खेती और भूख का अंकगणित

- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, गेवरा गाँव, बुंदेलखंड से
खेत में खड़े जामुन के पेड़ से रस्सी के सहारे एक डलिया बाँध दी गई है. हरियाँ की दो महीने की पोती को इसी डलिया के झूले में रख दिया गया है. उसकी माँ रोटी-पानी की जुगत में लग गई है.
हरियाँ की पत्नी मलीदा और दो छोटे छोटे बच्चे खेतों में मूँगफली की फ़सल उखाड़ने में जुट गए हैं. हरियाँ का बेटा किशोरी बैलों को तैयार कर रहा है.
पहला हल सूखे खेत में लगाना होगा हालाँकि ये हलवाहे और बैल दोनों के लिए थोड़ा सख़्त काम होता है.
पूरा परिवार दिनभर खेतों में काम करेगा.
हरियाँ के पास कुल मिलाकर सवा दो एकड़ ज़मीन है. इस ज़मीन पर आठ बड़े और सात छोटे बच्चों का जीवन निर्भर है. हरियाँ का बेटा किशोरी और उनकी पत्नी विमला गाँव में ही रहते हैं, लेकिन उनके दो छोटे बेटे अपने परिवारों के साथ शहर में मज़दूरी करने चले गए हैं.
कठिन बजट

हरियाँ के पास सिंचाई के लिए डीज़ल का एक पंपिंग सेट है, खेतों में डालने के लिए खाद ख़रीदनी होती है, कुछ खेत हल-बैल से जोत लेते हैं लेकिन बाक़ी की जुताई ट्रैक्टर से होती है.
इसके अलावा पूरे परिवार के खाने के लिए नून-तेल, आटा, मिट्टी का तेल, कपड़ा, हारी-बीमारी हर चीज़ का इंतज़ाम करना पड़ता है.
मैं पूछता हूँ, “खेती से कितनी आमदनी हो जाती है आपको”?
हरियाँ पूरा हिसाब समझाते हैं: "एक कुंतल गेहूँ पैदा करने के लिए कम से कम दो बोरी खाद, एक घंटा जुताई के 500 रुपए और चार पाँच बार सिंचाई करनी होती है. एक बार में 15-20 लीटर डीज़ल लगता है तो कुल मिला कर लगभग सौ लीटर डीज़ल सिंचाई में लग जाता है.”
फटेहाल हरियाँ के मुँह से ट्रेक्टर, पंपिंग सेट, डीज़ल सुनना मुझे अटपटा लगता है. उनके पूरे परिवार का जॉब कार्ड बना हुआ है. खेतों से फ़ुरसत मिली तो उनका परिवार रोज़गार गारंटी योजना के तहत नरेगा की मज़दूरी भी करता है.
फिर भी परिवार का पूरा नहीं पड़ता. कई आख़िर डीज़ल, ट्रैक्टर के लिए पैसा कहाँ से आता है?
क़र्ज़ का दुष्चक्र
हरियाँ बताते हैं, “पैसा साहूकार से उठा लेते हैं. हम ये नहीं देखते कि खेती में मुनाफ़ा हो रहा है या टोटा. हमें खेती करने से मतलब है. नहीं तो ज़मीन छोड़कर जाएँगे कहाँ? इसके लिए हम पाँच रुपए सैकड़ा में साहूकार से क़र्ज़ लेते हैं. बदले में कभी इंजन, कभी बैल तो कभी बकरी गिरवी रख देते हैं. पैसा आने पर साहूकार को अदा कर देते हैं.”
साहूकार का नाम सुनते ही आम तौर पर साठ और सत्तर के दशक में हिंदी फ़िल्मों के कुटिल खलनायक का चेहरा सामने आता है. लेकिन हरियाँ को उधार देने वालों में स्थानीय दुकानदार से लेकर गाँव गाँव घूमकर चूड़ी बेचना वाला मनिहार तक शामिल है.
हरियाँ की पत्नी मलीदा बताती हैं, “पिछली बार खाद के लिए रुपया कम पड़ गया था. तब हमने चूड़ी वाले से पाँच हज़ार रुपए माँगे थे.”
खेती-किसानी के लिए बैंक क़र्ज़ देते हैं और ये बात हरियाँ को अच्छी तरह मालूम है. फिर भी वो बैंक की ओर कभी रुख़ नहीं करते. वो कहते हैं कि स्थानीय दुकानदार से क़र्ज़ माँगने में ज़्यादा झंझट नहीं होता.
किसान अपनी ज़मीन, बकरियाँ, पंपिंग सेट या दूसरी कोई संपत्ति गिरवी रख देते हैं और तुरंत पैसा मिल जाता है.
हरिया बताते हैं, “बैंकों में हमारी कोई सुनवाई नहीं. पाँच पाँच चक्कर काटने पड़ते हैं तब भी काम नहीं होता. जबकि साहूकार हाथ के हाथ उधार दे देता है.”
हरियाँ कहते हैं खाद बीज के अलावा पूरे परिवार की दिन-प्रतिदिन की ज़रूरत पूरी करने के लिए भी दुकान से सामान ख़रीदना पड़ता है.
नून, तेल, बीड़ी, माचिस, आटा, सब्ज़ी और ऐसा दूसरा सामान महीने भर के लिए एक साथ ख़रीदना हरियाँ के बूते की बात नहीं है. जब ज़रूरत होती है तभी वो ये सामान ख़रीदते हैं.
बढ़ीं मुश्किलें

पर क्या वो रोज़ाना औसतन 26 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से ख़र्च करते हैं?
हरिया कहते हैं कि खाद, बीज, डीज़ल, ट्रेक्टर का किराया और रोज़मर्रा की ज़रूरत के सामान की क़ीमतें जिस तरह से दिन पर दिन बढ़ रही है उसके हिसाब से रोज़ाना औसतन 26 रुपए से कहीं ज़्यादा ख़र्च होता है.
हरियाँ के लिए वर्तमान काटना कठिन है. बीता हुआ समय भी उनके लिए इतना ही या फिर इससे भी ज़्यादा कठिन था. लेकिन जो कट गया वो वक़्त आज के मुक़ाबले आसान लगता है.
वो कहते हैं, “पहले ज़माने में मेहनत-मज़दूरी इतनी नहीं होती थी. आज सुविधाएँ ज़्यादा हैं. लेकिन आज हमारी मुश्किलें बढ़ गई हैं. खेती हम करते हैं, पर कमाने की बजाए हमें खेती में दोगुना भी देना पड़ता है.”
मुझे योजना आयोग का समीकरण याद आता है – देहात में प्रति व्यक्ति 26 रुपए रोज़ाना ख़र्च करने वाला आदमी ग़रीब नहीं कहलाया जाएगा. पर हरियाँ का परिवार औसतन इससे ज़्यादा कमाता और ख़र्च करता है.
इस हिसाब से हरियाँ का परिवार ग़रीब वर्ग में नहीं हो सकता. फिर क्यों हरियाँ मुझे बताते हैं कि कई बार रोटी बच्चों को खिलाने के बाद आटा नहीं बचता तो हम सब भूखे भी सो जाते हैं?
(जारी...)












