'मैंने अपनी मौत को देखा है'

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- Author, क्रिस बारानियूक
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
एक्स-रे का इस्तेमाल आज कई तरह की बीमारियों का पता लगाने में होता है.
तमाम वैज्ञानिक तजुर्बों में भी इनका प्रयोग किया जाता है. आज तो लोग एक्स-रे चश्मे पहनने का भी ख़्वाब देखने लगे हैं.
जिनकी मदद से किसी के कमरे के भीतर, किसी के कपड़ों के अंदर झांका जा सके.
एक्स-रे का इस्तेमाल क़रीब सवा सौ साल से हो रहा है.
1895 में जब पहली बार जर्मन डॉक्टर विल्हेम रॉन्टजेन ने एक्स-रे की खोज की थी, तब उन्होंने इसका तजुर्बा अपनी बीवी एना बर्था रॉन्टजेन पर किया था.
एक्स-रे से निकाली गई अपनी तस्वीरें देखकर एना चीख पड़ी थीं.
एना ने एक्स-रे की मदद से निकाली गई अपनी हड्डियों की तस्वीरों को देखकर कहा था, 'मैंने अपनी मौत को देखा है'.
जैसे ही ये ख़बर फैली कि किसी ने लोगों के बदन की चीर-फाड़ किए बिना उसके अंदर झांकने का तरीक़ा ढूंढ निकाला है, शोर मच गया.
अख़बारों में एक्स-रे से निकाली गई इंसानों के बदन और उनके अंगों की तस्वीरें छपने लगीं.
एक्स-रे की चर्चा बढ़ी तो लोग तरह-तरह के ख़्वाब देखने लगे.

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ख़ुद इसकी खोज करने वाले विल्हेम रॉन्टजेन ने अपनी बीवी की एक्स-रे तस्वीरों पर कविता तक लिख डाली.
इस पर सुपरमैन की कॉमिक सीरीज़ भी छप गई. उस सीरीज़ में सुपरमैन के पास एक्स-रे जैसे देखने की ताक़त थी.
एक्स-रे को लेकर आम आदमी का एक ही सपना था.
उनके हाथ में एक ऐसा जादुई चश्मा लग जाएगा, जिसके ज़रिए वो दीवार के आर-पार भी देख सकेंगे.
आम तौर पर तो इसे वैज्ञानिक कल्पना ही कहा जाता है. मगर, अब ये ख़्वाब सच होने को है.
जब रॉन्टजेन ने एक्स-रे की खोज की तो उसके कुछ सालों बाद तक, इसके बारे में अजीबो-ग़रीब बातें होती रहीं.
जैसे कि 1896 में ब्रिटेन के डंडी शहर में एक स्थानीय पुलिसवाले का बयान छापा.
जिसमें उसने ये उम्मीद जतायी थी कि इस एक्स-रे की मदद से खुफ़ियागीरी में मदद मिल सकती है.
हाथ में पकड़ने वाली ऐसी मशीन एक्स-रे की मदद से बनाई जा सकती है जो अपराधियों की निगरानी में काम आ सकती है.
ख़तरनाक जगहों के भीतर झांकने में भी इससे मदद की उम्मीद इस पुलिसवाले को थी. मगर वो बहुत शुरुआती बातें थीं.

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डंडी यूनिवर्सिटी के लेक्चरर कीथ विलियम्स कहते हैं कि उस दौर में एक्स-रे के बारे में तमाम क़िस्से-कहानियां चल पड़ी थीं.
एक वैज्ञानिक पत्रिका ने तो ये तक छाप दिया था कि एक्स-रे की मदद से दीवार के आर-पार भी देखा जा सकेगा.
इससे लोगों की निजी ज़िंदगी में भी ताक-झांक की जा सकेगी.
कुछ लोगों ने और भी बड़े दावे किए कि आप स्टील की बनी दीवार के पार भी एक्स-रे की मदद से देख सकेंगे.
यहां तक कि आपके बटुए में पड़े सिक्के के पीछे की तस्वीर भी एक्स-रे दिखा देंगी. मगर जल्द ही एक्स-रे के नुक़सान सामने आने लगे.
इस वजह से एक्स-रे चश्मों के ख़्वाब को हक़ीक़त में तब्दील करने की कोशिशें धीमी पड़ गईं.
हालांकि बीसवीं सदी की शुरुआत में कुछ कॉमिक्स के साथ एक्स-रे चश्मे बेचे गए. लेकिन वो असल में एक्स-रे से लैस नहीं थे.
लेकिन 1998 में एक बार फिर से एक्स-रे से लैस चश्मों की दिशा में काम शुरू हुआ.
सोनी ने एक वीडियो रिकॉर्डर बाज़ार में उतारा, जिसकी मदद से रात की तस्वीरें भी नज़र आ जाती थीं.
इसका नाम था, 'नाइटशॉट' . कुछ लोगों ने दावा करना शुरू कर दिया कि इसकी मदद से कपड़ों के पार भी इंसान के बदन में झांका जा सकता है.

