खुशी का मंत्रालय बनाने से मिल जाएगी खुशी?

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इंसान की खुशी का ताल्लुक़ किस बात से है? किसी को महंगी चीज़ों से खुशी मिलती है, किसी को घूम फिर कर, तो किसी को दूसरों की मदद कर खुशी मिलती है. मतलब ये कि हर एक की खुशी का पैमाना अलग है.
एक बात तय है कि खुशी का ताल्लुक़ दिल से है. अब अगर कोई ये कहे कि बिजली-पानी-राशन की तरह सरकार आपको खुशी भी देगी तो क्या आप यक़ीन करेंगे? लेकिन एक देश ऐसा है जो अपने लोगों को ख़ुशी बांटने की जुगत भिड़ा रहा है.
इसी साल फरवरी महीने में संयुक्त अरब अमीरात में एक हैप्पीनेस मिनिस्ट्री बनाई गई है. अपने बाशिंदों को ख़ुश रखने के लिए UAE की सरकार ने बाक़ायदा एक मंत्री बहाल किया है. जिनकी ज़िम्मेदारी देश और जनता को खुशहाल रखने की है.
इस बात का एलान करते हुए अमीरात के प्रधानमंत्री शेख मुहम्मद बिन रशीद अल मकदूम ने कहा कि वो अपने नागरिकों के ख़ुशी को सबसे ज़्यादा तवज्जो देना चाहते हैं.

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हालांकि कुछ लोग संयुक्त अरब अमीरात के इस तरह के तजुर्बों को सही नहीं मानते. उनका कहना है इसमें शक नहीं कि दूसरे खाड़ी देशों के मुक़ाबले संयुक्त अरब अमीरात में ज़्यादा आज़ादी और खुलापन है. लेकिन यहां लोगों को कई तरह के हक़ से महरूम रखा गया है. ख़ास तौर से सियासत और सरकार के मसलों पर.
आलोचकों का कहना है इस तरह के तजुर्बे करने के बजाए अमीरात की सरकार को मानव अधिकारों और क़ानून के नियम क़ायदों के सुधार पर ध्यान देना चाहिए.
संयुक्त राष्ट्र संघ की 'वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2016' की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक़ ख़ुशी के मामले में संयुक्त अरब अमीरात का नंबर 156 मुल्कों में से 28 वां है. लेकिन 2021 तक संयुक्त अरब अमीरात इस फेहरिस्त में टॉप फाइव में शामिल होना चाहता है.
डेनमार्क हैप्पीनेस रिसर्च इनस्टिट्यूट के सीईओ मीक वाइकिंग का कहना है लोगों की खुशी में सरकारें एक अहम रोल निभा सकती हैं. सरकारी नीतियों का मक़सद लोगों का रहन-सहन बेहर करना होना चाहिए.

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वाइकिंग कहते हैं आज सारी दुनिया में, ख़ास तौर से एशियाई देशों की सरकारें इस बात पर काफ़ी ज़ोर दे रही हैं. मिसाल के तौर पर साउथ कोरिया एक ही पीढ़ी में दुनिया के ग़रीब देशों के फ़ेहरिस्त से निकल कर अमीर देशों की लिस्ट में शामिल हो गया. लेकिन किसी भी तरक़्की याफ़्ता मुल्क़ के मुक़ाबले यहां की नौजवान पीढ़ी उतनी खुश नहीं है.
जहां तक बात है संयुक्त अरब अमीरात की तो यहां की सरकार इस दिशा में काफ़ी काम कर रही है. मंत्री की नियुक्ति के साथ ही अलग अलग विभागों में अफ़सर बहाल किए गए हैं. इन लोगों को पश्चिमी देशों में जाकर ख़ुशहाली के मसले पर अपनी जानकारी बढ़ाने को कहा गया है.
दुबई पुलिस ने भी अपने कम्यूनिटी सर्विस डिपार्टमेंट का नाम बदलकर "जनरल डिपार्टमेंट फॉर कम्यूनिटी हैप्पीनेस" रख दिया है. लेकिन, लोगों को नहीं लगता कि संयुक्त अरब अमीरात के हालात सिर्फ़ ख़ुशी मंत्रालय खोलने से बदलेंगे.
दुबई में रहने वाली सोनिया एडवर्ड मूल रूप से मुंबई से ताल्लुक रखती हैं. उन्होंने काफ़ी वक़्त दुबई में गुज़ारा है. उनका कहना है, "दुबई सरकार के इस तरह के तजुर्बे एक तरह की पब्लिक रिलेशंस की नौटंकी है. दुबई में बाहर से आकर काम करने वालों के साथ बहुत सी परेशानियां हैं. यहां घरों के किराये और बच्चों की स्कूल फीस बहुत ज़्यादा है. आमदनी से ज़्यादा ख़र्चे हैं".

