सावित्री देवी: वह हिंदू महिला जो हिटलर की दीवानी थी

    • Author, मारिया मार्गारोनिस
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

ग्रीस की 'गोल्डन डॉन पार्टी' की वेबसाइट पर एक हिंदू महिला की तस्वीर दिखना अपने आप में हैरानी भरी बात है. उससे भी ज़्यादा हैरानी तब होती है जब उस तस्वीर में दिख रही नीली साड़ी पहनी वह महिला जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर की प्रतिमा को निहार रही हो.

गोल्डन डॉन ग्रीस की एक नस्लवादी समर्थक पार्टी है जो ग्रीस से विदेशियों को बाहर निकालने के लिए प्रतिबद्ध रहती है. इस पार्टी की वेबसाइट में एक हिंदू महिला की तस्वीर आखिर क्यों है, और उसका हिटलर से क्या संबंध है? ये सवाल सहसा ही दिमाग में कौंधने लगने लगते हैं.

दिमाग पर थोड़ा सा ज़ोर डालने पर सहज ही इस महिला का नाम ध्यान में आ जाता है. 'सावित्री देवी', जिन्होंने अपनी किताब 'द लाइटनिंग एंड द सन' में जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर को भगवान विष्णु का अवतार बताया था. इसी किताब के ज़रिए उन्होंने यह विश्वास दिलाया था कि राष्ट्रवादी समाजवाद का दोबारा उदय होगा.

कौन थी सावित्री देवी?

अमरीका और यूरोप में धीरे-धीरे दक्षिणपंथी ताकतें ज़ोर पकड़ रही हैं, ऐसे में सावित्री देवी का नाम भी चर्चाओं में आने लगा है. अमरीका के दक्षिणपंथी नेता रिचर्ड स्पेंसर और स्टीव बैनन ने सावित्री देवी के काम को दोबारा उजागर करना शुरू किया है.

अगर सावित्री देवी के नाम और पहनावे को छोड़ दें तो वे पूरी तरह से एक यूरोपीय महिला थीं. उनका जन्म 1905 में फ्रांस के लियोन शहर में हुआ था. सावित्री की मां ब्रिटिश थीं जबकि पिता ग्रीक-इतालवी.

सावित्री देवी ने शुरुआत से ही समतावादी विचारों को तुच्छ बताया. 1978 में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "एक बदसूरत लड़की कभी भी खूबसूरत लड़की के बराबर नहीं हो सकती."

वे 1923 में प्रथम विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद एथेंस पहुचीं थीं. ग्रीस के अपमान के लिए वे पश्चिमी गठजोड़ को दोषी ठहराती थी और उनका मानना था कि ग्रीस और जर्मनी पीड़ित राष्ट्र हैं.

भारत पहुंची सावित्री

यहूदियों के ख़िलाफ़ हिटलर की क्रूर कार्रवाई को सावित्री 'आर्य वंश' को बचाने वाला कदम बताती थी. उन्होंने हिटलर को अपना 'फ्यूहरर' बना लिया था. फ्यूहरर एक जर्मन शब्द है जिसका मतलब होता है नेता या गाइड. राजनीतिक परिदृश्य में इस शब्द का प्रयोग हिटलर के लिए किया जाता है.

1930 की शुरुआत में सावित्री देवी यूरोप के बुतपरस्त इतिहास की तलाश में भारत आईं. उन्हें लगता था कि भारत में जातिप्रथा की वजह से अंतरजातीय विवाह नहीं होते हैं और इस वजह से यहां 'शुद्ध आर्य' सुरक्षित रूप से मिल सकेंगे.

सावित्री पर अंग्रेज अधिकारियों की नज़र भी थी इसलिए वे भारत में ट्रेन के चौथी श्रेणी के डिब्बों में यात्रा करती थीं. हालांकि उनका अंग्रेजों से कोई ज़्यादा लेना-देना नहीं था. सावित्री ने भारतीय भाषाएं सीखी. यहां उन्होंने एक ब्राह्मण पुरुष से शादी की, जिसे वह अपनी ही तरह एक आर्य मानती थीं.

उन्होंने हिंदू मिथक और फ़ासिज्म को विस्तृत रूप से मिलाया. उन्होंने बताया कि हिटलर समय की चाल के विरुद्ध चलने वाला व्यक्ति है जो एक दिन कलयुग का अंत कर आर्यों के प्रभुत्व वाले स्वर्णिम युग की शुरुआत करेगा.

