ईरान चुनाव के पांच अहम सवाल

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ईरान में 26 फरवरी से चुनाव हो रहे हैं. ये चुनाव नई संसद और देश की शीर्ष धार्मिक संस्था मज़लिसे ख़ोबरे-गान को चुनने के लिए हो रहे हैं. ये संस्था ईरान के सुप्रीम लीडर को चुनती है.

ईरान में परमाणु सौदा होने और पाबंदियां हटने के बाद पहली बार चुनाव हो रहे हैं. इससे आवाम के मिजाज़ और देश की दिशा का अंदाज़ा लगने वाला है.

290 सांसद और 6000 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. चुनाव में कोई राजनीतिक दल नहीं लेकिन सांसद जो भागों में बँटे हैं. कुछ सांसद उदारवादी एजेंडा के समर्थन में हैं तो कुछ ख़िलाफ़.

चूंकि राष्ट्रपति हसन रुहानी ने पिछले साल जुलाई में परमाणु सौदे पर हस्ताक्षर किए हैं, इसलिए इन दो कैंपों के बीच संघर्ष बढ़ गया है.

कट्टरवादी धड़ा हसन रुहानी की विदेश नीति और देश में राजनीतिक सुधारों का विरोध कर रहा है.

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सभी कैबिनेट नियुक्तियों और नए क़ानून पर सांसदों की सहमति ज़रूरी है. इसलिए राष्ट्रपति को संसद के साथ रिश्ते बेहतर बनाने की ज़रूरत है ताकि संसद की कार्रवाई सुचारू रूप से चल पाए.

राष्ट्रपति रुहानी को अब लंबे समय से ठप पड़े आर्थिक सुधार शुरू करने और 2017 में फिर से चुनाव कराने का समर्थन पाने के लिए सांसदों के साथ की ज़रूरत होगी.

यह ईरान की शीर्ष धार्मिक संस्था है और देश के सुप्रीम लीडर का चुनाव करती है.

यह एसेंबली आठ सालों के लिए चुनी जाती है इसलिए ईरान की राजनीति में इसका प्रभाव संसद से ज़्यादा होता है.

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76 साल के अयातुल्लाह अली खुमैनी फिलहाल इसके नेता हैं और बीमार हैं. इसलिए संभव है कि अगली विशेषज्ञों की एसेंबली अपना उत्तराधिकारी चुनेगी. यह इस साल के चुनाव का प्रमुख हिस्सा होगा.

161 उम्मीदवार एसेंबली की 88 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं, जिसमें कट्टरपंथी धड़े का दबदबा है. संसद में कट्टरपंथियों और उदारवादियों में ज़बर्दस्त प्रतिस्पर्धा है.

कई उदारवादी रेस से बाहर हो चुके हैं. इसमें हसन खुमैनी का नाम भी शामिल है, जो इस्लामी गणराज्य की स्थापना करने वाले अयातुल्लाह खुमैनी के पोते हैं.

राष्ट्रपति रुहानी और पूर्व राष्ट्रपति अकबर हाशमी रफ़संजानी फिर से चुनाव में हैं. ये ज़्यादा से ज्यादा उदारवादियों को अपने पक्ष में करना चाहते हैं ताकि एसेंबली में कट्टरपंथियों का दबदबा कम किया जा सके.

  • अर्थव्यवस्था

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ईरान आर्थिक मंदी से गुज़र रहा है. प्रतिबंध हटने के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव की ज़रूरत है.

इसके लिए राष्ट्रपति और सरकार को संसद के साथ मिलकर आम आदमी की अपेक्षाएं पूरी करनी होंगी.

इसके लिए बड़े पैमाने पर बदलाव करने होंगे जिससे फ़ायदे के साथ-साथ कुछ समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं.

  • राजनीति

ईरान की राजनीति में उदारवादियों और पुरातनपंथियों में हमेशा से टकराव रहा है पर अब पुरातनपंथी कट्टरपंथ और कट्टरपंथियों के व्यावहारिक गुटों में बंट गए हैं.

वहीं कई उदारवादी अब व्यावहारिक मध्य मार्ग की ओर चले गए हैं.

विश्लेषकों के मुताबिक़ अब यह कहना मुश्किल है कि कौन किसे वोट देगा और खुद सांसद चुने जाने के बाद अहम मुद्दों पर वो किसका साथ देंगे.

  • स्थानीय बनाम बाहरी मुद्दा

संसद में अक्सर बड़े मुद्दों पर बात होती है जबकि अवाम स्थानीय मुद्दों पर वोट देती है.

इसलिए जो सांसद स्थानीय समस्याओं से निपटने का वादा करते हैं उन्हें जनता का बड़ा समर्थन मिल सकता है.

  • चुनाव की गंभीरता

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अब तक चुनाव प्रचार भले महत्वपूर्ण न रहा हो पर अब ये हालात बदल सकते हैं.

करीब साढ़े पांच करोड़ लोग ईरान में वोट देने योग्य हैं. ज़्यादातर ईरानी वोटर चुनाव को व्यवस्था प्रभावित करने के मौक़े के रूप में देखते हैं.

यह परमाणु सौदे के संदर्भ में ख़ासतौर पर सच रहा, जब 2013 में चुनाव जीतकर राष्ट्रपति रुहानी ने सुधारवादी नीतियां जारी रखने का वादा किया और इस पर उन्हें युवाओं का साथ मिला.

तब निष्पक्ष चुनाव की उम्मीदों को झटका लगा था जब देश के शीर्ष चुनाव निकाय ने 6000 उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया था. इसमें अधिकतर सुधारवादी और उदारवादी कैंप के थे.

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बाद में 1500 उम्मीदवारों को भारी विरोध के बाद फिर से चुनाव लड़ने की इजाज़त दे दी गई.

नौजवान वोटरों को अक्सर यह शिकायत रहती है कि उनके पास अब भी बहुत कम विकल्प हैं और सोशल मीडिया इसे लेकर खूब बहस हो रही है कि किसे वोट दें या किसे वोट न दें.

बीबीसी फारसी की सोशल मीडिया टीम के मुताबिक़ हाल में एक नया हैशटैग कंपेन #ImVoting खूब फैल रहा है.

  • अहम तारीखें

प्रचार अभियान 25 फरवरी को आठ बजे शाम तक चला. शुक्रवार शाम छह बजे तक मतदान होगा.

विशेषज्ञों की एसेंबली का परिणाम दो दिनों में आ जाएगा. संसद के लिए चुनाव संभव है कि दूसरे चरण में हो. उम्मीदवारों को जीतने के लिए कम से कम 25 फ़ीसदी वोट चाहिए जो ज़्यादा उम्मीदवारों की स्थिति में पाना मुश्किल होता है.

एसेंबली के परिणाम के तुरंत बाद प्रारंभिक परिणाम सार्वजनिक कर दिए जाएंगे और निर्णायक दौर अप्रैल में होगा.

(यह रिपोर्ट बीबीसी फारसी के राना रहीमपूर, हुसैन बसतानी, गोलनूस गोलशानी और जेनी नॉर्टन ने तैयार की है.)

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