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सोनिया कहती हैं कि अगर यहां की सरकार को लोगों की ख़ुशी की इतनी फ़िक्र है तो उसे पहले इन मसलों को हल करना होगा. किसी को खुशी देना सरकार की ही ज़िम्मदारी नहीं है. बल्कि इंसान को खुद ही अपनी खुशी तलाश करनी होगी. जब मुश्किलें कम होंगी, लोग खुद ब ख़ुद ख़ुशी महसूस करने लगेंगे.
अबू धाबी की ज़ायद यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर जस्टिन थॉमस का कहना है कि दुबई सरकार का हैप्पीनेस मिनिस्टर बहाल करना कुछ हद तक एक नौटंकी हो सकता है. लेकिन ये दुबई की सरकार भी जानती है कि वो लोगों को खुश रहने का आदेश नहीं दे सकती.
वहीं अमरीकी अर्थशास्त्री कैरोल ग्राहम सरकार की इस पॉलिसी को जीडीपी में सुधार के नज़रिये से भी देखती हैं. वो यूएई सरकार के इस क़दम का समर्थन करती हैं. हालांकि उन्हें सरकार की नीयत पर थोड़ा शक भी है.
कैरोल कहती हैं कि खुशी को किसी दायरे में समेटना मुमकिन नहीं. अगर कोई सरकार हैप्पीनेस को पैमाना बनाकर अपनी कामयाबी आंकने की कोशिश करे, तो ये एक बहुत ग़लत फैसला साबित हो सकता है.

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प्रोफेसर थॉमस मानते हैं कि अगर सरकार लोगों को बेहतर माहौल देगी, तो उनकी ज़िंदगी का तनाव कम होगा, इससे वो दिल लगाकर काम कर सकेंगे और इसका सीधा असर किसी देश की तरक़्क़ी पर पड़ेगा.
ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस के मुताबिक़, मेंटल हेल्थ ब्रिटेन की सबसे बड़ी परेशानी है. इसपर सालाना 70 अरब से 100 अरब पाउंड तक का नुक़सान उठाना पड़ता है. प्रोफ़ेसक थॉमस कहते हैं ऐसे में अगर यूएई की सरकार को लोगों की ख़ुशी की फ़िक्र है तो ये अच्छी बात है.
अगर हैप्पीनेस पॉलिसी को इन्वेस्टमेंट में बदला जा सकता है, तो क्या इसे ज़मीनी स्तर पर मापा भी जा सकता है?
ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी के लेक्चरर जॉर्ज मैक्केरॉन ने इसके लिए एक ऐप बनाया है. जिसके ज़रिए उन्होंने क़रीब 65 हज़ार लोगों के खुश रहने के तजुर्बों के आंकड़े जमा किये.
इन आंकडों के ज़रिए उन्होंने ये जानने की कोशिश की लोग खुश क्यों हैं? वो कोई काम करके खुश हुए हैं या वो खुश थे इसलिए उन्होंने कोई काम किया? जॉर्ज मानते हैं कि ऐसे ही सर्वे के नतीजों की बुनियाद पर सरकार को नीतियां बनानी चाहिए.
केन्या के रहने वाले सोलोमन मवांगी अभी हाल ही में काम के सिलसिले में दुबई में आकर बसे हैं. वो इस वक़्त दुबई के एक शानदार अपनार्टमेंट में वॉचमैन हैं. सोलोमन शहर के बाहरी इलाक़े में एक कैम्प में पांच लोगों के साथ एक कमरे में रहते हैं.

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सोलोमोन कहते हैं कि इस कैंप में ज़िंदगी जीना आसान नहीं है, ना ही वो अपने काम से खुश हैं. सुबह 6 बजे से लेकर शाम 6 बजे तक चौकीदारी करते हैं, लेकिन एक बात का सुकून है कि यहां के लोग अच्छे हैं .
सोलोमोन यूएई की सरकार के ख़ुशहाली फैलाने के अभिान के बारे में नहीं जानते. तमाम तरह की परेशानियां झेलने के बावजूद वो ख़ुश हैं, क्योंकि यहां उन्हें रोज़गार मिला है. वो महीने के आखिर में कुछ कमाई करेके अपने परिवार को भेज पाते हैं. इससे उनका परिवार भी खुश रहता है.
नतीजा ये निकलकर सामने आता है कि खुश रहने के लिए सबसे पहले पेट का भरा होना ज़रूरी है और पेट भरने के लिए रोज़गार. उसके बाद लोगों को ज़िंदगी की दूसरी चिंता और परेशानियों से आज़ादी चाहिए. अगर कोई सरकार रोज़गार, तालीम, सेहत और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं दे, तो लोगों की खुशी के लिए किसी मंत्री को बहाल करने की ज़रूरत नहीं होगी.
भारत में भी इसी साल मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने भी ख़ुशी का एक मंत्रालय बनाया था. जिसमें मंत्रियों और अफ़सरों की बहाली की गई थी. इनकी ज़िम्मेदारी, मध्य प्रदेश के लोगों को ख़ुश करने की है. क़रीब पांच महीने बीत जाने के बाद भी वहां के लोगों को ये मंत्रालय पहले से ज़्यादा ख़ुशी नहीं महसूस करा पाया है. हां, शिवराज चौहान सरकार ने ये मंत्रालय खोलकर अपनी पीठ ज़रूर थपथपा ली है.
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