रोहिंग्या मुसलमानों के हालात पर बढ़ती चिंता

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बर्मा में गत जून में हुई सांप्रदायिक हिंसा में प्रभावित हुए रोहिंग्या मुसलमानों के लिए इस्लामी देशों में चिंता बढ़ती जा रही है और कुछ देश इस समुदाय को आर्थिक मदद देने के लिए आगे आ रहे हैं.
सउदी अरब की मीडिया में खबरें आ रही हैं कि किंग अब्दुल्ला ने बर्मा की रोहिंग्या मुसलमान अल्पसंख्यक समुदाय के लिए पांच करोड़ डॉलर की राशि भेजने का आदेश दिया है.
इससे पहले तुर्की भी सांप्रदायिक हिंसा से प्रभावित हुए लोगों के कल्याण के लिए पांच करोड़ डॉलर की धन राशि दे चुका है.
पिछले हफ्ते तुर्की के विदेश मंत्री व प्रधानमंत्री ने बर्मा का दौरा किया और इस राशि के वितरण का जायज़ा लिया.
इसके अलावा इस्लामी सहकारिता संगठन यानि ऑरगनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कॉपरेशन ने भी रोहिंग्या समुदाय की दशा को लेकर चिंता जताई थी जिसके बाद बर्मा की सरकार ने संगठन द्वारा आर्थिक सहायता लेने पर अपनी सहमति दे दी है.
बहुसंख्यक बौद्ध समुदाय और अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमान समुदाय के बीच गत जून में शुरू हुए सांप्रदायिक तनाव में कम से कम 77 लोग मारे गए थे जबकि 80,000 से ज़्यादा विस्थापित हो गए हैं.
मंगलवार को सऊदी अरब में आयोजित होने वाली इस्लामी सहकारिता संगठन की दो-दिवसीय बैठक में रोहिंग्या समुदाय के विस्थापन के मुद्दे पर चर्चा होने की संभावना है.
उधर पाकिस्तान की मीडिया में आ रही ख़बरों के मुताबिक प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन जमात-उद-दावा के अध्यक्ष हाफिज़ सईद ने पाकिस्तान के नागरिकों से अपील की है कि वे रोहिंग्या समुदाय की आर्थिक मदद के लिए आगे आएं.
दरअसल बर्मा में रहने वाले रोहिंग्या समुदाय के हज़ारों लोगों को वहां की नागरिकता नहीं दी गई है और सांप्रदायिक हिंसा की वजह से वे बर्मा छोड़ जाने को मजबूर हैं.
आइए एक नज़र डालते हैं बर्मा में रोहिंग्या मुसलमान के इतिहास और उनसे जुड़े विवाद पर....
कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान?

