वसीयत हो न हो, संपत्ति है तो जंग होगी

प्रिंस

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पुराने ज़माने में राजा महाराजाओं, बादशाहों, शहंशाहों की मौत के बाद उनकी विरासत का झगड़ा अक्सर होने लगता था. इसी तरह रईसों की संपत्ति को लेकर भी उनके वारिसों के झगड़े के तमाम क़िस्से मशहूर हैं.

मुंबई में शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की विरासत का झगड़ा है तो तमिलनाडु में करुणानिधि के ज़िंदा रहते ही उनके बेटे अड़ागिरि और स्टालिन उनकी सियासी विरासत को लेकर झगड़ रहे हैं.

विरासत का ये झगड़ा तब और बढ़ जाता है जब कोई वसीयत नहीं होती. वैसे वसीयत होती भी है, झगड़े तब भी होते हैं.

अभी हाल ही में अमरीका में पॉप स्टार प्रिंस की अचानक हुई मौत के बाद उनकी संपत्ति के कई दावेदार सामने आ गए. कुछ लोगों ने तो अपने पास प्रिंस की असली वसीयत के होने का दावा भी कर दिया.

हालांकि अमरीका की एक अदालत ने साफ़ किया है कि प्रिंस ने मरने से पहले कोई वसीयत नहीं बनाई थी. इसलिए उनकी धन-दौलत उनकी सगी बहन टाइका नेल्सन और पांच सौतेले भाई-बहनों में बंटेगी. हालांकि प्रिंस की करोड़ों की संपत्ति का ये झगड़ा इतनी आसानी से नहीं निपटने वाला. लंबी क़ानूनी लड़ाई तय है.

वैसे किसी की मौत के बाद संपत्ति का ये झगड़ा सिर्फ़ रईसों तक सीमित हो ऐसा नहीं.

कल्पना कीजिए कि एक दंपती के पास एक फ़ॉर्म हाउस है. उनके चार बच्चे हैं. उनमें से सिर्फ़ एक औलाद उनके साथ फ़ॉर्म हाउस में काम करती है. वो चालीस बरस तक मां-बाप के साथ रहता है, काम करता है, थोड़े-बहुत पैसे भी ले लेता है और उसकी मेहनत की वजह से ही फ़ॉर्म हाउस चलता रहता है.

तुर्की

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मगर, मां-बाप की मौत के बाद उसके बाक़ी के भाई-बहन भी उस फ़ॉर्म हाउस पर दावा ठोकने पहुंच जाते हैं. जबकि उससे पहले वो अपनी कामयाब ज़िंदगी जीते रहते हैं.

बिना ये सोचे हुए कि उनके मां-बाप और भाई फॉर्म हाउस में कड़ी मशक़्क़त करके ज़िंदगी बसर कर रहे हैं. मां-बाप के मरने के बाद वो ये नहीं सोचते कि संपत्ति उनके उस भाई को मिलनी चाहिए जिसने अपनी ज़िंदगी के चालीस बरस वहां लगाए हैं.

दिक़्क़त तब और बढ़ जाती है जब मां-बाप वसीयत में एक लाइन यह भी जोड़ देते हैं कि हमारी ये इच्छा है कि फ़ॉर्म हाउस हमारे साथ रहने वाले बेटे को मिले. लेकिन अगर बच्चे इस वसीयत में फ़ेर-बदल करना चाहें तो वो इसके लिए आज़ाद हैं.

होता यूं है कि मां-बाप की मौत के बाद उनसे दूर रहने वाले तीन भाई-बहन, अपने मां-बाप की वसीयत को चुनौती देते हैं और फ़ॉर्म हाउस पर अपना-अपना दावा ठोक देते हैं. अगर वो मुक़दमा जीत जाते हैं. तो फ़ॉर्म हाउस चार टुकड़ों में बंट जाता है. वहां रहने वाले बेटे की ज़िंदगी पटरी से उतर जाती है. वो भी साठ पैंसठ बरस की उम्र में.

इन मामलों के जानकार अमरीका के मार्टिन हलबर्ट कहते हैं कि उन्हें अक्सर ऐसा देखने को मिला है. भाई-बहनों के बीच संपत्ति का झगड़ा इतना कड़वा होता है कि मामला कोर्ट पहुंचता है. उनमें आपस में बातचीत बंद हो जाती है. सब एक दूसरे को लालची कहते हैं. मारा जाता है वो लड़का जिसने अपनी ज़िंदगी के चालीस बरस मां-बाप की सेवा में गुज़ारे होते हैं.

किसी वसीयत को चुनौती देना बड़ा क़ानूनी मसला है. इससे बचा जा सकता है अगर हर परिवार में आगे चलकर होने वाले संपत्ति के विवाद को टालने पर चर्चा पहले से हो जाए. इसके रास्ते निकालने पर खुलकर बात हो जाए.

अदालत

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भारत में तो पारिवारिक संपत्ति का बंटवारा बुरी बात मानी जाती ही है. अमरीका में भी तीन-चौथाई परिवार संपत्ति के बंटवारे पर चर्चा नहीं करना चाहते. वहीं ब्रिटेन में क़रीब एक-चौथाई लोगों ने अपने मां-बाप की वसीयत पर ऐतराज़ जताया. यही विवाद आगे चलकर बड़े झगड़ों का रूप ले लेते हैं.

अगर आप किसी वसीयत को चुनौती देने की तैयारी में हैं तो कुछ बातों का ख़याल रखकर आप बड़ी मुसीबत से बच सकते हैं.

पहली बात तो ये कि आपके पास वसीयत पर सवाल उठाने की ठोस वजह होनी चाहिए. इसमें लंबा वक़्त लगता है. इसके लिए भी आपको दिमाग़ी तौर पर तैयार रहना चाहिए. वक़ील और अदालत के ख़र्चों का हिसाब भी पहले से लगा लें तो आपके लिए बेहतर होगा.

