सोयाबीन कारः हेनरी फ़ोर्ड की 1941 की ग्रीन कार बाज़ार में क्यों नहीं आई

बायोप्लास्टिक से बनी अपनी कार को प्रस्तुत करते हेनरी फ़ोर्ड

इमेज स्रोत, THE HENRY FORD / FORD MOTOR COMPANY

इमेज कैप्शन, बायोप्लास्टिक से बनी अपनी कार को प्रस्तुत करते हेनरी फ़ोर्ड

हेनरी फ़ोर्ड ने दुनिया की पहली बड़े पैमाने पर उत्पादित की गई कार फोर्ड-टी बनाई थी और वो गाड़ियों की दुनिया में अमर हो गए हैं.

अमेरिकी हेनरी फ़ोर्ड ने कार निर्माण के लिए जो असेंबली लाइन स्थापित की थी उसने ऑटोमोबाइल उत्पादन की दुनिया में क्रांति ला दी थी.

बीसवीं सदी की शुरुआत में उन्होंने यातायात उद्योग के लिए बड़ा बाज़ार खड़ा किया था.

अब सौ साल बाद ईंधन पर चलने और कार्बनडाइऑक्साइड छोड़ने वाले इन वाहनों को धरती का तापमान बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार माना जा रहा है.

लेकिन बहुत ही कम लोग ये बात जानते होंगे कि जिस इंसान ने कारों के प्रति हमारी दीवानगी को जन्म दिया वो पर्यावरण के क्षेत्र में भी एक पुरोधा थे.

वीडियो कैप्शन, दुनिया की सबसे छोटी कारों की रेस

'सोयाबीन कार'

क्योंकि 1930 के दौर में फ़ोर्ड उन पहले लोगों में शामिल थे जिन्होंने बायोप्लास्टिक का उत्पादन और इस्तेमाल किया.

बायोप्लास्टिक एक तरह का प्लास्टिक होता है जो पौधों और हाइड्रोकार्बन से बनता है और ये बायोडीग्रेडेबल (स्वयं ख़त्म हो जाने वाला) होता है.

फ़ोर्ड ने ना सिर्फ़ बॉयोप्लास्टिक का निर्माण किया बल्कि वो इससे कार बनाने वाले इतिहास के पहले व्यक्ति भी थे.

इस कार को 'सोयाबीन कार' या 'सोयाबीन ऑटो' नाम दिया गया था. फ़ोर्ड ने 1941 में इसे जनता के सामने पेश किया था.

फ़ोर्ड का दावा था कि ये प्लास्टिक स्टील से दस गुणा मज़बूत थी और वो इसे लेकर इतना आश्वस्त थे कि उन्होंने एक कुल्हाड़ी लेकर हर मेटेरियल के पेनल पर वार किया था और दिखाया था का सिर्फ़ मेटल वाले पेनल में ही गड्ढे पड़े थे.

हेनरी फ़ोर्ड को उम्मीद थी की बायोप्लास्टिक कार निर्माण में स्टील की जगह ले लेगी

इमेज स्रोत, THE HENRY FORD / FORD MOTOR COMPANY

इमेज कैप्शन, हेनरी फ़ोर्ड को उम्मीद थी की बायोप्लास्टिक कार निर्माण में स्टील की जगह ले लेगी

किसान और उद्योगपति

ये अलग बात है कि इस पदार्थ से गाड़ियों के दसियों हज़ार कल पुर्ज़े बनाने की संभावना ज़ाहिर करने वाले फ़ोर्ड भी अपने इस इरादे को पूरा नहीं कर पाए.

वास्तविकता में उनकी सोयाबीन कार कभी बाज़ार में नहीं उतर सकी. जो एक कार बनाई गई थी उसे भी नष्ट कर दिया गया था और उसकी कोई नकल भी मौजूद नहीं है.

सवाल उठता है कि फ़ोर्ड ने अपना ये ग्रीन प्रोजेक्ट बंद क्यों कर दिया और ये कामयाब क्यों नहीं हुआ?

बेनसन फ़ोर्ड रिसर्च सेंटर के मुताबिक प्रसिद्ध कारोबारी हेनरी फ़ोर्ड मिशीगन के एक कृषि फार्म में पले-बढ़े थे और वो हमेशा ये सोचते थे कि उद्योग को कृषि से कैसे जोड़ा जाए.

बेनसल सेंटर हेनरी फ़ोर्ड के काम को बढ़ावा देने के लिए काम करता है.

कार के निर्माण में इस्तेमाल बॉयोप्लास्टिक किन किन चीज़ों से बना था इसकी ठोस जानकारी अब मौजूद नहीं है

इमेज स्रोत, THE HENRY FORD / FORD MOTOR COMPANY

इमेज कैप्शन, कार के निर्माण में इस्तेमाल बॉयोप्लास्टिक किन किन चीज़ों से बना था इसकी ठोस जानकारी अब मौजूद नहीं है

प्लास्टिक पैनल कार

फ़ोर्ड ने ऐसी लैब बनाई थीं जहां सोयाबीन, मक्का, गेहूं और भांग के ओद्योगिक इस्तेमाल खोजने के प्रयास किए जाते थे.

इन पौधों से बनी प्लास्टिक से कार बनाने के विचार ने ना सिर्फ़ फ़ोर्ड के कृषि और उद्योग को जोड़ने के मक़सद को पूरा किया बल्कि इसके अन्य फ़ायदे भी थे.

बेनसन फोर्ड रिसर्च सेंटर के मुताबिक फ़ोर्ड को लगता था कि प्लास्टिक पैनल कार को पारंपरिक स्टील फ्रेम कार के मुताबिक अधिक सुरक्षित बनाते हैं.

