ब्रिटेन का अक्स दिखातीं ये तस्वीरें

ऐन आइडियल फॉर लिविंग

इमेज स्रोत, Derek Ridgers

कुछ तस्वीरें दिलो-दिमाग़ पर हमेशा के लिए छा जाती हैं. किसी ख़ास लम्हे, जज़्बात या मुद्दे का प्रतीक बन जाती हैं.

बीते दौर में ब्रिटेन कैसा था, इसकी याद दिलाती कुछ तस्वीरों की नुमाइश इन दिनों लंदन में लगी हुई है. नाम है, 'ऐन आइडियल फ़ॉर लिविंग'.

ये तस्वीरें डेरेक रिजर्स नाम के फ़ोटोग्राफ़र ने 1981 में खींची थी.

यह तस्वीर ट्यूनॉल बैरी नाम के युवक की है. उसने नियो नाज़ियों की तरह सिर मुंडवाया है. नाक में छेद कराया है.

चेहरे पर भाव नहीं दिखते. कुछ लोग उसे ज़माने के चलन से बग़ावत करने वाला स्किनहेड कहते हैं. तो कुछ लोग नियो-नाज़ी मानते हैं.

असल में ब्रिटेन में सत्तर के दशक से पहले ब्लैक म्यूज़िक, यानी डरावने संगीत का चलन था.

ये युवक उसी ब्लैक म्यूज़िक को पसंद करने वाले युवाओं के समूह का हिस्सा था. ये लोग ख़ुद को स्किनहेड बुलाते थे.

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इमेज स्रोत, Derek Ridgers images courtesy of Beetles Huxley

इन्हीं लोगों के एक गिरोह ने डेरेक को भी अपने साथ कुछ वक़्त बिताने का न्योता दिया था.

डेरेक ने ये तस्वीर उसी वक़्त खींची थी. वो उन दिनों को याद करके कहते हैं कि उस गैंग के ज़्यादातर सदस्य आम युवाओं जैसे थे.

डेरेक बताते हैं कि इन स्किनहेड्स की पहचान भी उनके अलग तरह के फ़ैशन की वजह से थी.

इनके आंदोलन का मक़सद समाज के नियमों से बग़ावत करना था. आंदोलन में राजनीति तो बाद में घुसी.

गिरोह के आम युवकों के अलावा कुछ ऐसे भी थे जो बहुत ख़तरनाक थे. इन्होंने ही माहौल बिगाड़ने और स्किनहेड्स को बदनाम करने में अहम रोल निभाया.

लंदन में 'ऐन आइडियल फ़ॉर लिविंग' ऐसे वक़्त में लगी है, जब ब्रिटेन बड़े उठा-पटक के दौर से गुज़र रहा है.

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इमेज स्रोत, Derek Ridgers images courtesy of Beetles Huxley

ब्रिटेन ने अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए यूरोप से अलग होने का फ़ैसला किया है.

ऐसे में इन तस्वीरों की मदद से ब्रिटेन अपनी खोई हुई पहचान तलाशने की कोशिश कर रहा है.

दिक़्क़त ये है कि इनमें से किसी एक तस्वीर से ब्रिटेन का पूरा ख़ाका खड़ा नहीं होता.

लेकिन, सब तस्वीरों को मिलाने पर ब्रिटेन का एक अक्स तैयार होता है, जो आज की तारीख़ में बंटा हुआ मालूम होता है.

इनमें से एक तस्वीर 1937 की है. इसमें ब्रिटेन में महाराजा जॉर्ज षष्ठम की ताजपोशी के वक़्त एक शख़्स सड़क पर सोया हुआ है.

ये ब्रिटेन का आम चलन नहीं. ऐसे में इस तस्वीर में लगता है, जैसे कि सड़क पर सोया शख़्स उस वक़्त के ब्रिटिश समाज से बग़ावत कर रहा हो.

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ऐसी ही एक तस्वीर दो नौकरानियों की है, जो कहने को ब्रिटिश समाज की झलक दिखाती हैं.

मगर ये ब्रिटिश समाज के भीतर के उन खांचों को भी उजागर करती है, जिसमें आम ब्रितानी ख़ुद को अलग-अलग दर्जों में बंटा हुआ पाते हैं.

