'पास वालों को घास नहीं डालते, दूर वालों को...'

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    • Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, इस्लामाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए

हम जैसे लोग जिन्हें बाल की खाल निकाले बिना मुश्किल से ही नींद आती है, हम जैसों को दुनिया के किसी भी देश की, किसी भी सरकार की, कोई भी पॉलिसी मुश्किल से ही अच्छी लगती है.

और अच्छी भी लगती है तो अगर-मगर, दरअसल, परंतु लगाने से हम भला कहां बाज़ आते हैं.

सीधे स्वभाव और चीज़ें, नीतियां और इंसान जैसे हैं वैसे ही पसंद आने लगें, तो फिर हमें बुद्धिजीवी भला कौन कहेगा?

वरिष्ठ टीकाकार या टिप्पणीकार कौन समझेगा? मगर कभी-कभी हम जैसों को भी सोच-सोचकर खुशी होती है कि हमारा देश जैसा भी है, यहां जीवन जितना भी कठिन या आसान है, है तो अपना जीवन, हैं तो अपने लोग.

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अब देखिए न यही पाकिस्तान है जहां पिछले डेढ़ साल के दौरान क़रीब चार सौ लोगों को फांसी दे दी गई.

सूली पर चढ़ाने वालों में चरमपंथ से निपटने वाले खुसुसी अदालतों के अलावा सैनिक न्यायलय भी शामिल हैं, जिनके बारे में मानवाधिकारों से जुड़े लोग और संगठन कहते हैं कि ये न्यायालय नहीं बल्कि अन्यायालय हैं.

ये बात ठीक है कि पाकिस्तान इस वक़्त मृत्युदंड देने वाले देशों में तीसरे नंबर पर है. पर पिछले हफ़्ते यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि इसी पाकिस्तान के लोग जुल्फिकार अली को लेकर बहुत चिंतित थे और दुआएं कर रहे थे कि इंडोनेशिया की सरकार उनकी फांसी टाल दे.

हालांकि जुल्फिकार अली को नशीले पदार्थ स्मगल करने के जुर्म में मृत्युदंड सुनाया गया था. यही जुल्फिकार अली पाकिस्तान में होते तो शायद खामोशी से किसी जेल में फांसी पर लटका दिया जाता.

मगर जुल्फिकार अली किसी बाहर की जेल में लटके यह बात दुख देने वाली थी. लेकिन जब जुल्फिकार अली की फांसी टलने की ख़बर आई तो सब खुश हुए.

सुषमा स्वराज

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वैसे तो भारत की लगभग 16 फ़ीसद जनता आज भी भुखमरी और पोषण की कमी से जूझ रही है.

महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ज़मीन ने एक मुद्दत से अपनी खुश्क जेबें उलट रखी हैं. उस पर यह बावेला अलग से कि भारत में हर साल लगभग एक लाख किसान बीमारी, कर्जे या भुखमरी के कारण आत्महत्या कर लेते हैं.

लेकिन जब इसी भारत में यह ख़बर पहुंचती है कि क़रीब दस हज़ार भारतीय कामगार सऊदी अरब में बिना रोज़गार कई दिन से भूखे-प्यासे हैं, तो सुषमा स्वराज समेत सब सोचने लगते हैं कि इनकी मुश्किल कैसे आसान की जाएं.

यही दस हज़ार भारतीय अगर देश में रह रहे होते और इतने ही भूखे-प्यासे होते तो शायद एक दिन की ख़बर या न्यूज़ चैनल पट्टी से ज़्यादा इसकी औकात ना होती.

मगर चूंकि यह दस हज़ार नागरिक परदेस में हैं, इसलिए देश में रहने वाले करोड़ों लोग उनके लिए और उनकी भूख-प्यास के बारे में सोच-सोचकर परेशान हुए जा रहे हैं.

इंसान अजीब जानवर है. पास वाले को घास नहीं डालता और दूर वाले के लिए चीख-चीखकर गला सुखा लेता है.

मगर यह हरकत, यह चुभन अपने आप में कितनी प्यारी और मासूम है. मानवता बस एक नाखून की खरोंच जितनी ही तो दूर होती है. खरोंच के तो देखिए जरा.

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