सरकार में घुसने की तालिबान की कोशिश

- Author, माजिद नुसरत
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
तीन पूर्व तालिबान अधिकारियों की टीवी स्टेशनों पर बढ़ी गतिविधियों से लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान में संगठन की अनाधिकारिक राजनीतिक गतिविधि फिर से अपना पैर पसार रही है.
हालांकि तीनों वर्तमान तालिबान नेतृत्व से संबंध होने से इनकार करते हैं लेकिन उनकी मीडिया गतिविधियां एक तरह से संयोजित लगती हैं तीनों ही एक दिशा में बात करते हैं.
ऐसा लगता है कि ये तीनों क्वेटा शुरा के नेतृत्व में काम करने वाली नई राजनीतिक शाखा और प्रचार दल के रूप में काम कर रहे हैं और इनका काम वह संदेश फैलाना है जो तालिबान आधिकारिक रूप से प्रसारित नहीं कर सकता.
अभी तक उनकी बातचीत की दिशा वर्तमान अंतरराष्ट्रीय शांति प्रक्रिया की आलोचना करना है जिससे तालिबान को बाहर रखा गया है. वह इस बात का भी विशेष रूप से उल्लेख कर रहे हैं कि अगर सीधी बातचीत होती है तो तालिबान समझौता करने को तैयार दिख रहा है.

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इनमें से दो लोग पहले तालिबान में महत्वपूर्ण भूमिका में रहे हैं.
मुल्ला अब्दुल सलाम ज़ईफ़ पूर्व तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर के विश्वासपात्र थे और न्यूयॉर्क में 9/11 को हमले के समय संगठन के पाकिस्तान में प्रतिनिधि थे. 2005 में गुआंतोनामो जेल से रिहा होने के बाद ज़ईफ़ सार्वजनिक रूप से काबुल में रह रहे थे लेकिन अप्रैल, 2012 में बेनाम समूहों पर प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए संयुक्त अरब अमीरात चले गए थे.
नज़र मोहम्मद मुतमईन को मुल्ला उमर के प्रवक्ता रहे और अब संगठन के नए नेता मुल्ला अख़्तर मंसूर के वरिष्ठ सहयोगी के रूप में काम कर रहे अब्दुल हई मुतमईन का भाई बताया जाता है.
इस गुट में तीसरा व्यक्ति वाहीद मॉज़दा तालिबान के राजनीतिक सलाहकार है. अफ़गान गुप्तचर संस्था ने 2013 में हक़्क़ानी नेटवर्क के नेता और मॉज़दा की एक फ़ोन वार्ता लीक की थी जिसमें मॉज़दा तालिबान के नेतृत्व, क्वेटा शुरा, को सलाह दे रहे थे कि उसे अफ़ग़ानिस्तान के साथ अमरीकी सुरक्षआ अनुबंध पर किस तरह प्रतिक्रिया देनी चाहिए.

काबुल स्थित टीवी चैनलों पर नियमित रूप से देखने के अलावा इन लोगों की टिप्पणियां लगातार www.nunn.asia वेबसाइट पर छापी जाती हैं. इसके अलावा नुन.एशिया1 के फ़ेसबुक पेज (https://www.facebook.com/nunn.asia1/?fref=ts) और ट्विटर पेज (https://twitter.com/nunnasia) पर भी यह नज़र आते हैं जो तालिबान के अनाधिकारिक मीडिया स्रोत के रूप में काम करते हैं.
इस तिकड़ी की मीडिया गतिविधियां बताती हैं कि तालिबान को डर है कि अफ़ग़ानिस्तान, चीन, पाकिस्तान और अमरीका वाला चार पक्षों का (क्वाड्रिलेटरल कोओर्डिनेशन ग्रुप- क्यूसीजी) समूह उसे दरकिनार कर देगा. क्यूसीजी शांति और सामंजस्य के लिए एक रोडमैप तैयार करने पर काम कर रहा है.
ये तीनों लोग तालिबान की उसी राय को बढ़ावा देते हैं जिसमें क्यूसीजी प्रक्रिया की तुलना 1988 के जिनीवा समझौते से की जाती है, जिस पर सोवियत संघ, अमरीका, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान ने हस्ताक्षर किए थे.
इस समझौते से अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ के नौ साल के कब्ज़े का अंत तो हो गया था लेकिन इसमें सोवियत विरोधी मुजाहिदीन लड़ाकों को बाहर रखा गया था. तालिबान का कहना है कि इस समझौते से अमरीका और पाकिस्तान के ही हित सधे और इसी की वजह से बाद में अफ़ग़ानिस्तान में गृह युद्ध शुरू हुआ.