अमीर और ग़रीब की खाई भी इससे उजागर होती है. 'ऐन आइडियल फॉर लिविंग' नुमाइश 90 सालों का इतिहास अपने में समेटे हुए है.

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इसमें 29 फ़ोटोग्राफ़र्स की खींची 64 तस्वीरें हैं. इनमें स्किनहेड हैं, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के छात्र हैं, पार्लर मेड हैं, बैंकर हैं और विरोध प्रदर्शन करने वाले भी हैं.

सभी तस्वीरों से एक बात खुलकर ज़ाहिर होती है कि लोगों के अंदर बग़ावत की आग जल रही है.

रीति-रिवाजों की बेड़ियां, समाज की बंदिशें, क़ानून के दायरे तोड़ डालने की ख़्वाहिश इनके चेहरों से उजागर होती है.

ये तस्वीरें फ़ोटोग्राफ़र्स बिल ब्रांट की क़िताब 'द इंग्लिश ऐट होम' और डेरेक रिजर्स की 'स्टेयर' से ली गई हैं.

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इमेज स्रोत, Bruce Davidson Magnum Photos image courtesy of Beetles Huxley

इन क़िताबों में तस्वीरों के साथ उनके क़िस्से भी बयां किए गए हैं.

डेरेक ने अपनी किताब में लिखा है कि यहां हिप्पी हैं, पंक हैं, रेवर्स हैं, टेड्स हैं, मॉड्स हैं और हर ख़ूबसूरत लड़का और गंदी लड़की भी शामिल है.

आज भले ही इन तस्वीरों को देखकर बहुत से ब्रिटिश ये सोचते हैं कि काश! हम उस दौर में होते.

मगर उस दौर में इन तस्वीरों में दिख रहे लोगों को समाज से बाहर का माना जाता था.

मगर फ़ोटोग्राफ़र डेरेक रिजर्स मानते हैं कि हर दौर में बाग़ी होते हैं. बस उनके नाम और चेहरे बदल जाते हैं.

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इमेज स्रोत, Emil O Hopp images courtesy of Beetles Huxley

इसलिए कभी स्किन हेड थे, तो आज नियो-नाज़ी हैं.

वैसे फ़ोटोग्राफी की प्रोफेसर वाल विलियम्स कहती हैं कि ये तस्वीरें तारीख़ के एक दौर की गवाह हैं.

उस दौर में कैसा फ़ैशन चलन में था? लोग क्या सोचते थे? क्या करते थे? इन सब सवालों के जवाब ये तस्वीरें देती हैं.

डेरेक रिजर्स अपनी तस्वीरों के बारे में कहते हैं कि अस्सी के दशक में कुछ युवा अपने भविष्य को लेकर आशंकित थे.

उन्हें लगता था कि आगे तो अंधेरा ही अंधेरा है. आम तौर पर जवानी में लोग अच्छा पहनना-ओढ़ना पसंद करते हैं.

मगर इन तस्वीरों में दिख रहे कुछ युवा ज़िंदगी से बेज़ार नज़र आते हैं.

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इमेज स्रोत, Syd Shelton image courtesy of Beetles Huxley

डेरेक ने ट्यूनॉल बैरी की दो साल के अंतर में दो तस्वीरें ली थीं. पहली तस्वीर में वो स्किनहेड था.

वहीं दूसरी तस्वीर में एकदम बदला हुआ, पंक ग्रुप का सदस्य नज़र आता है.

मतलब ये कि कुछ युवा जो पहले स्किनहेड थे, बाद में उस बात को भूलकर किसी और गैंग का हिस्सा बन गए.

डेरेक ये भी कहते हैं कि आज तो हर शख़्स के हाथ में कैमरा है, उस दौर में गिने-चुने लोग ही फ़ोटोग्राफी करते थे.

ऐसे में राह चलते ट्यूनॉल जैसे लोगों की तस्वीरें आज और भी यादगार बन गई हैं.

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इमेज स्रोत, Chris Steele Perkins Magnum Photos images courtesy of Beetles Huxley

विलियम्स कहती हैं कि स्मार्टफ़ोन का दौर आने से पहले की इन तस्वीरों में वो वक़्त ठहरा सा नज़र आता है.

डेरेक के अलावा इस नुमाइश में क्रिस स्टील-पर्किंस की खींची एक तस्वीर है.

