दुनिया की पहली मिसाइल फ़ैक्ट्री बनने वाला गांव

    • Author, माधवी रमानी
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

आज दुनिया मिसाइलों और रॉकेटों के ज़रिए जंग लड़ती है. हर देश तरह-तरह की मिसाइलें अपने हथियारों के ज़खीरे में रखता है ताकि दुश्मन को दूर से ही नेस्तनाबूद किया जा सके. भारत के पास भी, पास और दूर तक मार करने वाली कई तरह की मिसाइलें हैं.

इनमें से कुछ मिसाइलों को अंतरिक्ष में सैटेलाइट लॉन्च करने वाले रॉकेट में तब्दील कर लिया गया है. पर, क्या आपको पता है कि मिसाइल बनाने का काम किस देश ने सबसे पहले शुरू किया था? आप इस सवाल का जवाब सुनेंगे तो हैरान रह जाएंगे. जर्मनी वो पहला देश था जिसने युद्ध में मिसाइलों का इस्तेमाल करने की सोची थी.

ये बात और है कि आज रूस और अमरीका इस रेस में बहुत आगे निकल गए हैं. मगर मिसाइलों की इस होड़ की शुरुआत जर्मनी ने ही की थी. बाद में वहीं के वैज्ञानिकों ने रूस और अमरीका में मिसाइलों के निर्माण में अहम रोल निभाया. ये बात और है कि जर्मनी ख़ुद कभी मिसाइलों का इस्तेमाल नहीं कर सका.

नाज़ी सरकार

ये बात दूसरे विश्व युद्ध के दौरान की है. जर्मनी का एक गांव मिसाइल फैक्ट्री के तौर पर विकसित किया गया था. इस गांव का नाम है, पेनमुंडे. ये गांव जर्मनी के यूसडम द्वीप में पेन नदी के मुहाने पर स्थित है. पेन नदी, यहां पर आकर बाल्टिक सागर में गिरती है.

यूसडम द्वीप यूं तो अपने शानदार बीच और मछली से बने सैंडविच के लिए मशहूर है. ऐतिहासिक काल में भी यहां के द्वीप प्रशिया की राजशाही के बीच बेहद लोकप्रिय थे. बाद में पूर्वी जर्मनी के लोग भी यहां छुट्टियां बिताने आया करते थे.

मगर 1936 से 1945 के बीच इस द्वीप के पेनमुंडे गांव को नाज़ी सरकार ने अपने बेहद ख़ुफ़िया मिशन का अड्डा बनाया था. 1935 में जर्मन इंजीनियर वर्नहर वॉन ब्रॉन ने पेनमुंडे गांव को अपने मिसाइल के कारखाने के लिए चुना था. इसके आसपास का चार सौ किलोमीटर का इलाक़ा सुनसान था.

रॉकेट टेक्नोलॉजी

ब्रॉन ने सोचा कि ये जगह उनके रॉकेट के परीक्षण के लिए बिल्कुल सही रहेगी. सरकार से इजाज़त मिलने के बाद यहां मिसाइल का कारखाना और टेस्टिंग रेंज स्थापित करने का काम बड़ी तेज़ी से हुआ. क़रीब 12 हज़ार लोगों ने यहां दिन-रात काम करके दुनिया की पहली क्रूज़ मिसाइल बनाने की फ़ैक्ट्री और टेस्टिंग रेंज को तैयार किया.

ये फ़ैक्ट्री क़रीब 25 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली थी. पेनमुंडे में होने वाला रिसर्च और मिसाइल टेस्ट, दुनिया के सबसे बड़े युद्ध के लिए ही अहम नहीं थे, बल्कि आने वाले वक़्त के लिए भी बेहद अहम साबित हुए. इस गांव में ही रॉकेट तकनीक की बुनियाद रखी गई जिसकी मदद से आगे चलकर इंसान ने अंतरिक्ष का सफ़र शुरू किया.