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हालांकि ये बात सच नहीं थी. कुछ कमियों के चलते जब सोनी ने इन कैमरों को बाज़ार से वापस लिया तो चर्चा ये हुई कि सोनी ने बदनामी से बचने के लिए ऐसा किया है.
हालांकि सच ये था कि सोनी ने ऐसा एक तकनीकी गड़बड़ी दूर करने के लिए किया था.
फिर बाज़ार में तमाम नाइट विज़न मशीनें आ गईं जिनकी मदद से रात में चीज़ें देखी जा सकती थीं.
ये मशीनें इन्फ्रारेड रौशनी को देख सकती थीं. कई देशों की सेनाओं में भी इन्फ्रारेड किरणें देख सकने वाली नाइट विज़न मशीनों का इस्तेमाल किया जाने लगा.
हालांकि एक्स-रे तकनीक की मदद से देखने की कोशिश अभी भी नहीं कामयाब हुई थी.
अमरीका की राजधानी वॉशिंगटन स्थित खुफिया म्यूज़ियम के विंस हॉटन कहते हैं कि एक्स-रे की मदद से कुछ झाड़ियों के भीतर तो झांका जा सकता है.
मगर इनके बहुत कारगर होने की उम्मीद कम है.
हालांकि विंस ये भी कहते हैं कि इस तकनीक की ज़रूरत तो महसूस की जा रही है.
जैसे कि किसी बंधक संकट के दौरान, दूर से हालात पर नज़र दौड़ाने के लिए एक्स-रे मशीनों की मदद ली जा सकती है.

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कमरे में बंद बंधकों और अपराधियों की हरकतों पर एक्स-रे कैमरों की मदद से नज़र रखी जा सकती है.
फौज के लिए सामान बनाने वाली कंपनियां बहुत दिनों से एक्स-रे तकनीक से लैस ऐसी मशीनें बनाने की कोशिश कर रही हैं, जिनकी मदद से दीवार के आर-पार देखा जा सके.
हालांकि शुरू में जो ऐसी मशीनें बनीं वो इतनी भारी-भरकम थीं कि उनका इस्तेमाल आसान नहीं था.
हालांकि अब कुछ ऐसी मशीनें बन गई हैं जैसे कि मिनी ज़ी एक्स-रे गन. इसे हाथ में पकड़ा जा सकता है.
इसकी मदद से गाड़ियों के, कमरों के और बैग के भीतर ताक-झांक की जा सकती है.
हालांकि ये मिनी ज़ी एक्स-रे गन अभी आम लोगों के इस्तेमाल के लिए मुहैया नहीं कराई गई है.
इसकी भारी क़ीमत भी है. पचास हज़ार डॉलर यानी चौंतीस लाख रुपए. हां, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां इसका इस्तेमाल कर रही हैं.
लेकिन, कुछ लोग ये सवाल भी उठा रहे हैं कि एक्स-रे गन का ज़्यादा इस्तेमाल जनता की सेहत के लिए नुक़सानदेह हो सकता है.
फिर वो लोगों की निजता में भी दखल दे सकता है. अमरीका में तो एक्स-रे गन का दुरुपयोग रोकने के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं.
वैसे, आम लोगों के लिए अच्छी ख़बर ये है कि एक्स-रे जैसी तकनीक से लैस एक मशीन हमारे घर में भी मौजूद है.
जो वाई-फाई आप ब्रॉडबैंड के लिए इस्तेमाल करते हैं, उसमें थोड़े से तकनीकी हेर-फेर से उसकी मदद से दीवार के पार देखा जा सकता है.
पिछले ही साल अमरीका के मशहूर मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने एक वीडियो के ज़रिए ये बताया था कि आप वाई-फाई मशीन की मदद से कैसे दीवार के पार देख सकते हैं.
विंस हॉटन कहते हैं कि ये तकनीक अभी भी इस्तेमाल हो रही है जिसके ज़रिए इमारतों के भीतर देखा जा सकता है.
इसकी मदद से इमारत की बनावट और उसके अंदर की गई वायरिंग को देखा जा सकता है.
हो सकता है कि फौज और सुरक्षा एजेंसियां इस तकनीक का इस्तेमाल कर रही हों.
वैसे भी इस तरह की जो नई तकनीक पब्लिक के लिए सामने आती है, वो सेना या ख़ुफ़िया एजेंसियां दस साल पहले से ही इस्तेमाल कर रही होती हैं.
इसीलिए विंस हॉटन मानते हैं कि एक्स-रे चश्मों का वक़्त आ गया है.
हो सकता है कि अगले कुछ सालों में गूगल ग्लास जैसा ही कोई एक्स-रे ग्लास बाज़ार में आ जाए. फिर, आप भी सुपरमैन होने का दावा कर सकेंगे.
(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href=" http://www.bbc.com/future/story/20160718-the-secret-history-of-x-ray-specs" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)
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