ये कार चूर-चूर हुए बिना रोलओवर भी हो सकती थी. इस कार को बनाने का एक दूसरा कारण भी था.

साल 1939 में यूरोप में दूसरे विश्व युद्ध की शुरूआत हो चुकी थी और दुनिया में मेटल की कमी थी.

वीडियो कैप्शन, कार चोरी होने से बचाना चाहते हैं तो अपनाएं ये तरीका

सोयाबीन कार के बारे में क्या पता है?

कार को प्रस्तुत करते हुए 1941 में न्यू यॉर्क टाइम्स को दिए साक्षात्कार में हेनरी फ़ोर्ड ने कहा था कि इस प्लास्टिक से बनी कार अमेरिका में स्टील के खपत को दस प्रतिश तक कम कर सकती है.

बेनसन रिसर्च सेंटर के मुताबिक इस खोज के बारे में बहुत कम जानकारी को ही संरक्षित किया गया है.

हालांकि अब भी बहुत से लोगों को इसके बारे में दिलचस्पी होती है, ख़ासकर अब जब पर्यावरण को इतना अधिक तरजीह दी जा रही है.

इस कारे के बारे में एक राज ये भी है कि ये किस चीज़ की बनी थी.

सेंटर के मुताबिक पैनल में क्या क्या पदार्थ थे इस बारे में सटीक जानकारी मौजूद नहीं है क्योंकि इसके फॉर्म्यूले को संरक्षित नहीं रखा गया है.

वीडियो कैप्शन, जब खड़ी हुई गाड़ी पल भर में ज़मीन में समा गई

इस कार के बारे में प्रकाशित न्यू यॉर्क टाइम्स के एक लेख के मुताबिक फ़ोर्ड के रसायन वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक तैयार करने में 70 फ़ीसदी सेल्यूलोज़ और 30 फ़ीसदी रेज़िन बाइंडर इस्तेमाल किया था.

आर्टिकल के मुताबिक सेल्यूलोज़ फ़ाइबर में 50 फ़ीसदी देवदार फ़ाइबर, 30 फ़ीसदी भूसा, दस फ़ीसदी भांग और दस फ़ीसदी रेमी (एक तरह का पौधा) था जिसका इस्तेमाल प्राचीन मिस्र के लोग ममी बनाने में करते थे.

हालांकि कार को बनाने वाली टीम के प्रभारी लोवेल ई ने इससे भिन्न जानकारी दी थी.

एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि ये प्लास्टिक सोया फ़ाइबर, फेनोलिक रेज़िन और फॉर्मलडिहाइड से बना था.

कार का ढांचा

इमेज स्रोत, THE HENRY FORD / FORD MOTOR COMPANY

इमेज कैप्शन, कार का ढांचा

बेहद हल्की

हालांकि सोयाबीन कार के डिज़ाइन और असेंबली को लेकर दस्तावेज़ी जानकारी मौजूद है.

फोर्ड ने ये काम ओवरले को सौंपा था जो सोयाबीन कार लैब में टूल एंड डाइ डिज़ाइन इंजीनियर थे.

ओवरले के सुपरवाइज़र और रसायनविद रॉबर्ट ए बोयर ने भी इस प्रोजेक्ट में मदद की थी.

इस कार का एक स्टील की ट्यूब से बना ढांचा था जिसमें प्लास्टिक के 14 पैनल लगे थे.

प्लास्टिक का एक फ़ायदा ये भी था कि स्टील के मुक़ाबले में ये अत्याधिक हल्की थी.

आज बायोप्लास्टिक से बनी ये कार सिर्फ़ इस तरह की तस्वीरों में ही मौजूद है

इमेज स्रोत, THE HENRY FORD / FORD MOTOR COMPANY

इमेज कैप्शन, आज बायोप्लास्टिक से बनी ये कार सिर्फ़ इस तरह की तस्वीरों में ही मौजूद है

सोयाबीन कार का वज़न सिर्फ़ 907 किलो था जो पारंपरिक कार से 450 किलो हल्की थी.

फोर्ड ने जब 13 अगस्त 1941 को अपनी खोज इस कार को पेश किया तो उन्होंने उसके इस गुण को भी रेखांकित किया था.

इस कार को मिशीगन के डियरबोर्न डेज़ सामुदायिक समारोह में पेश किया गया था और बाद में मिशीगन के मेले में भी प्रस्तुत किया गया था.

लेकिन पौधा आधारित प्लास्टिक को लेकर फ़ोर्ड के उत्साह के बावजूद इस प्रोजेक्ट का कोई नतीजा नहीं निकल सका.

ओवरले के मुताबिक इस कार का सिर्फ़ एक ही मॉडल बनाया गया था जिसे नष्ट कर दिया गया और दूसरी कार बनाने की योजना को बंद कर दिया गया.

वीडियो कैप्शन, कार के बोनट पर बैठी दुल्हन, केस हुआ दर्ज

इस प्रोजेक्ट के रुकने और उस दौरान अमेरिका में कारों के निर्माण पर लगी रोक की वजह दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका का शामिल होना था.

बेनसन फ़ोर्ड रिसर्च सेंटर के मुताबिक युद्ध के बाद प्लास्टिक से कार बनाने का विचार पीछे छूट गया क्योंकि सभी प्रयास युद्ध के बाद देश को संभालने और पुनर्विकास पर केंद्रित थे.

वहीं कुछ लोग मानते हैं कि बायोप्लास्टिक में दिलचस्पी कम होने की वजह आर्थिक थी क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध के बाद तेल आसानी से उपलब्ध था.

वजह जो भी रही हो लेकिन सोयाबीन कार का बनना और फिर योजना का रुक जाना आज ना सिर्फ़ पुराने दौर की याद बल्कि दिलचस्पी भी पैदा करता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)