमादी और फ़लूजा में तो हमेशा से ही विद्रोहियों का प्रभाव रहा है. अधिकतर संघर्ष बाक़ुबा में हुआ जहाँ अमरीकी नेतृत्व वाली सेनाओं का 30 चरमपंथियों से संघर्ष हुआ. चेतावनी एक प्रत्यक्षदर्शी ने फ़लूजा के संघर्ष के बारे में बताया, "अमरीकियों ने हर तरह के हथियारों और हेलिकॉप्टरों की मदद से पूर्व से फ़लूजा में घुसने की कोशिश की मगर मुजाहिदीनों ने वापस गोलियाँ चलाईं और अमरीकियों को शहर में घुसने से रोक दिया." एक सऊदी वेबसाइट पर जारी बयान में चेतावनी दी गई है कि अमरीकी नेतृत्व वाली सेनाओं और उनके समर्थकों के विरुद्ध अभी और हमले होंगे. इस पूरे संघर्ष में महत्त्वपूर्ण बात इनके लिए चुना गया समय है क्योंकि सिर्फ़ छह दिन बाद ही देश में सत्ता का हस्तांतरण होना है. सुन्नी मुसलमानों के प्रभाव वाले इलाक़ों में हुए हमलों से नई अंतरिम सरकार के सामने आने वाली चुनौतियों की एक झलक सहज ही दिख रही है. इस बारे में बीबीसी संवाददाता पॉल रेनॉल्ड्स के अनुसार अमरीकी नेतृत्व वाली सेनाओं की ओर से इस बात की आशंका तो पहले से ही व्यक्त की जा रही थी कि सत्ता के हस्तांतरण के क्रम में हमले होंगे मगर इसके बाद भी ख़तरा कम होता नहीं दिख रहा है. विद्रोहियों ने दिखा दिया है कि वे सुनियोजित और विध्वंसक हमले समन्वित तरीक़े से करने में सक्षम हैं. दावा वेबसाइट का दावा है कि बाक़ुबा में हुआ हमला इस्लामी चरमपंथी अबू मुसाब अल-ज़रक़ावी का काम है.बयान ये भी चेतावनी देता है कि आम नागरिक घरों में बंद रहें क्योंकि आने वाले समय में और हमले होंगे.
इससे पहले ज़रक़ावी की ओर से इराक़ी प्रधानमंत्री ईयाद अलावी की हत्या की धमकी भी आ चुकी है. यानी ये स्पष्ट है कि निशाने पर सिर्फ़ अमरीकी नेतृत्व वाली सेनाएँ ही नहीं हैं बल्कि इराक़ की अंतरिम सरकार भी होगी. इस तरह सरकार के सामने क़ानून-व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने की चुनौती होगी. कुछ ऐसा ही सोचते हैं इराक़ में अब तक काम संभाल रही अंतरिम परिषद के सदस्य रहे महमूद ओठमान. उनका कहना है, "निश्चित रूप से अगर अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर भी बात करें तो सभी सत्ता के हस्तांतरण का समर्थन कर रहे हैं. अमरीका इसके लिए तैयार है, इराक़ी इसके लिए तैयार हैं मगर स्थिति कुछ तनावपूर्ण है." हक़ीक़त ओठमान के अनुसार, "अब अगर ज़मीनी हक़ीक़त देखें तो आप अगर स्थिति सँभाल न सकें और सुरक्षा सुनिश्चित न कर सकें तो अगर आपके पास अंतरराष्ट्रीय समर्थन है भी तब भी नियंत्रण मुश्किल ही होगा.यानी नई सरकार से सामने सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा सुनिश्चित करना है." सरकार तो मार्शल लॉ लगाने तक की बात कर चुकी है हालाँकि इसका असर क्या होगा ये कहना मुश्किल है. इसकी दिक़्क़त ये है कि ये चुनी हुई सरकार नहीं है और इसे आम लोगों का समर्थन हासिल नहीं है. नेशनल एसेंबली के लिए चुनाव जनवरी महीने के अंत में होंगे जो फिर एक अंतरिम सरकार चुनेगी और इसके बाद अगले साल के अंत तक पूरी प्रक्रिया के बाद चुनी हुई सरकार इराक़ में काम सँभालेगी. इस पूरी प्रक्रिया में अहम बात ये है कि विद्रोही किसी भी चरण में या किसी भी स्तर पर इस सरकार को स्वीकार करेंगे या नहीं और ख़ास तौर पर तब जबकि विदेशी सेनाएँ देश में मौजूद हों. अब अगर सरकार को स्वीकार नहीं किया गया तो एक चीज़ निश्चित है और वो है निरंतर संघर्ष. |
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