सिलिकन वैली में भारतीयों का दबदबा क्यों?

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- Author, निक क्लेटन
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
अमरीका के एकतिहाई स्टार्ट-अप भारतीयों ने शुरू किए हैं. भारतीयों की कामयाबी ऐसी है कि अमरीका में सात अन्य देशों के आप्रवासी मिलकर भी इतने स्टार्ट अप लॉन्च नहीं कर पाए हैं.
अमरीका की सिलिकन वैली में कुल वर्कफोर्स का छह प्रतिशत भारतीय हैं लेकिन सिलिकन वैली के 15 फ़ीसदी स्टार्ट अप के कर्ताधर्ता भारतीय हैं.
स्टेनफर्ड और ड्यूक यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर विवेक वाधवा के अध्ययन से यह जानकारी मिली है.
इस अध्ययन के मुताबिक़ भारतीयों की सफलता के सामने अमरीका में स्टार्ट अप शुरू करने वाले ब्रिटेन, चीन, ताइवान और जापान के लोगों की मिली-जुली कामयाबी भी फीकी नज़र आती है.
सिलिकन वैली में सवाल पूछा जा रहा है कि भारतीय मूल के लोगों की अमरीका में इस कामयाबी का रहस्य क्या है?
बीते कुछ सालों में अमरीका में सूचना और तकनीक की दुनिया में भारतीयों का दबदबा ख़ासा बढ़ा है.

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दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट सर्च इंजन कंपनी गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई भारतीय मूल के हैं.
पहली बार कोई भारतीय गूगल में शीर्ष पद तक पहुंचा है, पर हक़ीकत यह है कि गूगल का तो शुरू से ही भारत से नाता रहा है.
1998 में स्टेनफर्ड यूनिवर्सिटी में सर्गेई ब्रिन और लैरी पेज ने अपने शिक्षक टैरी विनोग्रैड और राजीव मोटवानी के साथ गूगल की परिकल्पना विकसित की थी.
भारत में जन्मे और पले-बढ़े मोटवानी ने ही गूगल के पहले कर्मचारी क्रेग सिल्वरस्टीन को प्रशिक्षण दिया था.
मोटवानी और पिचाई दोनों इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नालॉजी (आईआईटी) से पढ़े थे.
वैसे केवल सुंदर पिचाई और मोटवानी ही नहीं, अमरीका की तकनीकी दुनिया में शीर्ष पर भारतीयों की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है.
2010 के जनसंख्या आंकड़ों के मुताबिक़, अमरीका में भारतीय समुदाय सबसे ज़्यादा औसत सालाना आमदनी वाला समूह है.

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अमरीका में रह रहे भारतीय साल में 86,135 डॉलर कमाते हैं जबकि अमरीका की औसत आय 51,914 डॉलर सालाना है.
हालांकि भारतीय समुदाय को यहां तक पहुँचने में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. अब पिचाई का ही उदाहरण देखिए.
चेन्नई के एक इंजीनियर के बेटे पिचाई जब अमरीका गए तो हवाई टिकट की क़ीमत उनके पिता के सालाना वेतन के बराबर थी.
पैसे की तंगी की वजह से वे छह महीने तक अपनी होने वाली पत्नी को फ़ोन नहीं कर पाए थे.
2004 में गूगल से जुड़ने से पहले पिचाई मैनेजमेंट कंसल्टेंट के बतौर मैकेंज़ी और माइक्रोप्रोसेसर सप्लायर एप्लायड मैटेरियल्स के साथ काम कर चुके थे.

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गूगल के सीईओ बनने से पहले पिचाई ने वेब ब्राउज़र गूगल क्रोम की स्थापना की थी.
दरअसल पिचाई जैसे भारतीयों के बढ़ते दबदबे की सबसे बड़ी वजह यही है कि अमरीकी सिलिकन वैली में शीर्ष स्तर पर जो कार्य-संस्कृति है उसमें बड़ा बदलाव आया है.
पहले के सीईओ काफ़ी अहम वाले, कर्मचारियों को आपस में भिड़ाकर और प्रतिस्पर्धी माहौल बनाकर उत्पादकता बढ़ाने में यक़ीन रखते थे.
अब प्रबंधन का अंदाज़ बदला है और टकराव को नज़रअंदाज़ कर, बेहतर काम करने का रास्ता अपनाने की संस्कृति में भारतीय सीईओ एकदम फ़िट बैठते हैं.
यही वजह है कि माइक्रोसॉफ़्ट ने सत्या नडेला को अपना सीईओ बनाया है.