आज पेनमुंडे गांव एक उजाड़ जगह है. इमारत के नाम पर लाल रंग का एक पॉवर स्टेशन बचा है जिसमें पेनमुंडे हिस्टोरिकल टेक्निकल म्यूज़ियम स्थापित किया गया है. पूरे इलाक़े में रॉकेट के टुकड़े, पतवार, इंजन और दूसरे यंत्र बिखरे हुए हैं. इन्हें देखकर ख़ौफ़ का एहसास होता है.

दूसरा विश्व युद्ध

इस जगह की अहमियत एक भाषण के दस्तावेज़ से साबित होती है. ये भाषण वाल्टर डॉर्नबर्गर ने 1942 में लिखा था जिसमें वॉल्टर ने जर्मनी के रॉकेटर एग्रीगेट 4 (A-4) के कामयाब परीक्षण का ज़िक्र किया था. ये दुनिया का पहला लंबी दूरी तक मार करने वाला रॉकेट था. इसका दूसरा नाम 'वेंजियंस वेपन' या बदला लेने वाला हथियार था.

ये किसी भी इंजीनियर का ख़्वाब हो सकता था. एक ऐसी मशीन को विकसित न करना, जो कि अपने वक़्त के लिहाज़ से बेहद क्रांतिकारी थी. जिस देश के पास भी ये तकनीक होती, वो देश सामिरक और आर्थिक रूप से बेहद ताक़तवर हो जाता. इसकी मदद से वो राजनैतिक रूप से भी बहुत ताक़त इकट्ठी कर सकता था.

इस रॉकेट के परीक्षण के बाद वॉल्टर डॉर्नबर्गर और वर्नहर वॉन ब्रॉन जैसे वैज्ञानिक ये मानते थे कि इसकी मदद से वो दूसरा विश्व युद्ध आसानी से जीत जाते. जर्मनी में नए हथियारों के विकास के लिए ज़िम्मेदार अल्बर्ट स्पीर भी इससे सहमत थे. मगर जर्मनी के तानाशाह हिटलर को इस पर यक़ीन नहीं था.

यहूदी युद्धबंदी

इसलिए, जर्मनी की सरकार ने रॉकेट के सफल परीक्षण को ज़्यादा भाव नहीं दिया. जब हिटलर ने 1939 में युद्ध का एलान किया तो, पेनमुंडे का कारखाना उस वक़्त पूरी तरह से तैयार नहीं था. इसके बाद जर्मन सरकार युद्ध में फंस गई और उसने पेनमुंडे में मिसाइलों के विकास पर न तो पैसा ख़र्च किया और न ही उसे अहमियत दी.

1943 मे तमाम कोशिशों के बाद डॉर्नबर्गर और वॉन ब्रॉन ने A-4 रॉकेट के कामयाब परीक्षण की एक फ़िल्म हिटलर को दिखाई. तब जाकर हिटलर ने इस मिसाइल के निर्माण को हरी झंडी दी. लेकिन, तब तक युद्ध के मोर्चे पर बहुत देर हो चुकी थी. जर्मन फ़ौजें कई मोर्चों पर हार रही थीं.

जून, 1943 में यहूदी युद्धबंदियों को इस कारखाने में काम पर लगाया गया. ये युद्धबंदी यूरोप के अलग-अलग देशों से लाए गए थे. इसी दौरान ब्रिटिश ख़ुफिया एजेंसियों को भी पेनमुंडे के इस ख़ुफ़िया रॉकेट कारखाने की भनक लग गई. फिर 17 अगस्त 1943 को ब्रिटिश रॉयल एयरफ़ोर्स से उस वक़्त का सबसे बड़ा हवाई हमला पेनमुंडे पर किया.

