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मई दिवस पर विभिन्न मुद्दे उठाए गए | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मज़दूरों की एकता के प्रतीक के रूप में मनाए जाने वाले श्रम दिवस के मौक़े पर एक मई को दुनिया भर के विभिन्न हिस्सों में जुलूस निकाले गए और प्रदर्शन किए गए. हर साल एक मई को मनाए जाने वाले इस श्रम दिवस को मई दिवस के नाम से भी जाना जाता है और इस साल यह 118वाँ मई दिवस था. मई दिवस को विभिन्न मुद्दों पर अपनी आवाज़ उठाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है, जैसे लंदन में हुई एक रैली में नारे लगाए गए कि इराक़ से विदेशी सेनाएं हटनी चाहिए और इराक़ सिर्फ़ इराक़ियों का ही है. तुर्की में लोगों ने विरोध किया कि उनके देश को नैटो में शामिल नहीं होना चाहिए. फ़लस्तीनी क्षेत्रों में लोगों ने इसराइल और अमरीका विरोधी रैलियाँ निकालीं. वहाँ एक रेलगाड़ी में नक़ली इसलाइली और अमरीकी लोग दिखाए गए और प्रतीक के तौर पर उसको जलाया गया. भारत में पश्चिम बंगाल एक मात्र ऐसा राज्य बना है जहाँ अब भी साम्यवादी सरकार है. पहले त्रिपुरा और केरल में भी काफ़ी लंबे समय तक साम्यवादी सरकारें रही हैं. मई दिवस वहाँ भी उत्साह से मनाया गया. मई दिवस क्यों मई दिवस इसलिए मनाया जाता है कि इस दिन मज़दूरों ने बुर्जुआ वर्ग की ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ पहली बार आवाज़ उठाई थी और अपने लिए बेहतर परिस्थितियों के साथ-साथ कुछ बुनियादी अधिकारों की माँग की थी. 1886 में अमरीका के शिकागो में एक कपड़ा मिल में मज़दूरों ने 14-15 घंटे रोज़ाना काम कराने के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और काम ठप कर दिया. उस विद्रोह में क़रीब चालीस हज़ार मज़दूरों ने हिस्सा लिया था. पिछली शताब्दी में तो मज़दूर आंदोलन ने इतना ज़ोर पकड़ा था कि कई देशों में साम्यवादी सरकारें बनीं. सोवियत संघ में 1917 में बोल्शेविक क्रांति के बाद ऐसी साम्यवादी सरकार बनी जिसे मज़दूरों की पहली सरकार बताया गया और देखते ही देखते यह मज़दूर क्रांति अन्य कई देशों में फैल गई. मार्क्स ने नारा दिया था कि हर व्यक्ति को अपनी योग्यतानुसार काम करने का मौक़ा मिलना चाहिए और उसे उसकी ज़रूरत के हिसाब से चीज़ें मिलनी चाहिए. इसके तहत सामाजिक व्यवस्था यह थी कि हर आदमी को सहकारी दुकान से खाने-पीने की चीज़ें मुफ़्त मिलतीं और वह अपनी योग्यतानुसार काम करते. यानी लोगों की देखभाल करने की पूरी ज़िम्मेदारी सरकार पर होती थी और लोग बिना किसी चिंता के मन लगाकर काम करते थे. उत्थान और पतन साम्यवाद की नींव डाली थी जर्मन विद्वान कार्ल मार्क्स ने यह नारा देकर - "दुनिया के मज़दूरों एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं और पाने के लिए सारी दुनिया है." हालाँकि यह भी दिलचस्प बात है कि जर्मनी में कभी भी साम्यवाद नहीं पनपा.
पहले विश्वयुद्ध में भी सोवियत संघ एक मज़बूत स्तंभ था और दूसरे विश्व युद्ध तक आते-आते वह तो मज़बूत हुआ ही कुछ और देशों में भी साम्यवादी सरकारें बनीं. दूसरे विश्व युद्ध के बाद तो दुनिया में दो खेमे ही बन गए. एक था अमरीका के नेतृत्व वाला पूंजीवादी खेमा और दूसरा सोवियत संघ के नेतृत्व वाला साम्यवादी खेमा. लेकिन इन दोनों खेमों के बीच शीत युद्ध ने इतना गंभीर रूप लिया कि 1990 का समय आते-आते साम्यवादी व्यवस्था बिखरने लगी. साम्यवादियों का आरोप है कि अमरीका के नेतृत्व वाले पूंजीवादी खेमे ने साम्यवादी सरकारों वाले देशों में जानबूझकर लोगों में फूट डाली, वहाँ की व्यवस्थाओं में चीज़ों की कमी का नकली संकट खड़ा किया और लोगों में एक असुरक्षा की भावना भर दी. जबकि पूंजीवादी गुट का कहना है कि साम्यवादी सरकारें अपने लोगों पर बहुत दमन करती थीं और वहाँ लोकतांत्रिक मूल्यों के उलट एक ख़ास गुट की तानाशाही ही चलती थी. पिछली शताब्दी का अंतिम दशक साम्यवाद के सफ़ाए का दौर था और 1990 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही एक तरह साम्यवाद का ख़ात्मा भी शुरू हो गया. अब दिलचस्प बात ये है कि पूर्वी यूरोप यानी पूर्व सोवियत संघ के बहुत से देश भी अब यूरोपीय संघ में शामिल हो गए हैं और उनकी राजनीतिक व्यवस्था और अर्थव्यवस्था पर पश्चिम का बड़ा असर देखा जा सकता है. |
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