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इसके अलावा जापान के टेलीकॉम मल्टीनेशनल सॉफ़्टबैंक ने निकेश अरोड़ा को अपना प्रेसीडेंट बनाया है.
एडोबी को शांतानु नारायण चला रहे हैं.
आईटी की बड़ी कंसल्टेंसी कंपनी कॉग्नीज़ेंट को फ्रांसिस्को डिसूज़ा लीड कर रहे हैं तो कंप्यूटर मेमरी की बड़ी कंपनी सैनडिस्क के मुखिया संजय मेहरोत्रा हैं.

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केवल टेक्नॉलाजी की बड़ी कंपनियों में ही भारतीयों का दबदबा नहीं बल्कि शराब कारोबार करने वाली सबसे बड़ी कंपनी डियाजियो के सीईओ इवान मेनज़ेस भी भारतीय मूल के हैं.
मास्टरकार्ड के बॉस अजय बंगा भी भारतीय हैं. पेप्सी की सीईओ इंद्रा नूयी टॉप तक पहुंचने वाली भारतीयों में शामिल हैं.
भारतीय को मिली कामयाबी की एक बड़ी वजह भारतीयों का अंग्रेज़ी जानना है. ब्रिटिश उपनिवेशवाद के चलते भारत में उच्चशिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम में उपलब्ध है. ऐसे भारतीय पेशेवरों को अलग से अंग्रेज़ी सीखने में मेहनत नहीं करनी पड़ती.

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सिलिकन वैली में नेटवर्किंग संस्था चला रहे द इंडस आंतरप्रेन्योर्स के अध्यक्ष वेंकटेश शुक्ला इसकी एक दूसरी वजह भी मानते हैं.
वे कहते हैं, "इनमें से ज़्यादातर लोग भारत से तब आए थे जब वहां सीमित अवसर थे. अमरीका की वीज़ा नीतियों के कारण सिर्फ़ बेहतरीन प्रतिभाएं ही यहां आ सकीं. तो यहां भारत के सबसे प्रतिभाशाली लोग मौजूद हैं."
इसके अलावा कुछ और पहलू हैं जिनके चलते भारतीय अच्छा कर रहे हैं. इनमें विविधता भी शामिल है.
वेंकटेश शुक्ला कहते हैं, "अगर आप भारत में पले-बढ़े हों तो विविधरंगी समाज आपके लिए कोई नई बात नहीं होती. आप जानते हैं कि लोग अलग-अलग तरह के होते हैं. ज़रूरी नहीं कि आपसे बेहतर या कमतर. सिलिकन वैली में ज़्यादा राजस्व और बेहतर उत्पाद की बात होती है. आप कैसे दिखते हैं और क्या बोलते हैं, इसका कोई मतलब नहीं होता."
कल्चरल डीएनए-साइकॉलोजी ऑफ़ ग्लोबलाइज़ेशन किताब के लेखक गुरनेक बैंस कहते हैं, "भारतीयों के दिमाग़ में विविधता की यह समझ समाई हुई है. इसके लिए भारतीय परंपरा में अनेक देवी-देवताओं का होना, विविध उत्पाद, विविध वास्तविकता और विविधरंगी नज़रिए का होना ज़िम्मेदार हैं."

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बैंस कहते हैं, "इसके चलते भारतीय तेज़ी से बदलती आईटी की दुनिया की चुनौतियों को संभालने में सक्षम हैं."
बैंस की फ़र्म 200 से ज़्यादा सीईओ के कामकाज का आकलन कर चुकी है और उनके मुताबिक़ अमरीकियों की सोच है कि भारतीय जिस तरह काम करते हैं वह सही तरीका है और अमरीका में यही चलता है.
तमाम गुणों के बावजूद भारतीयों में एक बड़ी खामी भी है. बैंस के अध्ययन के मुताबिक़, "भारतीय टीम वर्क में सबसे कमज़ोर हैं." इस पहलू में अमरीकी और यूरोपीय सबसे बेहतर हैं.
हालांकि जो भारतीय लंबे समय से बाहर रहे हैं, वो टीम वर्क के गुर भी सीख गए हैं.
विवेक वाधवा कहते हैं, "भारत के बच्चे माइक्रोसॉफ़्ट और गूगल का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं और वे इन कंपनियों के भारतीय सीईओ को भी देख रहे हैं. यह काफ़ी प्रेरक है."
वाधवा के मुताबिक़ भारतीय पेशेवरों को अब अपनी क्षमता दिखाने के लिए अमरीका जाने की बाध्यता भी नहीं है क्योंकि भारत सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है.
वाधवा कहते हैं, "अगले तीन से पांच साल के बीच भारत में क़रीब 50 करोड़ की आबादी स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल करने लगेगी. भारत में तकनीकी क्रांति आएगी और वहां कई अरबों डॉलर वाली कंपनियां विकसित होती दिखेंगी. अब अवसर भारत में ही मौजूद हैं."
<italic><bold>अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20150909-google-and-beyond-the-new-silicon-valley-kingpins" platform="highweb"/></link> यहाँ पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.</bold></italic>
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