हिटलर की सेना

इसे ब्रिटेन ने ऑपरेशन हाइड्रा नाम दिया था, हालांकि ये हमला नाकाम रहा. लेकिन इससे हिटलर की सेना का मिसाइल निर्माण का अभियान धीमा पड़ गया. कारखाने को पेनमुंडे से हटाकर मध्य जर्मनी के मिटेलवर्क ले जाया गया. 1944 में हिटलर को वॉन ब्रॉन और वॉल्टर के काम को कम करके आंकने की ग़लती का एहसास हुआ.

हिटलर ने फील्ड मार्शल वॉन ब्रॉकित्स से माफ़ी मांगी. उसने वाल्टर डोर्नबर्गर से भी माफ़ी मांगी और कहा कि वो उनकी रिसर्च की अहमियत नहीं समझ सका था. दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी हार गया, लेकिन इसके बाद भी रॉकेट और मिसाइल तकनीक के विस्तार का काम रुका नहीं.

युद्ध के बाद अमरीका, रूस और ब्रिटेन की अगुवाई वाले मित्र देशों ने A-4/V-2 मिसाइल की तकनीक हासिल करने की कोशिश की. इस काम में जर्मन वैज्ञानिकों की मदद ली गई. नाजी जर्मनी में जो लोग इस तकनीक को विकसित करने पर काम कर रहे थे, उन्हें सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका में शरण दी गई.

इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलें

इनमें से वॉन ब्रॉन को अमरीका ने नागरिकता दी. ब्रॉन बाद में नासा के लिए काम करने लगे थे. उन्होंने अमरीका के मशहूर अपोलो मिशन के लिए काम किया. अपोलो मिशन से ही अमरीकी अंतरिक्ष यात्रियों ने चांद तक का सफ़र तय किया. पेनमुंडे में हुए रिसर्च की बुनियाद पर आगे चलकर इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलें विकसित की गईं.

इन्हीं की मदद से अंतरिक्ष में सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए रॉकेट बनाए गए. शीत युद्ध के दौरान इस तकनीक को बेहतर बनाने पर काफ़ी काम हुआ. पेनमुंडे की सबसे बड़ी विरासत हमें ये समझाती है कि तकनीक, इंसान की ज़िंदगी पर कितना गहरा असर डालती है.

समाज में इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के रोल की अहमियत भी जर्मनी का ये गांव हमें समझाता है. पेनमुंडे में स्थित म्यूज़ियम की देखभाल करने वाले डॉक्टर फ़िलिप औमान कहते हैं कि नई तकनीक का विकास हमारे वैज्ञानिकों की विरासत और कामयाबी की कहानियां कहता है.

यूरोप की तबाही

पेनमुंडे आज हमें इस बात का एहसास कराता है कि सही इस्तेमाल से तकनीक हमें चांद तक पहुंचा सकती है. तो ग़लत इस्तेमाल से इंसानियत तबाह भी हो सकती है. पेनमुंडे को कलाकारों ने भी काफ़ी अहमियत दी है.

कैटालोनिया के पेंटर ग्रेगोरियो इग्लेसियास मेयो और मेक्सिकन कलाकार मिगुएल अरागोन ने इस म्यूज़ियम पर आधारित कई कलाकृतियां बनाई हैं. पेनमुंडे को इन कलाकारों ने इंसानियत के तमाम एहसासों का प्रतीक बताया है. ये ज़ुल्म का भी प्रतीक है जहां यहूदी युद्धबंदियों का शोषण किया गया.

वहीं इंसान की अक़्लमंदी की भी ये मिसाल है जिसने इतनी शानदार तकनीक विकसित की. पेनमुंडे जो कभी यूरोप की तबाही का केंद्र बनने की तरफ़ बढ़ रहा था, आज दुनिया भर के संगीतकारों की मेज़बानी करता है. 2002 में यहां पर एक बड़ा संगीत समारोह हुआ था. 2002 में इस म्यूज़ियम को शांति की कोशिशों के लिए अवॉर्ड मिला था.

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