पर्रिकर के बयान से कश्मीरी क्यों कांपे?

मनोहर पर्रिकर

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इमेज कैप्शन, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के एक बयान से कश्मीरी सकते में हैं.
    • Author, बशीर मंज़र
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के हाल ही में दिए गए बयान "चरमपंथियों को मारने के लिए चरमपंथियों का इस्तेमाल किया जाएगा" पर भारत-प्रशासित जम्मू-कश्मीर में बहस शुरु हो गई है.

कई राजनीतिक पार्टियों ने डर ज़ाहिर किया है कि सरकार फिर से इख़्वान संस्कृति को ज़िंदा करने की तैयारी कर रही है.

इख़्वान क्या था

1994 में जब भारत-प्रशासित जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी हिंसा अपने चरम पर थी तब सेना ने कुछ चरमपंथियों को कथित तौर पर लालच देकर पाकिस्तान-समर्थित चरमपंथियों के ख़िलाफ़ और अपने साथ शामिल कर लिया था. आत्मसमर्पण करने वाले लड़ाकों को भी कथित तौर पर 'भारत का युद्ध' लड़ने के लिए लालच दिया गया था.

मोहम्मद यूसुफ़ पारे उर्फ़ कुक्का पारे पाकिस्तान-समर्थिक इख़्वान-उल-मुसलेमीन के सक्रिय लड़ाके थे. सबसे पहले उन्होंने कथित तौर पर भारतीय सेना से हाथ मिलाया था और अपने कुछ साथियों के साथ नया संगठन इख़्वान-उल-मुसलीमून बनाया था.

कश्मीर में अलगाववादी

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उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा ज़िले के हाजन इलाक़े से ताल्लुक़ रखने वाले कुक्का पारे चरमपंथी बनने से पहले शादियों में कश्मीरी लोक गीत गाकर जीवन यापन करते थे. वो चरमपंथियों के ख़िलाफ़ एक कुख़्यात लड़ाके बनकर उभरे थे.

सैकड़ों अन्य लड़ाके अलग-अलग चरमपंथी संगठनों को छोड़ इख़्वान में आ मिले थे और पूरी कश्मीरी घाटी में चरमपंथियों और उनके समर्थकों का सफ़ाया करना शुरू कर दिया था.

इस समूह को हथियार और पैसा कथित तौर पर भारतीय सेना ने दिया था और उन्हें ख़ुफ़िया एजेंसियां की भी मदद प्राप्त थी.

क्या कश्मीर सुरक्षित हुआ?

कश्मीर में पाकिस्तान-समर्थित अलगाववादी चरमपंथियों की कमर इख़्वान ने ही तोड़ी थी लेकिन इस दौरान उन्होंने कथित तौर पर जिसे चाहा मार दिया, जहाँ चाहा लूटमार की. बलात्कार के कई मामलों के लिए भी उन्हें ज़िम्मेदार ठहराया गया.

इसी बीच एक और लड़ाके ग़ुलाम नबी उर्फ़ नबा आज़ाद ने भी अपना संगठन मुस्लिम मुजाहिदीन शुरू किया और एक और लड़ाके लियाक़त के साथ मिलकर दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियान चलाया.

कश्मीर घाटी

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इन चरमपंथ विरोधी समूहों ने जहाँ पाकिस्तान-समर्थक चरमपंथियों की हालत ख़राब कर दी वहीं कहा जाता है कि उन्होंने कथित तौर पर सैंकड़ों बेग़ुनाह नागरिकों की जानें भी लीं.

उन पर लूटमार और लकड़ी की तस्करी के आरोप लगते रहे. उनके विरोधियों का कहना है कि वे सीधे सेना के साथ मिलकर काम कर रहे थे इसलिए पुलिस उन्हें छू भी नहीं पा रही थी.

भारत को क्या मिला?

लंबे राष्ट्रपति शासन के बाद 1996 में कराए गए जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों का श्रेय इख़्वान को दिया जाता है.

पाकिस्तानी-समर्थक चरमपंथियों जान बचाकर भागने लगे और उनसे सहानुभूति रखने वाले का हौसला टूट गया. कहा जाता है कि इसी वजह से सरकार शांतिपूर्ण तरीक़े से चुनाव करा सकी.

चुनावों से पहले कुक्का पारे ने एक राजनीतिक पार्टी अवामी लीग बना ली और उत्तरी कश्मीर की सोनावरी सीट से चुनाव जीता. कहा जाता है कि उसे जिताने में सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की कथित भूमिका थी.

पारे के करीबी सहयोगी जावेद डार ने सत्ताधारी नेशनल कांफ़्रेंस का दामन थाम लिया और उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर फ़ारूख़ ने विधान परिषद का सदस्य बना दिया .

अलगाववादी समर्थक

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मुख्यधारा में आने के बाद क्या हुआ?

हालात सुधरने के बाद इख़्वान का महत्व भी ख़त्म होना शुरू हो गया.

इख़्वान के बहुत से सदस्यों को जम्मू-कश्मीर पुलिस के विशेष दल काउंटर इंसरजेंसी ग्रिड में शामिल कर लिया गया. अगले कुछ सालों में सेना ने धीरे-धीरे उन्हें सुरक्षा देना बंद कर दिया और अधिकतर पाकिस्तान-समर्थक लड़ाकों के हाथों मारे गए.

अगस्त 2003 में पारे के बेहद क़रीबी रहे जावेद शाह की श्रीनगर में हत्या कर दी गई. अगले ही महीने तेरह सितंबर को कुक्का पारे भी चरमपंथियों की गोली का निशाना बन गए. और एक तरह से इख़्वान का भी अंत हो गया.

सेना और सुक्षा एजेंसियों के लिए भले ही इख़्वान कश्मीर में अलगाववादी हिंसा से निबटने के लिए कथित तौर पर 'सबसे अच्छी चीज़' रहा हो लेकिन इसका नाम सुनते ही सामान्य कश्मीरियों की रूह काँप जाती है.

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