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ये तिकड़ी क्यूसीजी वार्ताओं से तालिबान को बाहर रखने की आलोचना करती है और अफ़ग़ान सरकार पर आरोप लगाती है कि वह तालिबान को अंतरराष्ट्रीय रूप से पाकिस्तान के एजेंट के रूप में प्रचारित करती है जो इस्लामाबाद के ज़रिए शांति लाना चाहता है.
ज़ईफ़ ने 2 मार्च को एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में शमशाद टीवी से कहा, "इसमें कोई सच्चाई नहीं है."
इस समूह का कहना है कि तालिबान के साथ अमरीका और अफ़ग़ानिस्तान सरकार की सीधी वार्ता या क्यूसीजी वार्ता में तालिबान को शामिल किए बिना तालिबान नेताओं और लड़ाकों का विश्वास नहीं जीता जा सकता.
मुतमईन ने ज़वानदन टीवी पर 18 जनवरी को हुई एक बहस के दौरान पूछा, "जब पाकिस्तान ने जिनीवा वार्ता के दौरान मुजाहिदीन का पक्ष रखा, तब क्या शांति आई?"

यह गुट संकेत देता है कि तालिबान एक अंतरिम सरकार के पक्ष में हैं लेकिन ज़ोर देकर कहता है कि ऐसा सिर्फ़ उनके क़तर स्थित ऑफ़िस में अफ़ग़ानिस्तान के सभी पक्षों से चर्चा के बाद ही हो सकता है.
ज़ईफ़ ने www.nunn.asia में 24 फ़रवरी को छपे एक इंटरव्यू में कहा, "मुझे लगता है कि अगर कोई अंतरिम सरकार बनती है तो यह निष्पक्ष होनी चाहिए और इस पर दोनों पक्षों को राज़ी होना चाहिए."
"एक अन्य विकल्प सभी पक्षों को मिलाकर मतैक्य से एक सरकार बनाना है, जिसमें तालिबान भी शामिल हो."
आमतौर पर तालिबान की काबुल टीम इस संगठन को राजनीतिक रूप से ज़्यादा परिपक्व, लचीला और दूसरों के मुकाबले शांति ज़्यादा चाहने वालों के रूप में पेश करती है.
वे लोग यह भी संकेत देते हैं कि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सेना की थोड़ी मौजूदगी पर भी तैयार हो सकता है - इस संभावना को संगठन के बयानों में स्पष्ट रूप से ख़ारिज किया जाता रहा है.

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संगठन के रुख़ में नरमी कुछ तो इस वजह से भी हो सकती है कि वह यह मान गया है कि पश्चिमी देश, चीन, रूस और भारत अफ़ग़ान सरकार को यूं ही नहीं छोड़ देंगे.
मुतमईन ने 6 मार्च को काबुल न्यूज़ से कहा, "तालिबान ने अपनी मांगों को कम कर दिया है. पहले वह बिना शर्त वापसी की मांग करते थे लेकिन अब वह इसके लिए एक समयबद्ध कार्यक्रम की बात कर रहे हैं."
ज़ईफ़ यह भी स्वीकार करते हैं कि अमरीका आसानी से जाने वाला नहीं है.
www.nunn.asia में 24 फ़रवरी के इंटरव्यू में कहा था, "हो सकता है कि वह अपनी सैन्य उपस्थिति को घटा दें लेकिन इलाक़े में अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों को वह किसी भी क़ीमत पर नहीं छोड़ेंगे."
समझौता करने के लिए तैयार होने के एक और संकेत के रूप में मुतमईन ने तालिबान के कमांडरों-लड़ाकों को चेतावनी दी है कि सैन्य बढ़त के बावजूद हो सकता है कि समय उनके साथ न हो.

मुतमईन ने www.nunn.asia से 15 मार्च को कहा, "तालिबान को यह समझना चाहिए कि जंग जारी रहने में अमरीका का फ़ायदा है. इसलिए उन्हें शांति की दिशा में बढ़ना ही चाहिए."
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