कोरियाई युद्ध: उत्तर कोरिया में बंद हज़ारों युद्धबंदियों का दर्द

ली के भाई और पिता
    • Author, सुबिन किम
    • पदनाम, संवाददाता, बीबीसी कोरियाई सेवा

ली भले कितनी भी कोशिश करें, उन्हें याद नहीं आता कि जब तीन दशक पहले उनके पिता और भाई को मौत की सज़ा देने वालों ने तीन गोलियां मारी थीं, तब क्या हुआ था. ली उस समय तीस की उम्र के आसपास थीं.

उन्हें ये तो याद है कि उससे ठीक पहले क्या हुआ था. सुरक्षा गार्ड उन्हें उत्तर कोरिया के दूरस्थ गाँव आओजी में बने स्टेडियम में घसीट कर लाए थे. उन्हें एक लकड़ी के पुल के नीचे बैठने को मजबूर किया गया था. कुछ होने वाला था जिसका उन्हें इंतज़ार था. हालांकि उन्हें नहीं पता था कि क्या होने वाला है.

भीड़ बढ़ती जा रही थी और फिर एक ट्रक आकर रुका. दो लोगों को ट्रक से उतारकर लाया गया. वो ली के पिता और भाई थे.

उन्हें देशद्रोही, जासूस और विद्रोही बताकर खूंटों से बांध दिया गया था. ली ने हाल ही में बीबीसी को दिए साक्षात्कार में बताया था कि इस पल के बाद ही उनकी याददाश्त चली गई थी.

वो याद करते हुए कहती हैं कि मुझे लगता है मैं चिल्ला रही थी. मेरा जबड़ा अपनी जगह से हट गया था, एक पड़ोसी मुझे घर लेकर आई थी और मेरा जबड़ा ठीक किया था.

Korean War, on 29 December 1950

इमेज स्रोत, ICRC / HANDOUT

भुला दिए गए क़ैदी

ली के पिता उन पचास हज़ार युद्धबंदियों में शामिल थे जिन्हें युद्ध के बाद उत्तर कोरिया में ही रखा गया था. पूर्व सैनिकों को उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उत्तर कोरिया की सेना में शामिल किया गया था. उन्हें जीवन भर खनन और निर्माण प्रोजेक्टों पर काम करने के लिए मजबूर किया गया.

27 जुलाई 1953 को जब कोरिया युद्ध समाप्त होने के बाद शांति समझौता हुआ तो दक्षिण कोरिया के सैनिकों को उम्मीद थी कि वो जल्द ही युद्धबंदियों की अदला-बदली में अपने देश लौट जाएंगे.

लेकिन उत्तर कोरिया ने बंदी बनाए गए सैनिकों में से कुछ को ही वापस भेजा. जल्दी ही दक्षिण कोरिया भी बंदी बनाए गए अपनै सैनिकों को भूल गया. तब से अब तक दक्षिण कोरिया के तीन राष्ट्रपति उत्तर कोरिया के नेताओं से मिल चुके हैं लेकिन युद्धबंदियों की वापसी कभी भी एजेंडा में नहीं रही है.

उत्तर कोरिया में ली के परिवार को बुरे लोग मान लिया गया. ली के पिता का जन्म दक्षिण कोरिया में हुआ था और वो अमरीकी सैनिकों के साथ मिलकर उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ लड़ चुके थे. ये उन पर काले धब्बे जैसा था.

समाज में परिवार के इस निचले दर्जे के कारण ली के परिवार को छोटे-मोटे काम करने पड़े और उत्तर कोरिया में उनका भविष्य बहुत अच्छा नहीं था. ली के पिता और भाई कोयला खदान में काम करते थे जहां जानलेवा दुर्घटनाएं होना आम बात थी.

ली के पिता को उम्मीद थी एक दिन दोनों देश एक हो जाएंगे और वो वापस अपने जन्मस्थान लौट सकेंगे. काम से लौटने के बाद वो अपने बच्चों को अपनी जवानी के दिनों के क़िस्से सुनाया करते थे.