नाज़ी का पतन

इसी दौरान सावित्री ने कोलकाता में हिंदू राष्ट्रवाद के प्रचार के लिए भी काम किया. अंग्रेजी ने जब भारत में धार्मिक बंधुता बिगाड़ने की कोशिश की तो इससे हिंदुत्व अभियान को भी बल मिला. इस अभियान में कहा जाता था कि हिंदू ही आर्यों के असली वारिस हैं और भारत एक हिंदू राष्ट्र है.

सावित्री ने इस आंदोलन के संचालक स्वामी सत्यानंद के साथ काम किया. स्वामी सत्यानंद ने सावित्री को यह अनुमति दी कि वे हिंदू आंदोलन के साथ फासीवाद की बातें भी शामिल कर सकती हैं. सावित्री ने देश के कई हिस्सों का दौरा किया, वे बंगाली और हिंदी में लोगों से बात किया करती और उन्हें आर्यों के महत्व के बारे में बतातीं.

साल 1945 में जर्मनी में नाज़ियों के पतन के साथ ही सावित्री देवी यूरोप चली गईं. उनके इंग्लैंड पहुंचने की बात उनकी किताब लॉन्ग-व्हिस्कर एंड द टू लेग्ड गॉडेस में बताई गई है. इस किताब में बच्चों की एक कहानी की नायिका बिल्लियों से प्यार करने वाली नाज़ी महिला है.

इस कहानी में सावित्री लिखती हैं कि 'हीलियोडोरा' नाम की नायिका को जानवरों से बहुत प्रेम होता है, वह जानवरों के प्रति लोगों के व्यवहार से बहुत हैरान होती हैं.

हिटलर की जय के नारे

हिटलर की ही तरह सावित्री भी हमेशा शाकाहारी रहीं. वह संसार को अपनी ही नज़रों से देखती थीं और प्रकृति के करीब जाकर उसे महसूस करना पसंद करती थीं.

उन्होंने आइसलैंड में हेकला पहाड़ी के करीब उस वक्त दो रातें गुजारी जब वहां ज्वालामुखी फटने को तैयार था. उस अनुभव के बारे में सावित्री ने लिखा, "सृजन की मूल आवाज़ 'ओम' है, ज्वालामुखी से हर दो या तीन सेकंड में ओम! ओम! ओम! की ध्वनि निकल रही थी और पैरों के नीचे की ज़मीन हिल रही थी."

1948 में सावित्री जर्मनी पहुंचने में कामयाब रहीं. वहां उन्होंने नाज़ी समर्थन वाले कई पर्चे बांटें और नारे लगाए कि "एक दिन हम दोबारा उठ खड़े होंगे और जीत जाएंगे, उम्मीद और इंतजार करिए, हिटलर की जय!"

कई सालों बाद सावित्री ने बताया कि ब्रिटिश अधिकारियों ने जब उन्हें जेल में बंद किया तो उन्हें खुशी हुई थी, क्योंकि इससे वे अपने नाज़ी कॉमरेड (साथियों) के करीब पहुंचने में कामयाब हो गई थीं. बाद में सावित्री के पति ने भारत सरकार की मदद से उनकी सजा कम करवाई.

दोबारा भारत लौटीं

सावित्री की शादी और पति के साथ उनके संबंधों पर भी संशय बना रहा. असित मुखर्जी के साथ उनकी शादी को कई लोग सही बात नहीं मानते क्योंकि ये दोनों एक जाति से नहीं आते.

अपने जीवन के अंतिम कुछ सालों में सावित्री भारत लौट आईं. वे भारत को ही अपना घर मानती थीं. वे दिल्ली में एक फ्लैट में रहने लगीं. यहां वे आस-पास की बिल्लियों को खाना खिलातीं, वे अक्सर हिंदू शादीशुदा महिला की तरह सोने के गहने पहना करती थीं.

साल 1982 में उनकी मौत इंग्लैंड में उनकी दोस्त के घर पर हुई. उनकी अस्थियों को पूरे फासीवादी सम्मान के साथ अमरीकी नाजी नेता जोर्ज लिंकन रौकवेल की कब्र के बगल में समाहित किया गया.

भारत में आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, इस पार्टी की मूल विचारधारा भी हिंदुत्ववादी ही मानी जाती है.

आज सावित्री देवी को शायद ही कोई जानने वाला मिले, लेकिन उन्होंने भारत में हिंदू राष्ट्रवाद के प्रचार में एक अहम भूमिका अदा की.

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