भारत आने वाली गैस परियोजना को तालिबान का समर्थन

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- Author, माजिद नुसरत
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते तुर्कमेनिस्तान से भारत तक पहुंचने वाली गैस पाइप लाइन परियोजना का अफ़ग़ान तालिबान ने समर्थन किया है.
इंटरनेट पर अफ़ग़ान तालिबान की कई पोस्टों में इस परियोजना के फ़ायदों का ज़िक्र किया गया है, जिस पर हाल ही में काम शुरू हुआ है.
लगता है कि तालिबान इस परियोजना में रोड़े नहीं अटका सकता है और इसी बात को छिपाने के लिए वो इसका समर्थन कर रहा है. ख़ासकर इस परियोजना को पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त है जो कथित रूप से अफ़ग़ान तालिबान का समर्थक माना जाता है.
हालांकि तालिबान की आधिकारिक वेबसाइट पर अभी इस परियोजना के फ़ायदों, जटिलताओं और अफ़ग़ानिस्तान और उसके ऊपर पड़ने वाले असर पर कुछ भी नहीं कहा गया है.
लेकिन तालिबान की अनाधिकारिक वेबसाइट और इसके फ़ेसबुक पेज पर परियोजना के समर्थन में दर्जनों लेख, साक्षात्कार और रिपोर्टें पोस्ट की गई हैं.

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इन सभी पोस्टों में तालिबान ने इस बात को लेकर ख़ुशी ज़ाहिर की है कि उसने ही पहली बार 1990 के दशक में अपने शासन के दौरान इस परियोजना को बढ़ावा दिया था.
वेबसाइट पर 'पैट्रियोटिक स्टूडेंट्स' नाम के एक छात्र समूह की ओर से परियोजना के समर्थन में जारी बयान को भी पोस्ट किया गया है.
10 अरब डॉलर की लागत वाली तुर्कमेनिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान-भारत (तापी) गैस पाइपलाइन परियोजना पर 13 दिसंबर से आधिकारिक रूप से काम शुरू कर दिया गया.
उम्मीद है कि 2019 में इस परियोजना के पूरा होने पर तुर्कमेनिस्तान से प्राकृतिक गैस की सप्लाई अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान-भारत को भेजी जा सकेगी.
अफ़ग़ानिस्तान को इस परियोजना से पारगमन शुल्क के रूप में सालाना 40 करोड़ अमरीकी डॉलर का फ़ायदा होने की उम्मीद है.
इसके अलावा, उसे घरेलू इस्तेमाल के लिए सस्ती दर पर गैस भी उपलब्ध होगी.

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2015 में पश्चिमी ताक़तों के अफ़ग़ानिस्तान से हटने के बावजूद तालिबान को लगता है कि तापी और इस जैसी दूसरी परियोजनाओं से फ़ायदा उठाया जाए, ताकि इस क्षेत्र के देशों की उसके प्रति नकारात्मक प्रतिद्वंद्विता, आख़िरकार आर्थिक सहयोग में बदल जाए.
अफ़ग़ानिस्तान से होकर गुज़रने वाली दूसरी परियोजना कासा 1000 है. इसके तहत उम्मीद है कि मध्य एशिया से अतिरिक्त बिजली दक्षिण एशिया में सप्लाई की जाएगी, ख़ासकर बिजली की भारी क़िल्लत से जूझ रहे पाकिस्तान को.
मामले की नज़ाकत को समझते हुए तालिबान धीरे-धीरे इस क्षेत्र की उभरती हुई सच्चाई के साथ क़दमताल मिलाने की कोशिश कर रहा है.
ऐसा लगता है कि वो भविष्य में तापी से जुड़ी जलिटताओं को देखते हुए, अपनी तैयारी कर रहा है.
उदाहरण के लिए वो दावा कर रहा है कि उसने ही 1990 के दशक में इस परियोजना की शुरुआत की थी.

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इस हफ़्ते तापी पर आए एक लेख में कहा गया है, "हालांकि तापी परियोजना का बड़ा हिस्सा तालिबान नियंत्रण वाले क्षेत्र से होकर गुज़रता है लेकिन उनकी ओर से इसके विरोध की संभावना नज़र नहीं आ रही है. क्योंकि परियोजना तालिबान सरकार के दिमाग़ की उपज थी."
यह लेख एक <link type="page"><caption> वेबसाइट</caption><url href="www.nunn.asia" platform="highweb"/></link> और इसके फ़ेसबुक पेज पर आया है. इस वेबसाइट का तालिबान के साथ नज़दीकी संबंध बताया जाता है.
'पैट्रियोटिक स्टूडेंट्स' ने कहा है, "इस ऐतिहासिक परियोजना की सफलता का मतलब अफ़ग़ानिस्तान की शोषित जनता की समृद्धि और सफलता है."
इसमें कहा गया है, "इसलिए देश के सभी राजनीतिक दलों, राष्ट्रीय एकता की सरकार और हथियारबंद तालिबान का कर्तव्य है कि वे सुनिश्चित करें कि यह परियोजना एक सच्चाई बन पाए."

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तालिबान सरकार में विदेश मंत्री रह चुके वकील अहमद मोतवक्किल ने <link type="page"><caption> वेबसाइट</caption><url href="www.nunn.asia " platform="highweb"/></link> को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि पाइपलाइन "स्थायित्व ला सकता है" और शायद ये अफ़ग़ानिस्तान के लिए एक "नई शुरुआत" हो सकती है.
उन्होंने कहा कि पाइपलाइन की सुरक्षा के लिए ज़रूरी है कि तालिबान को इससे अलग न रखा जाए.
उन्होंने 15 दिसंबर को वेबसाइट को दिए साक्षात्कार में कहा, "अगर तालिबान इसमें सहयोग नहीं करता है तो इस परियोजना को लागू करने की ज़मीन तैयार नहीं हो पाएगी."
अफ़ग़ान सरकार ने तापी समझौते के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री की उस टिप्पणी को दख़ल मानते हुए खारिज़ कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि इस परियोजना की सुरक्षा के लिए तालिबान का समर्थन पाने में पाकिस्तान अपने प्रभावों का इस्तेमाल करेगा.

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दूसरी ओर तालिबान ने अपनी मांगों के साथ–साथ हमेशा की तरह हथियार से डराना-धमकाना भी कम कर दिया है.
समूह के नेता मुल्ला अख़्तर मंसूर के बयान में यह तब्दीली साफ़ तौर पर देखी जा सकती है.
पश्चिमी ताक़तों का अफ़ग़ानिस्तान से 'पूरी तरह से बाहर जाना' सालों से तालिबान की मांग रही है.
लेकिन मंसूर ने अब अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक व्यवस्था को बढ़ावा देने पर ज़ोर दिया है.
आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने जुलाई में तालिबान की बागडोर संभालने के बाद रिलीज़ किए गए अपने दो ऑडियो संदेश में पश्चिमी ताक़तों की मौजूदगी और उनके अफ़ग़ानिस्तान के बाहर जाने का कोई ज़िक्र नहीं किया है.
पाकिस्तान बिजली की समस्या से निपटने के लिए इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए मजबूर है, लेकिन इसके साथ सीमा से लगे इलाक़ों की स्थिति में सीधा असर पड़ेगा.
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