कई बार वो अपने बच्चों से भागकर दक्षिण कोरिया जाने के लिए भी कहा करते थे. वो कहा करते थे कि मेरे नाम का पदक होगा और तुम्हें किसी हीरो के बच्चों की तरह देखा जाएगा.

South Korean President Syngman Rhee

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एक दिन ली के भाई ने अपने दोस्तों के साथ शराब पीते हुए वो बातें दोहरा दीं जो उसके पिता घर में कहा करते थे. उसके एक दोस्त ने ये बात अधिकारियों को बता दी. कुछ महीनों के भीतर ही ली के पिता और भाई को मौत की सज़ा दे दी गई.

साल 2004 में ली किसी तरह भागकर दक्षिण कोरिया पहुंच गईं. ली को तब अपने पिता की ग़लती का अहसास हुआ. दक्षिण कोरिया उनके पिता को कोई हीरो नहीं मानता था. बूढ़े हो गए युद्धबंदियों को वापस लाने के लिए कोई ख़ास क़दम नहीं उठाए गए थे.

उत्तर कोरिया में बंदी बनाए गए सैनिकों ने बहुत कुछ सहा. उन्हें देश के दुशमन के तौर पर देखा गया, वो लोग जो कठपुतली सेना की ओर से लड़े थे. उत्तर कोरिया की सेना और समाज में उन्हें सबसे निचला दर्जा दिया गया. उत्तर कोरिया की जाति व्यवस्था सोंगबन में भी उन्हें सबसे नीचे माना गया.

ये सामाजिक दर्जा पारिवारिक था. ऐसे में इन सैनिकों के बच्चों को भी उच्च शिक्षा से वंचित रखा गया. न ही उन्हें अपना पेशा चुनने की आज़ादी दी गई.

चोई एक शानदार छात्रा थी लेकिन अपने पिता के दर्जे की वजह से वो यूनिवर्सिटी नहीं जा सकती थीं. एक बार चोई ने अपना आपा खो दिया और अपने पिता पर चिल्लाते हुए कहा 'तुम विद्रोही गंदगी हो, तुम अपने देश वापस क्यों नहीं जाते हो'

चोई

उसके पिता उस चिल्लाए नहीं, बस अफ़सोस के साथ कहा कि उनका देश बहुत कमज़ोर है और वह उन्हें वापस नहीं बुलाएगा. आठ साल पहले चोई ने अपने परिवार को छोड़ दिया और भागकर दक्षिण कोरिया आ गईं.

वो कहती हैं, "मेरे पिता यहां आना चाहते थे. मैं उस जगह आना चाहती थी जहां दुनिया में मुझे सबसे ज़्यादा प्यार करने वाला इंसान आना चाहता था लेकिन आ नहीं पाया. इसलिए ही मैंने अपने पति, बच्चों को छोड़ दिया और यहां आ गई."

चोई के पिता का अब देहांत हो चुका है. और दक्षिण कोरिया के दस्तावेज़ों में उनके पिता के नाम की जगह खाली है. क्योंकि अधिकारिक दस्तावेज़ के मुताबिक़ उनके पिता युद्ध में लड़ते हुए ही मर गए थे.

सोन

अपने पिता की अस्थियों को वापस लाना

सोन म्योंग ह्वा को अपने पिता के अंतिम शब्द स्पष्ट रूप से याद हैं. चालीस साल पहले उनके पिता बिस्तर पर अंतिम सांसें गिन रहे थे. उन्होंने कहा था, अगर तुम कभी दक्षिण कोरिया वापस लौट पाओ तो अपने साथ मेरी अस्थियां भी ले जाना और मुझे वहीं दफ़न करना जहां मैं पैदा हुआ था.

सोन के पिता एक दक्षिण कोरियाई सैनिक थे जिनका जन्म बुसान से क़रीब 18 किलोमीटर दूर गिमहाए नाम के एक गांव में हुआ था. उत्तर कोरिया में उन्हें दशकों तक कोयला खदानों और लकड़ी कारखानों में काम करने के लिए मजबूर किया गया. मौत से सिर्फ़ दस दिन पहले ही उन्हें घर जाने की अनुमति दी गई थी.