इसमें कुछ अश्वेत लड़कियां वोल्वर हैम्पटन क्लब में नाचती दिखती हैं.

ये उस दौर के बुझे हुए से वोल्वर हैम्पटन की अलग ही तस्वीर बयां करती है.

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इमेज स्रोत, Charlie Philips images courtesy of Beetles Huxley

ऐसी ही एक तस्वीर है 1968 की. इसमें एक क्लब के बाहर एक गोरी महिला एक अश्वेत शख़्स का चुंबन लेती हुई दिख रही हैं.

इसे जमैका से आकर लंदन में बसे फोटोग्राफर चार्ली फ़िलिप्स ने लिया था.

साठ के दशक में कैरिबियन द्वीपों से आकर बसे लोगों को ब्रिटिश समाज में मान से या बराबरी से नहीं देखा जाता था. वो अलग-थलग थे.

ऐसे में नॉटिंग हिल इलाक़े में पब के सामने गोरी महिला के एक अश्वेत शख़्स का चुंबन लेने की तस्वीर, नए दौर की मिसाल बन गई है.

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इमेज स्रोत, Charlie Philips images courtesy of Beetles Huxley

ऐसी ही एक और तस्वीर जो चार्ली फिलिप्स ने 1967 में ली थी. इसमें एक अश्वेत युवक अपनी गोरी पत्नी के साथ हैं.

ये उस दौर के चलन से बग़ावत की गवाही देने वाली तस्वीर है. ख़ुद फ़िलिप्स की सबसे पसंदीदा तस्वीर 1933 की है.

जिसमें स्कूल जा रहा एक लड़का ढेर सारे सामान के साथ रेलवे स्टेशन पर बैठा ट्रेन का इंतज़ार कर रहा है.

ये तस्वीर उन्हें 1956 में उस दिन की याद दिलाती है जब वो लंदन आकर पैडिंग्टन स्टेशन पर अपने मां-बाप से मिले थे.

नुमाइश में साठ और सत्तर के दशक के राजनैतिक आंदोलनों की भी झलक मिलती है.

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इमेज स्रोत, Peter Dench image courtesy of Beetles Huxley

जैसे कि सामाजिक कार्यकर्ता डार्कस हो की एक तस्वीर. जिसमें वो एक सार्वजनिक शौचालय की छत पर खड़े होकर लोगो को संबोधित कर रहे हैं.

उनका आंदोलन ब्रिटेन में नस्लवाद के ख़िलाफ़ था.

ये तस्वीर सिड शेल्टन ने ली थी, जो उस दौर के नेशनल फ्रंट के ख़िलाफ़ बग़ावत करने वाले लोगों की जमात का हिस्सा थे.

शेल्टन को लगता है कि ब्रिटेन में नस्लवाद आज भी ज़िंदा है. हालांकि उसका रूप-रंग बदल गया है.

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इमेज स्रोत, Syd Shelton image courtesy of Beetles Huxley

सिड कहते हैं कि हर दौर में लोग ऐसी बेड़ियों को काटने का नया तरीक़ा तलाश लेते हैं. जैसे सिड के वक़्त में रॉक अगेंस्ट रेसिज़्म का दौर था.

साठ के दशक की एक और तस्वीर जो इस नुमाइश में है, वो है वेल्स के एक बच्चे की.

ये बच्चा वेल्स के खदान कर्मचारी का है. जिसमें ये ज़ाहिर होता है कि ये खदानकर्मी कितने गंदे माहौल में रहते थे.

सबसे ताज़ा तस्वीर 2013 की है, जिसमे एक महिला लाल हिजाब पहने हुए हैं.

ये तस्वीर महताब हुसैन ने खींची है, जो ब्रिटेन की मुस्लिम महिलाओं की बदलती सोच को दिखाती है.

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इमेज स्रोत, Mahtab Hussain image courtesy of Beetles Huxley

ब्रिटिश मुस्लिम महिलाएं आज दोराहे पर खड़ी नज़र आती हैं.

एक तरफ़ तो वो पश्चिम का खुलापन अपनाना चाहती हैं. वहीं, वो अपनी परंपराओं को भी बचाए रखना चाहती हैं.

तस्वीरों की ये नुमाइश ज़ाहिर करती है कि किसी देश के कितने पहलू हो सकते हैं. किसी देश की कोई एक पहचान नहीं हो सकती.

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