फिर, आपको अपने ही क़रीबी लोगों के ख़िलाफ़ जाना होगा. इस बात को लेकर ख़ुद को अच्छे से तैयार कर लें. जानकार कहते हैं कि वसीयत को चुनौती देने का मतलब, है दिल-दिमाग़ पर बोझ बढ़ाना. अगर आप इसके लिए तैयार हैं तो ही आगे क़दम बढ़ाइए.

सबसे पहले तो ये समझना होगा कि आप जिस संपत्ति पर दावा ठोकने जा रहे हैं उसके आप वाक़ई हक़दार या वारिस हैं कि नहीं. अलग-अलग देशों में इनके अलग क़ानून होते हैं. वसीयत न होने की सूरत में यही क़ानून लागू होते हैं कि आख़िर संपत्ति के वारिस कौन होंगे, किसका कितना हक़ होगा.

अब आप परिवार के सदस्य नहीं, दोस्त या रिश्तेदार हैं तो आपका किसी दूसरे कि संपत्ति पर कोई हक़ नहीं होगा. दोस्त होने की सूरत में ख़ुद को वारिस साबित करना बड़ी टेढ़ी खीर होती है.

अनिल अंबानी

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किसी के मरने के बाद उसकी संपत्ति पर दावा ठोकने की एक क़ानूनी मियाद होती है. ये अलग-अलग देशों में अलग अलग होती है. इसके बारे में आपको पता होना चाहिए. वरना जब तक आप अदालत जाएंगे ये मियाद ख़त्म हो चुकी होगी. आपका वक़्त और पैसे दोनों ही बर्बाद होंगे.

जैसे कि ब्रिटेन में इसके लिए क़ानून छह महीने की पाबंदी लगाता है. वहीं अमरीका के कई राज्यों में ये मियाद दो साल तक है. आपको सरकारी वक़ील बता सकता है कि किसी वसीयत को कब तक चुनौती दी जा सकती है.

किसी वसीयत पर दुखी होना या ग़ुस्सा होना ही काफ़ी नहीं. अगर आपको लगता है कि आपसे बेईमानी हुई है. धोखा हुआ है. तो आपको ज़रूर उस पर क़ानूनी सवाल खड़े करने चाहिए. आपको वसीयत पर सवाल उठाना है तो उसकी ठोस वजहें होनी चाहिए.

मसलन ये कि मरने वाला दिमाग़ी तौर पर इस हालत में ही नहीं था कि वसीयत लिख सके. या फिर उसने किसी दबाव में ऐसी वसीयत तैयार की. इसे सही साबित करने की ज़िम्मेदारी भी आपकी ही होगी.

कई बार वसीयतों में ये भी लिखा होता है कि इसे चुनौती देने वाले को संपत्ति में से कोई हिस्सा नहीं मिलेगा. अमरीका के कई राज्यों में ऐसा होता है. तो वसीयत को चुनौती देने का मतलब आप हर हक़ से हाथ धो बैठेंगे. हालांकि अगर वसीयत में आपके हिस्से कुछ आया ही नहीं तो इसे चुनौती देने में नुक़सान ही कैसा, आपके हाथ तो वैसे भी कुछ नहीं आने वाला था.

माइकल जैकसन

अगर आप वसीयत को ग़लत साबित करने में कामयाब रहते हैं तो, उससे पहले की कोई वसीयत सही मानी जाएगी, अगर वो होगी तो. अगर ऐसा नहीं है तो स्थानीय क़ानूनों के हिसाब से संपत्ति का बंटवारा होगा. आम तौर पर मरने वाले की पत्नी या पति, फिर बच्चों का हक़ संपत्ति पर माना जाता है.

कोर्ट जाने से पहले नफ़े-नुक़सान का हिसाब ज़रूर लगा लें. कई बार अदालती ख़र्च में ही इतना पैसा बर्बाद हो जाता है जितना संपत्ति से मिलने वाला होता है. तो ये बात पहले से जान लें कि क़ानूनी लड़ाई से आपको कुछ फ़ायदा होगा या नहीं.

वसीयत को चुनौती देने का मतलब आप अपने भाई-बहनों या रिश्तेदारों से क़ानूनी लड़ाई लड़ेंगे. इससे आपके और उनके रिश्ते हमेशा के लिए ख़त्म हो सकते हैं. आपको ये समझ लेना होगा कि क्या आप ये झटका बर्दाश्त करने को तैयार हैं? अगर हां, तो ही आगे बढ़े. वरना बेहतर होगा कि शांत रहें.

मुक़दमा लड़ने के लिए सही वक़ील का चुनाव करना भी ज़रूरी है. इसके लिए इन मामलों के जानकार वक़ील को ही चुनें. किसी भी ऐरे-गैरे को नहीं.

मुक़दमा ठोकने से पहले अपने परिवार के लोगों,रिश्तेदारों से बात कर लें. शायद बात करने से बात बन जाए. अदालत जाने की नौबत ही न आए.

कई बार जो बच्चे सोचते हैं वैसी मां-बाप की सोच नहीं होती. ऐसे में भावुकता के बजाय सच्चाई का सामना करना बेहतर होगा. भावुक होकर पैसे के मसलों को नहीं सुलझाया जा सकता.

अदालत

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बेहतर होगा कि अपने मां-बाप की राय का सम्मान करें और अगर उन्होंने अपनी संपत्ति में आपको वारिस नहीं बनाया तो आप ज़बरदस्ती उसके हक़दार नहीं बन सकते.

इन बातों का ख़याल करके ही संपत्ति के विवाद को कोर्ट ले जाएं.

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