उम्मीद जगाती सोलर इम्पल्स की वो तस्वीर

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- Author, केली ग्रोविएर
- पदनाम, बीबीसी कल्चर
हम सबको मुक्ति चाहिए. किसी को ग़रीबी से, किसी को महंगाई से, किसी को बेरोज़गारी से.
सबकी अलग-अलग फ़िक्र है. सबको अलग-अलग चीज़ों की ज़रूरत है.
ऐसे में जब दुनिया को उम्मीद की नई किरण की ज़रूरत होती है, तो लोग उसकी झलक अलग-अलग चीज़ों में देखते हैं.
कई बार लोगों को तस्वीरों में नई उम्मीद नज़र आती है.
ऐसी ही एक तस्वीर कुछ दिनों पहले सामने आई. ये तस्वीर थी फ़ारस की खाड़ी के ऊपर उड़ते विमान 'सोलर इम्पल्स 2' की.
स्विटज़रलैंड में बना ये विमान, सूरज की रौशनी से ताक़त लेकर उड़ता है. इसमें ईंधन के तौर पर तेल का इस्तेमाल नहीं किया जाता.
एक ख़ास नज़रिए से ली गई 'सोलर इम्पल्स 2' की तस्वीर, आने वाले वक़्त की चुनौतियों से निपटने की उम्मीद जगाती है.
चुनौती है, तेज़ी से ख़त्म हो रहे कच्चे तेल के भंडार का विकल्प तलाशने की.
आज इंसान अपनी तरक़्क़ी के लिए इसी ईंधन पर निर्भर हैं, जिसके भंडार सीमित हैं.
वो तेज़ी से ख़त्म हो रहे हैं. ऐसे में दुनिया को फ़िक्र है कि आगे चलकर कौन सा ईंधन इस्तेमाल किया जाएगा?

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'सोलर इम्पल्स 2' इसी सवाल के जवाब के तौर पर सामने आया है, जो सौर ऊर्जा से उड़ता है.
'सोलर इम्पल्स 2' की ये तस्वीर उस वक़्त ली गई जब वो फ़ारस की खाड़ी के ऊपर से गुज़र रहा था.
ये वो जगह है जहां एक सदी पहले तेल के बड़े भंडार पाए गए थे. जहां से दुनिया की तेल की खपत का बड़ा हिस्सा पूरा किया जाता है.
मगर खाड़ी देशों में कच्चे तेल के ये भंडार तेज़ी से ख़त्म हो रहे हैं.
ऐसे में जब नीचे ज़मीन खिसकती नज़र आ रही हो, तो, ऊपर उम्मीदों के नए पंख लगाता ये विमान उड़ रहा है.
'सोलर इम्पल्स 2' की तस्वीर, लोगों को ये हौसला दे रही है कि आने वाले वक़्त में ये विकल्प हमारे पास होगा. ऐसे में ज़्यादा परेशान होने की ज़रूरत नहीं.
'सोलर इम्पल्स 2' की तस्वीर जैसी ही एक पेंटिंग, साठ के दशक में बनायी गई थी.
तब अमरीका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध की तनातनी बढ़ रही थी.
उसी बीच अमरीका के हाइड्रोजन बम बनाने की ख़बरें आ रही थीं.
उससे छह साल पहले दुनिया ने हिरोशिमा और नागासाकी में एटम बम से होने वाली तबाही का मंज़र देख लिया था.
ऐसे में जब हाइड्रोजन बम तैयार किए जाने की ख़बर आई, तो लगा कि अब दुनिया की तबाही तय है.
डर के इसी माहौल में कलाकार साल्वाडोर डाली ने 1951 में ये पेंटिंग बनायी थी.
इस पेंटिंग में ईसा मसीह सलीब पर लटके हुए दिखाई देते हैं. उनका सलीब जिस ज़मीन पर गढ़ा है वो पिघलती सी मालूम होती है.
उनके चारों ओर हाहाकार सा मचा दिखता है. ये पेंटिंग, देखने वाले को यूं दिखाई देती है जैसे वो ऊपर से झांक रहा हो.
ज़मीन तो खिसक रही है. मगर, सलीब पर लटके ईसा मसीह, शांत हैं.
जैसे वो देखने वाले को ये हौसला दे रहे हैं कि ऊपर सब ठीक है. तबाही के बाद अमन ही आएगा.

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ये पेंटिंग उस वक़्त बनायी गई थी जब दुनिया इस बात से ख़ौफ़ज़दा थी कि कब अमरीका या रूस के बीच एटमी जंग छिड़ जाएगी और दुनिया तबाह हो जाएगी.
इसे बनाने वाले कलाकार साल्वाडोर डाली कहते हैं कि उन्होंने तनातनी के इस दौर में शांत ब्रह्मांड का ख़्वाब देखा था. ये पेंटिंग उसी ख़्वाब की ताबीर है.
साल्वाडोर डाली के मुताबिक़ एटमी विस्फोट से पैदा होने वाली ज़बरदस्त ऊर्जा ब्रह्मांड की तरह ही अनंत है. वो हमें उसी में मिला देगी.
'सोलर इम्पल्स 2' की तस्वीर या साल्वाडोर डाली की पेंटिंग, दोनों में समानता यही है कि दोनों, मुश्किल वक़्त के बाद की नई रौशन दुनिया को दिखाते हैं.
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