जापानः अर्थव्यवस्था की सुस्ती जारी

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जापान की आर्थिक सुस्ती चौथे तिमाही में भी जारी रही.
2015 की अंतिम तिमाही में अर्थव्यवस्था की रफ़्तार धीमी दर्ज की गई. इसे सरकार की अर्थिक सुधार की नीतियों के नाकाम होने का एक और प्रमाण माना जा रहा है.
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ इससे पहले की तिमाही की तुलना में, अक्तूबर और दिसंबर के बीच विकास की दर 0.4 फ़ीसदी कम रही.
इसके पीछे गिरती हुई घरेलू मांग और हाउसिंग में धीमे निवेश को बड़ा कारण माना जा रहा है.
जापान की अर्थव्यवस्था बीते दो दशक से अवस्फीति (ऐसे हालात जब महंगाई दर गिरती चली जाती है) से जूझ रही है और तमाम कोशिशों के बावजूद इसे रफ़्तार नहीं मिल पा रही है.

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अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने दिसंबर 2013 में चुनाव जीतने के बाद एक ख़ास योजना, जिसे आबेनॉमिक्स कहा जाता है, शुरू कर दी थी.
इसका मूल मक़सद अर्थव्यवस्था की सुस्ती से निपटना और मांग और निवेश को बढ़ावा देना था.
लेकिन दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए उसके बाद भी समस्याएं कम नहीं हुईं.
सितंबर तिमाही में वैश्विक वित्तीय संकट के कारण फिर से यानी चौथी बार मंदी के गिरफ़्त में है.

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अभी बीते सप्ताह ही वैश्विक बाज़ार में उथल पुथल और डॉलर के मुक़ाबले येन के मज़बूत होने से बड़े निर्यातकों को ज़बरदस्त नुक़सान पहुंचा जिससे निकेई 225 में 5.4 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी.
हालांकि जापान केंद्रीय बैंक ने जनवरी में आर्थिक धीमेपन को दूर करने का नया तरीक़ा शुरू किया है.
जापान का कोई वाणिज्यिक बैंक अब यदि केंद्रीय बैंक में पैसा जमा करता है तो केंद्रीय बैंक इसके ऐवज़ में नकारात्मक दर से ब्याज वसूलेगा.

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वाणिज्यिक बैंकों की कुछ जमाओं पर बैंक ऑफ़ जापान -0.1 फ़ीसदी की दर से ब्याज वसूलेगा.
केंद्रीय बैंक का मानना है कि इससे वाणिज्यिक बैंक पैसे जमा रखने की बजाय अधिक से अधिक क़र्ज़ बाटेंगे. इससे देश को आर्थिक मंदी से बाहर निकलने में मदद मिलेगी.
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