उन्होंने अपनी बेटी सोन से कहा, "अपने परिजनों को एक बार देखे बिना ही यहा मर जाना बेहद दुखदायी है, अच्छा होगा अगर में वहां उनके पास दफ़न हो जाउं?"

सोन साल 2005 में भागकर दक्षिण कोरिया आ गईं. लेकिन उन्हें पिता की अस्थियों को उत्तर कोरिया से दक्षिण कोरिया लाने में आठ और साल लग गए. उन्होंने अपने रिश्तेदारों से अपने पिता की अस्थियों को क़ब्र से निकालकर चीन में एक दलाल के पास लाने के लिए कहा. इसके लिए तीन सूटकेस की ज़रूरत थी. सोन के दो दोस्त भी साथ सूटकेस लेकर आए. लेकिन वो सोन ही थीं जो अपने पिता के मुंड को लेकर आईं.

Son Myeong-hwa

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सोन को अपने पिता को युद्धबंदी का दर्जा दिलाने के लिए एक साल से अधिक तक प्रदर्शन करना पड़ा. और अंततः वो अपने पिता की अस्थियों को साल 2015 में नेशनल सीमेट्री में दफ़ना पाईं.

'मुझे लगता है कि अंततः मैंने एक बेटी होने का फ़र्ज़ निभा दिया है. लेकिन जब मुझे अपने पिता का वहां अंतिम सांस लेना याद आता है तो मेरा दिल टूट जाता है.'

सोन को बाद में पता चला कि उनके पिता के अंतिम संस्कार के लिए उत्तर कोरिया में उनके परिवार ने भारी क़ीमत चुकाई है. उनके रिश्तेदारों को राजनीतिक बंदी बनाकर जेल भेज दिया गया.

सोन अब कोरियन वॉर प्रिसनर ऑफ़ वॉक फैमिली एसोसिएशन चलाती हैं. ये समूह दक्षिण कोरिया के उन 110 परिवारों को बेहतर सुविधाएं देने की मांग कर रहा है जो कभी लौट कर नहीं आए.

डीएनए टेस्ट के ज़रिए सोन ये साबित कर पाईं कि वो अपने पिता की ही बेटी हैं. दक्षिण कोरिया से अपने पिता का वेतन हासिल करने के लिए ये ज़रूरी था. यदि युद्धबंदी उत्तर कोरिया से भागकर दक्षिण कोरिया आ भी जाते हैं तो उनके परिजनों को अधिकारिक पहचान नहीं मिलीत है और ऐसे बहुत से युद्धबंदी जो वापस नहीं आए, उन्हें मृत या युद्ध के दौरान सेना से अलग हुआ मान लिया गया था. या फिर लापता मान लिया गया था.

भागकर दक्षिण कोरिया आए गिने-चुने युद्धबंदियों को ही वेतन का भुगतान मिल सका. जो सैनिक उत्तर कोरिया की हिरासत में ही मर गए थे उन्हें कोई मुआवज़ा नहीं मिला.

South Korean President Moon Jae

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जनवरी में सोन और उनके वकील ने संवैधानिक अदालत में एक मुक़दमा दायर किया. उन्होंने तर्क दिया कि उत्तर कोरिया में रह गए सैनिकों के साथ सही व्यवहार नहीं किया गया और सरकार ने इन सैनिकों को वापस लाने के लिए कोई काम नहीं किया और इसलिए जो सैनिक लौट कर नहीं आ पाए उनके लिए सरकार ही ज़िम्मेदार है.

'सोन कहती हैं, हमारी ज़िंदगी का ये बहुत बड़ा दुख था कि हम युद्धबंदियों के घर में पैदा हुए और उससे भी दुखदायी ये है कि यहां दक्षिण कोरिया लौटने के बाद भी हमें नज़रअंदाज़ ही किया जा रहा है.

अगर हमने अपने पिता के सम्मान को वापस नहीं पाया तो उत्तर कोरिया में युद्धबंदियों और उनके परिवारों की ज़िल्लत भरी ज़िंदगी को भुला ही दिया जाएगा.'

इस कहानी में कुछ नाम बदल दिए गए हैं. सभी चित्र डेविस सूर्या ने बनाए हैं.

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