आपकी पर्सनल टेंशन भी है बॉस का सिरदर्द

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- Author, चाना आर स्कोनबर्गर
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
अक्सर लोग एक दूसरे को मशविरा देते हैं कि निजी ज़िंदगी और दफ़्तर के काम को अलग रखें.
निजी ज़िंदगी की दुश्वारियों का असर, हमारे काम पर नहीं पड़ना चाहिए. और काम की फ़िक्र, घरेलू ज़िंदगी पर हावी नहीं होनी चाहिए.
मगर, कई बार हम ऐसे हालात से दो-चार होते हैं, जब हमारे सहयोगी निजी ज़िंदगी की दिक़्क़तों से परेशान होते हैं और उनकी इस परेशानी का काम पर असर साफ़ दिखने लगता है.
ख़ास तौर से जो टीम लीडर होते हैं, बॉस होते हैं, उनके लिए ये फ़िक्र की बात है कि उनकी टीम के लोग निजी ज़िंदगी की किसी दिक़्क़त के चलते अच्छे से काम नहीं कर पा रहे. इसका असर पूरी टीम के परफॉर्मेंस पर पड़ता है.
तो, अगर ऐसा हो कि आपकी टीम की कोई सदस्य, ऐसी परेशानी से जूझ रहा या रही हो, तो किसी बॉस को क्या करना चाहिए?
पहले तो ये जान लें कि इस मामले के तीन पहलू हैं. एक तो यह कि आपका सहयोगी बहुत बुरे दौर से गुज़र रहा है. दूसरा यह कि इसका असर उसके काम पर पड़ रहा है.
और, तीसरा सबसे अहम पहलू यह कि वो इस मुश्किल वक़्त में दफ़्तर में किसी से मदद भी नहीं मांग पा रहा.
तीसरा पहलू किसी भी बॉस के लिए बेहद चिंता का विषय है. यह किसी भी संस्थान के माहौल की बहुत ख़राब तस्वीर दिखाता है.
यानी आपके दफ़्तर का माहौल ऐसा है कि लोग ज़िंदगी की दिक़्क़तों के बारे में एक-दूसरे से बात करने से कतराते हैं.

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इसका सीधा मतलब यह है कि आपने लोगों को ये संदेश दिया है कि वो निजी और ऑफ़िस की ज़िंदगी को बिल्कुल अलग रखें.
आपको करना यह चाहिए कि आप बेहद अंतरंग और गोपनीय बातों की दफ़्तर में चर्चा करने से रोकें.
शिकागो यूनिवर्सिटी के बूथ स्कूल ऑफ़ बिज़नेस के जॉन पॉल रॉलर्ट कहते हैं कि लोगों को अंतरंग बातें, दफ़्तर में करने से रोका जाना चाहिए, न कि निजी ज़िंदगी की हर परेशानी छिपाने को बढ़ावा देना चाहिए.
जैसे बच्चे को टीका लगवाने में आ रही दिक़्क़त, या सोसाइटी की परेशानी. ये वो मसले हैं जिन पर दफ़्तर में चर्चा से कोई नुक़सान नहीं.
तो, अगर किसी बॉस को दिखता है कि उसकी टीम का सदस्य निजी ज़िंदगी की परेशानी से जूझ रहा है तो सबसे पहले उसे अपनी कंपनी के नियम क़ायदों के बारे में पता करना चाहिए.
एचआर टीम से बात करके तय करना चाहिए कि उस टीम के सदस्य की कैसे मदद की जा सकती है.
फिर इस तरीक़े से उस परेशान कर्मचारी से बात करनी चाहिए, जिससे ये न लगे कि आप उसकी निजी ज़िंदगी में दखल दे रहे हैं. थो़ड़ा वक़्त निकालकर उससे अकेले में बात करें.
उसे ये जताएं कि आप उसकी मदद करना चाहते हैं. अपनी परेशानियों के बारे में वो जो भी बताए, उसे ध्यान से सुनें. फिर उसको ये बताएं कि यह उसके लिए तकलीफ़देह है और कंपनी के लिए नुक़सानदेह.
रॉलर्ट सलाह देते हैं कि आप 'थ्री सी' के फ़ॉर्मूले पर अमल करें. आप ये जताएं कि आपको अपने उस सहयोगी की परवाह है. फिर आप ईमानदारी से उसकी परेशानी सुनें और उसको ये भी बताएं कि उसके बर्ताव का असर, टीम के परफ़ॉरमेंस पर पड़ रहा है. तीसरा यह कि सारी बातचीत पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी.
आप अपने उस सहयोगी को पूरी बात बताने के लिए मजबूर नहीं कर सकते, जो वह नहीं बताना चाहती या चाहता.

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लेकिन, मिसाल देकर उसको ये बताएं कि वो अगर किसी उलझन में है तो इससे टीम के काम पर किस तरह असर पड़ा.
कई बार होता यह है कि लोगों को अहसास नहीं होता कि अगर वो परेशान हैं तो इससे टीम को किस तरह नुक़सान हो रहा है. अक्सर परेशान लोग अपनी आंखों पर पट्टी सी बांध लेते हैं. मुसीबतज़दा लोगों का ये बर्ताव आम है.
उससे बात करने के बाद अगर आपके पास उसके मसले का हल है तो सुझाएं. उसको यह बताएं कि आप ऑफ़िस की ज़िम्मेदारियां घटाकर उसकी मदद कर सकते हैं.
उसको किसी स्पेशलिस्ट की मदद दिला सकते हैं तो वह भी बताएं. कंपनी की तरफ़ से उसे क्या मदद मिल सकती है, इसकी भी उसे जानकारी दें.
जानकार कहते हैं कि आपको अपने सहयोगी से ये बातें वक़्त रहते कर लेनी चाहिए. इसमें देर नहीं करनी चाहिए, वरना हालात बेक़ाबू हो सकते हैं.
ये टीम लीडर के तौर पर आपकी बहुत बुरी छवि पेश करेगा. कंपनी की बदनामी होगी, सो अलग.
(अंग्रेज़ी में मूल <link type="page"><caption> लेख यहां</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20160322-when-personal-and-professional-lives-collide" platform="highweb"/></link> पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)
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