रिटायर लड़ाकू विमान 'एफ़-104' की वापसी

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    • Author, स्टीफ़न डॉलिंग
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

शीत युद्ध के दौरान अमरीका और सोवियत संघ ने एक से एक चीज़ें बनाई थीं, जंग के लिए. इन्हीं में से एक था अमरीका का स्टारफ़ाइटर. इसे अमरीकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने बनाया था. इसका नाम था F-104. अस्सी के दशक में रिटायर हो चुका ये लड़ाकू जहाज़ एक बार फिर रिटायरमेंट से वापस आ रहा है. और आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि अब इस लड़ाकू जहाज़ से सैटेलाइट लॉन्च किए जाएंगे.

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पचास के दशक में कोरियाई युद्ध के दौरान, अमरीका ने सोवियत लड़ाकू विमानों मिग-15 का कमाल देखा था. उनकी रफ़्तार देखकर अमरीकी पायलट हैरान रह गए थे. जिसके बाद एक तेज़ रफ़्तार लड़ाकू जहाज़ की ज़रूरत हुई. विमानों के डिज़ाइनर क्लैरेंस केली जॉनसन ने अमरीकी पायलटों से बात करने के बाद ये बेहद शानदार लड़ाकू जहाज़ तैयार किया था, जिसका नाम उन्होंने F-104 रखा.

इस विमान को देखेंगे तो लगेगा कि इसका डिज़ाइन किसी बच्चे ने तैयार किया है. आगे की तरफ़ निकली हुई बेहद नुकीली नोज़प्लेन, फिर बहुत छोटा सा कॉकपिट, धारदार डैने और ऊंची टेल.

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पचास के दशक में तैयार हुआ F-104 या स्टारफाइटर आज भी दूसरी दुनिया से आया हुआ लगता है. और रफ़्तार के मामले में तो ये आज साठ साल बाद बनने वाले लड़ाकू जहाज़ों के बराबर था. उस वक़्त इसकी रफ़्तार पंद्रह सौ किलोमीटर प्रति घंटे यानी आवाज़ की रफ़्तार से दोगुनी थी.

इस जहाज़ को अमरीका ने तैयार किया था दुश्मन के विमानों का पीछा करने और उनके हमला करने से पहले ही उन्हें तबाह करने के लिए. लेकिन, इसे इसके लिए बहुत ज़्यादा काम में नहीं लाया जा सका.

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एक तो ये की बहुत ऊंचाई पर जाने के बाद इसकी रफ़्तार बेक़ाबू हो जाती थी. दूसरी दिक़्क़त ये थी कि तेज़ रफ़्तार में इसे ज़मीन के ज़्यादा क़रीब नहीं उड़ाया जा सकता था. फिर इसकी ऊंची टेल की वजह से किसी हादसे की सूरत में पायलट के इजेक्ट करने पर टेल से टकराने का डर था.

अमरीका के मशहूर पायलट चक यीगर एक बार इसी तरह F-104 स्टारफाइटर उड़ाते वक़्त हादसे का शिकार हो गए थे.

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पहले F-104 ने मार्च 1954 में उड़ान भरी थी. इसे इंसानों से लैस मिसाइल का नाम दिया गया था. इसमें जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी का बेहद ताक़तवर इंजन लगा हुआ था. एक पायलट ने इस लड़ाकू जहाज़ को उड़ाने के तजुर्बे को कुछ इस तरह बयां किया, 'स्टारफाइटर को उड़ाना किसी रेसिंग कार को उसके हुड पर बैठकर चलाने जैसा था'.

इसकी रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि पायलट एक मिनट में पंद्रह किलोमीटर की ऊंचाई पर पहुंच जाता था. आज पांचवीं पीढ़ी के फाइटर प्लेन भी कमोबेश इसी रफ़्तार से उड़ते हैं. इस ख़ूबी के सिवा इस F-104 स्टार फाइटर के साथ कई दिक़्क़तें थीं. छोटे पंख होने के चलते इसे ज़्यादा ऊंचाई पर उड़ाना और क़ाबू में लाना बेहद मुश्किल था.

हालांकि इसकी रफ़्तार और ख़ास डिज़ाइन की वजह से इसे कई देशों की वायुसेनाओं ने इस्तेमाल किया. अमरीका ने क़रीब 300 स्टारफाइटर ख़रीदे. इसके अलावा जर्मनी ने हज़ार से ज़्यादा F-104 लड़ाकू जहाज़ लिए. तुर्की, नीदरलैंड और जापान ने भी स्टारफाइटर प्लेन ख़रीदे. इनके अलावा डेनमार्क, नॉर्वे, इटली और कनाडा ने भी F-104 स्टारफाइटर को अपनी वायुसेना में शामिल किया.

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हालांकि इसकी वजह से लॉकहीड कंपनी पर घूस देकर विमान बेचने का दाग़ भी लगा.

