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अमरीका ने अपनी पुरानी माँग छोड़ी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका ने नई अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत (आईसीसी) में सज़ा से अपने सैनिकों को छूट दिलाने की कोशिशें आख़िरकार छोड़ ही दी हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने सुरक्षा परिषद को इस संबंध में चेतावनी दी थी क्योंकि बंदियों के साथ दुर्व्यवहार का मसला हाल ही में काफ़ी तेज़ी से उछला है. इस बारे में अमरीका ने सुरक्षा परिषद में जो प्रस्ताव रखा था वह वापस ले लिया है क्योंकि उसे लगने लगा कि ये प्रस्ताव वह पारित नहीं करवा सकेगा. पिछले दो साल से अमरीका ने ये कहते हुए अपने सैनिकों के लिए विशेष दर्जा ले रखा था कि इससे उसके सैनिकों के विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण मामले दर्ज हो सकते हैं. संयुक्त राष्ट्र में अमरीका के उप राजदूत जेम्स कनिंघम ने बताया, "अमरीका ने इस प्रस्ताव को और आगे नहीं बढ़ाने का फ़ैसला किया है." उनका कहना था, "हम इस प्रस्ताव पर कार्रवाई रोक रहे हैं." इससे पहले अमरीका ये धमकी तक दे चुका है कि अगर उसे हेग में स्थित इस अदालत से छूट नहीं मिली तो वह संयुक्त राष्ट्र के शांति कार्यक्रमों पर वीटो लगा सकता है.
कनिंघम ने इस बार धमकी तो नहीं दोहराई मगर ये ज़रूर कहा कि अमरीका को संयुक्त राष्ट्र के शांति कार्यक्रमों में हिस्सा लेने पर अब आईसीसी के प्रावधानों पर सोचना होगा. अमरीका ने मंगलवार को सुरक्षा परिषद में कहा था कि ये छूट सिर्फ़ एक साल के लिए और बढ़ा दी जाए. मगर ये भी 15 सदस्यों में से नौ का समर्थन हासिल करने के लिए काफ़ी नहीं था. इससे पहले अन्नान ने कहा था कि 30 जून को ख़त्म हो रही छूट अगर बढ़ा दी जाती है तो इससे संयुक्त राष्ट्र का क़ानून का प्रतिनिधित्व करने का दावा ख़त्म हो जाएगा. उनका कहना था कि पूरी की पूरी छूट देना ग़लत होगा. बीबीसी की सुज़ाना प्राइस का कहना है कि अमरीका ने 1998 की रोम संधि पर हस्ताक्षर करने से ये कहकर इनकार कर दिया था कि इससे अमरीकी सैनिकों को देश के बाहर भी मुक़दमों का सामना करना पड़ सकता है. |
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