वो 'भारत का नाम मिटा देना चाहते हैं'

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- Author, प्रोफेसर रोहित चोपड़ा
- पदनाम, सैंटा क्लारा यूनिवर्सिटी के एसोसिएट
हज़ारों शिक्षाविदों ने कैलिफ़ोर्निया स्टेट बोर्ड ऑफ एड्यूकेशन को ये याचिका दी है कि वो सामाजिक अध्ययन की किताबों में भारत का नाम हटाकर दक्षिण एशिया न करे.
कैलिफ़ोर्निया में 11 से 13 साल के छात्रों की किताबों में हिंदूओं और भारत के कथित ग़लत चित्रण को लेकर भी विवाद जारी है.
ऐसी बहस एक बार दशकों पहले भी हुई थी.

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2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से इन असहमतियों को और बढ़ावा मिला है, कई बार सड़कों और सोशल मीडिया में इसपर उग्र प्रतिक्रिया भी देखने को मिली है.
ये बहस मुख्य रूप से भारत का नाम बदलकर दक्षिण एशिया करने और भारतीय समाज में जातीय व्यवस्था के किरदार पर केंद्रित है.
कुछ जानेमाने शिक्षाविदों का मानना है कि इस क्षेत्र को भारत की जगह दक्षिण एशिया कहना सही है जिससे 1947 के पहले और बाद के भारत के फ़र्क़ को समझा जा सके.

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उनका तर्क है कि पाठ्यपुस्तकों में प्राचीन भारत और भारत कहने से बच्चे भ्रमित हो सकते हैं ख़ासकर तब जब आधुनिक भारत और पाकिस्तान का इतिहास एक रहा है.
मीडिया ने ऐसे शिक्षाविदों के समूह और धर्मनिरपेक्ष दक्षिण एशियाई संगठनों और रूढ़िवादी हिंदू-अमरीकी संगठनों जैसे हिंदू-अमरीकन फाउंडेशन, एचएएफ के बीच की लड़ाई को उजागर किया है.
हिंदू-अमरीकी संस्थानों ने इन शिक्षाविदों पर आरोप लगाया है कि वो नाम बदलकर भारत का ही नाम हमेशा के लिए मिटा देना चाहते हैं.

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इन संस्थानों ने पाठ्यपुस्तकों से जाति पूर्वाग्रह को भी हटाने की मांग की गई है.
सांस्कृति संस्थान जैसे एचएएफ के पास माता-पिता अपने बच्चों को भारतीय महाकाव्यों के बारे में पढ़ने के लिए भेजते हैं ख़ासकर समर कैंपों के दौरान.
लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि जो भी लोग ऐसे इवेंट में शामिल होते हैं वो हिंदू राष्ट्रवादी या हिंदू रूढ़िवादी बन जाते हैं.
यही तर्क उन लोगों के लिए भी है जो भारत का नाम दक्षिण एशिया रखने का विरोध कर रहे हैं.

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न्यूयॉर्क टाइम्स को लिखे एक ख़त में नेथन ग्लेज़र, हार्वर्ड में समाजशास्त्र के प्रोफेसर एमेरिटस इस बात की ओर इशारा करते हैं कि दक्षिण एशिया शब्द की ऐतिहासिक वैधता नहीं है.
उनका मानना है कि भले ही इस मामले पर वो बहुत गहराई से महसूस नहीं करते लेकिन शिक्षाविदों को इस तरह के सवाल पूछना जैसा कि वो हर चीज़ के बारे में पूछते हैं ज़रूरी भी है.
कब और कहां पहली बार इस शब्द का इस्तेमाल हुआ? किन कारणों से? किस हद तक यह अमरीकन अकादमी की राजनीति को प्रतिबिंबित करता है इस ओर प्रोफेसर ग्लेज़र इशारा करते हैं.
जातिवाद का सवाल ज्यादा पेचीदा है. पाठ्यपुस्तकों में जातिवाद की बात को हटा दी जाएगी तो सदियों से दलितों पर हो रहे ज़ुल्मों की बात नहीं उजागर हो पाएगी.

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सोचने वाली बात है कि अमरीकी समाज में भी इस तरह के भेदभाव हमेशा से रहे हैं. अमरीका ख़ुद भूल गया कि कैसे उसने चीनी, जापानी, फिलिपीनो, सिखों और अफ्रीकी-अमरीकी मूल के नागरिकों पर हिंसा बरपाया.
वहीं ये भी सच है कि जातिवाद से हिंदू धर्म ख़त्म नहीं हो जाएगा और ज्यादातर अमरीरकियों के लिए हिंदू धर्म जाति और गाय से ऊपर उठकर है. शायद हम इसमें कॉल सेंटरों का भी ज़िक्र कर सकते हैं.
माता-पिता इस बात से डर रहे हैं कि जातिवाद जैसी पढ़ाई से सीमित और घिसे-पिटे सोच के आधार पर उनके बच्चों को लेकर राय बनाई जाएगी.

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ये बिल्कुल वैसे ही होगा जैसे भारतीय लोग अमरीकियों को ग़ुलामी के अपराधियों के तौर पर देखेंगे.
लेकिन शिक्षाविदों और हिंदू-अमरीकी संस्थानों के बीच कोई सामन्जस्य बन पाएगा इसकी संभावना बेहद कम है.
विवाद के उठने के बाद उम्मीद की जा रही है कि भारत का नाम पाठ्यपुस्तकों में नहीं बदला जाएगा. लेकिन जातिवाद पर पढ़ाई को भी जारी रखा जाएगा.
(रोहित चोपड़ा सैंटा क्लारा यूनिवर्सिटी में मीडिया स्टडीज़ के एसोसिएट प्रोफेसर हैं)
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