दिलचस्प बात ये कि आसमानी जंग के लिए बनाए गए स्टारफाइटर ने अक्सर वो काम किया जिसके लिए उसे बनाया नहीं गया था. इसकी मदद से नैटो देशों की वायुसेनाओं ने दुश्मन के इलाक़े की निगरानी और जासूसी की. इस दौरान भी कई हादसे हुए जर्मनी के तो क़रीब तीन सौ स्टार फाइटर हादसों के शिकार हुए.

वहीं डच वायुसेना ने भी स्टारफाइटर की मदद से दुश्मन के इलाक़ों की जासूसी की. इसे उड़ाने वाले एक पायलट, फेरी वान डर गीस्ट F-104 को उड़ाने को दिलचस्प तजुर्बा बताते हैं.

वो कहते हैं कि उनके देश में इसमें लगने वाली मिसाइलों और तोपों को हटा दिया गया था. इनकी जगह और ईंधन डालने का इंतज़ाम करने से, ये विमान लंबे वक़्त तक हवा में रह सकते थे. ये विमान 1100 किलोमीटर की रफ़्तार से उड़ते हुए दुश्मन के इलाक़ों की तस्वीर लेते थे.

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सोवियत विमानों से सबसे ज़्यादा डर पश्चिमी जर्मनी को था. इसलिए सबसे ज़्यादा स्टारफाइटर भी पश्चिमी जर्मनी की वायुसेना ने ख़रीदे थे. इसके पायलट रहे डिर्क पीटर मर्कलिंगहास कहते हैं कि वो बेहद कम ऊंचाई पर ये विमान उड़ाते थे.

इसमें दुश्मन की एंटी एयरक्राफ्ट गन का शिकार होने का ख़तरा होता था. इसलिए स्टारफाइटर की तेज़ रफ़्तार इस ख़तरे से बचने में काम आती थी.

अस्सी के दशक में ज़्यादातर वायुसेनाओं ने स्टारफाइटर को रिटायर कर दिया था, लेकिन नासा इनका इस्तेमाल करती थी. इनकी मदद से अंतरिक्ष यात्रियों को ट्रेनिंग दी जाती थी. जिसके बाद वो आवाज़ से कम रफ़्तार वाले विमान में उड़ान भरते थे.

इनकी मदद से नासा के वैज्ञानिक दूसरे तजुर्बे भी करते थे. हालांकि 1994 में नासा ने भी स्टारफाइटर्स को अलविदा कह दिया था.

विमानों के जानकार अमरीकी रे पैन्को कहते हैं कि स्टारफाइटर के साथ काफ़ी नाइंसाफ़ी हुई. इसे इस्तेमाल करने वाले इसकी ख़ूबियों को नहीं समझ सके, क्योंकि ये अपने वक़्त से बहुत आगे की चीज़ थी.

हालांकि अब साठ साल बाद इसकी उपयोगिता, को एक अमरीकी कंपनी ने समझा है. क्यूबकैब नाम की ये कंपनी F-104 स्टारफाइटर विमानों से सैटेलाइट लॉन्च करेगी.

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हालांकि ये सैटेलाइट छोटे-छोटे होंगे. इस जहाज़ में जहां पर हमले के लिए मिसाइलें लगाई जाती थीं, वहां पर रॉकेट लगाए जाएंगे. पायलट इन विमानों को तीस हज़ार फुट की ऊंचाई पर ले जाएगा. वहां से फिर रॉकेट से सैटेलाइट को अंतरिक्ष भेजा जाएगा.

कंपनी के COO डस्टिन स्टिल, इन विमानों के बड़े फैन हैं. उनकी ख़्वाहिश एक स्टारफाइटर ख़रीदने की है. पर फिलहाल तो वो 2018 से स्टारफाइटर्स की मदद से सैटेलाइट लॉन्च करने की तैयारी कर रहे हैं.

डस्टिन का कहना है कि आज छोटे सैटेलाइट भेजने के लिए लोगों को काफ़ी इंतज़ार करना पड़ता है. बड़े सैटेलाइट ले जा रहे रॉकेट में जगह होनी चाहिए. फिर उसके लिए आप लंबा इंतज़ार कीजिए.

वहीं डस्टिन, स्टारफाइटर की मदद से बुकिंग के एक महीने के भीतर ही उपग्रह को लॉन्च करने का इरादा रखते हैं. इससे सैटेलाइट के प्रक्षेपण का ख़र्च भी कम होगा. और स्कूल-कॉलेज या यूनिवर्सिटी के छोटे सैटेलाइट जल्दी से जल्दी अंतरिक्ष भी पहुंच जाएंगे.

स्टारफाइटर के मुरीद रहे लोग डस्टिन स्टिल के इस प्लान से काफ़ी ख़ुश हैं.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20160826-the-1950s-jet-launching-tiny-satellites" platform="highweb"/></link> करें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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