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संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक रोहिंग्या पश्चिमी बर्मा में रहने वाला मुसलमानों का एक धार्मिक समुदाय है, जो कि विश्व में सबसे ज़्यादा प्रताड़ित अल्पसंख्यक समुदायों में से एक है.
इस समुदाय की जड़ बर्मा में है या नहीं, इस बात पर इतिहासकारों के बीच मतभेद रहा है. जहां कुछ इतिहासकारों का कहना है कि इस समुदाय का जन्म सदियों पहले इसी क्षेत्र में हुआ था, वहीं कुछ का मानना है कि पिछली शताब्दी में ये लोग दूसरे देशों से आकर बर्मा में बस गए.
बर्मा की सरकार का कहना है कि रोहिंग्या मुसलमान भारतीय उपमहाद्वीप से आए प्रवासी हैं और इसलिए इस समुदाय को देश के संविधान में मूल निवासी होने का दर्जा नहीं दिया गया है.
बर्मा की बहुसंख्यक रखैन समुदाय रोहिंग्या मुसलमानों का बहिष्कार करती आई है. यहां तक कि बर्मा के राष्ट्रपति थीन सीन भी ये कह चुके हैं कि दोनों समुदायों के बीच समस्या का समाधान यही है कि रोहिंग्या मुसलमानों को या तो देश से निकाल दिया जाए या उन्हें शरणार्थी कैंपों में रखा जाए.
लेकिन दिक्कत ये है कि पड़ोसी देश बांग्लादेश भी उन्हें अपनाने से इंकार करता आया है क्योंकि वहां की सरकार का कहना है कि वे इतने सारे शरणार्थियों का बोझ नहीं उठा सकते.
हिंसा ने सांप्रदायिक मोड़ क्यों लिया?
बौद्ध धर्म मानने वाले रखैन समुदाय और अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमान समुदाय के बीच लंबे समय से तनाव बरकरार है.
बर्मा के ज़्यादातर मुसलमान खुद को रोहिंग्या मानते हैं और वे ये भी मानते हैं कि इस समुदाय का जन्म बांग्लादेश में हुआ जो कि पहले बंगाल कहलाया जाता था.
बांग्लादेश सीमा के पास रहने वाले ज़्यादातर लोग मुसलमान हैं.
मई के महीने में कथित तौर पर मुसलमानों के ज़रिए एक बौद्ध महिला के बलात्कार और फिर उसकी हत्या के बाद हिंसा की शुरूआत हुई. इसके जवाब में मुसलमानों को ले जा रही एक बस पर हमला हुआ.
उसके बाद से हिंसा में बढ़ोत्तरी होती गई और हज़ारों लोग अपने घरों को छोड़कर भागने पर मजबूर हो गए.
रोहिंग्या मुसलमानों और बौद्धों के बीच हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर दी थी.
आपातकाल की घोषणा क्यों की गई और इसका मतलब क्या है?

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बढ़ती हिंसा के बीच बर्मा की सरकार ने रखैन क्षेत्र में आपातकाल की घोषणा की.
आपातकाल की घोषणा का मतलब है कि अब वहां स्थानीय प्रशासन के बजाय सेना का नियंत्रण हैं.
ये पहली बार है जब बर्मा की वर्तमान सरकार ने वहां किसी क्षेत्र में आपातकाल की घोषणा की है.
राष्ट्रपति थीन सीन का कहना है कि अगर हिंसा बढ़ी, तो बर्मा में लोकतंत्र स्थापित होने की प्रक्रिया खतरे में पड़ सकती है.
हालांकि हाल ही में मानवाधिकार संगठन ह्युमन राइट्स वॉच ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि बर्मा में जून के महीने में रोहिंग्या मुसलमानों और बौद्ध धर्म के मानने वालों के बीच हुए सांप्रदायिक दंगों में वहां की सेना ख़ामोश तमाशाई बनी रही और सेना अब भी मुसलमानों को प्रताड़ित कर रही है.
क्या इस संकट के गहराने की आशंका है?
रखैन क्षेत्र में पत्रकारों को जाने की इजाज़त नहीं दी गई है, जिसके कारण रोहिंग्या समुदाय की असल स्थिति के बारे में कोई नहीं जानता.
हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि तनाव बढ़ने की काफी आशंका है.
संयुक्त राष्ट्र वैश्विक खाद्य परियोजना के मुताबिक ताज़ा हिंसा में 90,000 लोग विस्थापित हो चुके हैं, जबकि रखैन में ही इस समुदाय की आबादी एक लाख के आसपास बताई जाती है.
ज़्यादातर रोहिंग्या मुसलमान हिंसा से बचने के लिए नदी के रास्ते बांग्लादेश में अवैध रूप से घुसने की कोशिश करते हैं.
बांग्लादेश सरकार के मुताबिक उनके शरणार्थी कैंपों में 29,000 रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं लेकिन अवैध कैंपों में करीब 3 लाख रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं.
ऐसे में इस समुदाय की आबादी कहां पर कितनी है, इस पर कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन रिपोर्टों में आने वाले आंकड़ो को जोड़ कर देखा जाए तो इस समुदाय की जनसंख्या करीब 10 लाख है.












